आज हिंदी में कवित्रियों और लेखिकाओं की बहुत लंबी सूची है. महादेवी वर्मा, कृष्णा सोबती, शिवानी, मृदुला गर्ग, कुसुम अंसल, ऊषा प्रियंवदा, चित्रा मुद्गल से लेकर गीतांजलिश्री तक हैं जिनकी “रेत समाधि”के अंग्रेजी अनुवाद को अंतर्राष्ट्रीय बुकर पुरस्कार तक मिल चुका है! पिछले दस – बीस वर्षों में उषाकिरण खान, वृत अनामिका, गगन गिल, गीताश्री, अल्पना मिश्र जैसी बीसियों लेखिकाएं हिन्दी साहित्य के आकाश में अपना परचम लहरा रही हैं. इन्हीं लेखिकाओं की कड़ी में एक और नाम जुड़ता है रेणु झा ‘रेणुका ‘.
उच्च शिक्षा प्राप्त गृहणी रेणु जी पिछले लगभग तीस सालों से छिटपुट लेखन कर रही हैं. दर्जनों पत्र-पत्रिकाओं में बीसियों लेख, कविताएं और कहानियां प्रकाशित हो चुकी हैं. झारखंड़ के मंचों पर सुमधुर स्वर में अपनी कविताओं के लिए पहचानी और सराही भी जाती रही हैं. रेणु जी को कथा के लिए बहुत सारे पुरस्कार और सम्मान भी मिल चुके हैं, पर रेणु जी ये सब अपने गृहणी के दायित्व को सफलतापूर्ण निभाते हुए किया. इनका एक कविता संग्रह “भावनाओं के रंग” पहले ही प्रकाशित हो चुका है. कई साझा संकलनों में इनकी कहानियाँ और कविताएँ शामिल हैं. ” गाँव से गुजरते हुए ” रेणु झा ‘ रेणुका का प्रथम कहानी संग्रह है. जैसा कि शीर्षक से ही स्पष्ट है इन्होंने गांव से अपने संपर्क में जो भी देखा सुना उसे कहानी के रूप में लिपिबद्ध किया है.
135 पृष्ठ के इस संग्रह में बीस कहानियाँ हैं. लगभग सारी कहानियां गांव में ही घटी हैं या गांव से ही जुड़ी हैं. लगभग सभी कहानियों के पात्र भी गांव से ही जुड़े हैं. गांव की पुरानी परंपराएं, लोक- व्यवहार और आपसी आचार- व्यवहार की झलक इन कहानियों में दिखाई देती है. रेणु जी की भाषा बहुत सरल है पर कहानियों में वर्णन जीवंत हैं और कहानी कहने का ढंग ऐसा है मानो आप दृश्य देख रहे हों ! कहानी के पात्रों में स्वाभाविकताओं है पर सरल जीवन से निकटता के कारण उसमें आपको कोई चमत्कारिक तत्व प्रायः नहीं मिले. हाँ आज के कठिन, क्लिष्ट जीवनशैली में अगर आप सरलता और सज्जनता को विशिष्ट गुण मानें तो इनके पात्र आपको विशिष्ट लग सकते हैं. कहानियों की विस्तार से चर्चा कर मैं पाठकों का कौतूहल समाप्त नहीं करना चाहता पर इतना जरूर कहूंगा कि इनके पात्रों में सरलता, सज्जनता और पारंपरिक मूल्यों के प्रति जो सम्मान और मर्यादा का भाव मिलता है वह अब सामान्य नहीं है. यहाँ कहानियों के शीर्षक की चर्चा प्रागंगिक होगी. ये हैं सुखद पड़ाव,आखिरी इच्छा,जीवन एक पहेली,जीते जी श्राद्ध, वृद्धाश्रम, रिश्तों की गर्माहट, नई पहचान, गांव से गुजरते हुए, सुंदर सुकन्या, उधार का सिंदूर, शुभ संस्कार, माँ की ढिबरी, किस्मत का खेल, भूख की आग, अस्तित्वहीन, आरक्षण, दो कौर भात, सम्मान, अपशगुन और बेरंग फागुन. बहुत सारी कहानियों में लेखिका ने सपाटबयानी कर दी है और जल्दी समेट लिया, जिसके कारण पात्रों को स्वाभाविक रूप से विकसित होने का अवसर नहीं मिल सका. ये अवश्य रूप से लेखिका का तत्काल निर्णय रहा होगा. कहानियों में प्रेरणा, प्रेम, संबंध, सामाजिक मान्यताओं और संस्कारों ,परंपराओं को पर्याप्त महत्व दिया गया है. कहानीकार रेणु में प्रचुर संभावनाएं हैं. संग्रह पठनीय और संग्रहणीय है.
कथा संग्रह: गाँव से गुजरते हुए ,लेखिका: रेणु झा ‘रेणुका’ ,पृष्ठ: 135, प्रकाशन: बोधि प्रकाशन, मूल्य: रु 199.

(प्रमोद कुमार झा तीन दशक से अधिक समय तक आकाशवाणी और दूरदर्शन के वरिष्ठ पदों पर कार्यरत रहे. एक चर्चित अनुवादक और हिन्दी, अंग्रेजी, मैथिली के लेखक, आलोचक और कला-संस्कृति-साहित्य पर स्तंभकार हैं।)
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