विश्व साहित्य में प्रेम पर आधारित लाखों कविताएं लिखी गई हैं ,लिखी जा रही हैं और लिखी जाएंगी! ध्यातव्य है कि सिर्फ लिखी ही नहीं जा रही सबसे अधिक पढ़ी भी जा रही हैं ! प्रवीण परिमल हिंदी के सुपरिचित कवि रहे हैं .पिछले तीन दशक से अधिक समय से कविताएं लिखते रहे हैं . हाल ही में प्रवीण जी दिवंगत हो गए हैं किंतु उनकी कविताएं अभी भी उन्हें जीवित रखे हुए है. प्रस्तुत संग्रह “प्रेम का रंग नीला” में बयालीस कविताएं शामिल हैं !
इन कविताओं को कवि ने दो खंडों में प्रस्तुत किया है. प्रथम खंड में पंद्रह कविताएं हैं जबकि दूसरे खंड में सत्ताइस गीत – नवगीत हैं. प्रथम खंड की कविताओं के कुछ शीर्षक देखिए: वह लड़की,एक अप्रत्याशित मुलाक़ात, यूं तो, सूखा हुआ समुद्र,तुम्हारा अस्तित्व,जिंदगी का कारवां इत्यादि. दूसरे खंड “गीत – नवगीत” की की कविताओं के शीर्षक भी आकर्षक हैं.
कुछ कविताओं के शीर्षक देखिए: याद से, मन का नागफनी,गुज़र रहे हैं दिन, है बहुत जरूरी, ज़िंदगी की घड़ियाँ, मौसम का अर्थ, अनब्याही प्यास,अंजुरी भर अंगारा ,कैसे प्रणय के गीत गाऊं,रीत सिखा दो, दृग झोल, याद तुम्हारी,दहक रहा मन,झिझक रहा हूं इत्यादि. कविता “अनब्याही प्यास” की पंक्तियों को देखिए: ‘संभावित दर्दों से करती सहवास /अधरों पर तिर आई अनब्याही प्यास।/ अलसाए प्राणों के दूधिया प्रसंग/भोग रहे सपनों के गदराए अंग।नयनों में कौंध गया आगत इतिहास।/ यादों के दरवाजे,धुंधले संगीत/दस्तक दे सौंप गए अनगाए गीत/पनघट पर ठिठका है मूर्छित मधुमास।/ मुट्ठी में बंद किए खुशियों की भीड़/ इंद्रधनुष ढूँढ रहा रंगों की नीड़। धूंंधों की बाँहों में सिमटा आकाश।/ अंजुरी भर सपनों को लिए चुप, मौन/ प्रति-इच्छित अर्थों के घाव हुए गौण।संयम की सांसों का बीता वनवास।” प्रवीण जी की भाषा प्रांजल है .
इनकी कविताओं में तत्सम और तद्भव शब्दों के बहुत रोचक और आह्लादकारी प्रयोग देखने को मिलते हैं . इन्होंने प्रतीकों और उपमाओं का भी बहुत मनोहारी प्रयोग किया है. सुंदर कागज पर छपाई के साथ 96पृष्ठ का यह कविता संग्रह पठनीय और संग्रहणीय है.अब कवि नहीं है अन्यथा इस तीसरे संग्रह के बाद कवि के चौथे संग्रह की भी प्रतीक्षा रहती. कवि प्रवीण ने प्रेम कविताओं को एक कोमल ऊंचाई प्रदान की इस संग्रह में. शीर्षक “प्रेम का रंग नीला”भी प्रतीकों में प्रेम को एक नए धरातल पर ले जाता है जो भौतिक भी है और आध्यात्मिक भी.
संग्रह: प्रेम का रंग नीला, कवि: प्रवीण परिमल, पृष्ठ: 96, प्रकाशक: रुद्धादित्य प्रकाशन, मूल्य: रु.195

(प्रमोद कुमार झा तीन दशक से अधिक समय तक आकाशवाणी और दूरदर्शन के वरिष्ठ पदों पर कार्यरत रहे. एक चर्चित अनुवादक और हिन्दी, अंग्रेजी, मैथिली के लेखक, आलोचक और कला-संस्कृति-साहित्य पर स्तंभकार हैं।)
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