इस अवसर पर वक्ताओं ने कालिदास के साहित्य, उनके रचनात्मक व्यक्तित्व और भारतीय सांस्कृतिक परंपरा में उनके महत्त्व पर विचार व्यक्त किए। गजेंद्र सिंह शेखावत ने कहा कि मनुष्य के जीवन के साथ जो बात शाश्वत रूप से जुड़ी है, जो मनुष्य को मनुष्य बनाती है, वह है कल्पना। उन्होंने कहा, यह केवल पुस्तक के विमोचन का अवसर नहीं है, बल्कि हम सब का यहां एकत्र होना कालिदास के उस ऐतिहासिक मौन को स्वर देना है, जो सदियों से उनके व्यक्तित्व और जीवन के अनजाने पक्षों के इर्द-गिर्द पसरा हुआ है। उनके जीवन के प्रामाणिक विवरण सीमित हैं, इसलिए लेखक ने उनकी रचनाओं के भीतर निहित भाव, संकेतों के माध्यम से उनके संभावित जीवन और संवेदनाओं को समझने का प्रयास किया है।
उन्होंने कहा, साहित्य, कला और संस्कृति के सृजनकर्ता अपनी रचनात्मकता के माध्यम से समाज को प्रेरित करते हैं और आने वाली पीढ़ियों के लिए सांस्कृतिक धरोहर का निर्माण करते हैं। ‘कहो कालिदास!’ शीर्षक अपने आप में एक आत्मीय पुकार है, जो वर्तमान समय से कालिदास के साथ संवाद स्थापित करती है। पुस्तक में कालिदास के जीवन, उनकी रचनाओं, प्रेम, विरह, उत्तरदायित्व, प्रकृति और विशेष रूप से उनके स्त्री पात्रों के विविध आयामों को नए दृष्टिकोण से देखने का प्रयास किया गया है। उन्होंने कहा कि इतिहास यह पूछता है कि क्या हुआ, कब और कहां हुआ, जबकि साहित्य यह जानने का प्रयास करता है कि मनुष्य के मन में क्या घटित हुआ। इसी अर्थ में साहित्य संवेदना, कल्पना और कथा के माध्यम से इतिहास के अनछुए पक्षों को समझने का अवसर देता है।
केन्द्रीय संस्कृति मंत्री ने आगे कहा, कालिदास की रचनाओं में स्त्री केवल सौंदर्य का विषय नहीं है। महाकवि ने अपनी विभिन्न रचनाओं में स्त्री पात्रों के माध्यम से नारी को चेतना, गरिमा, प्रेम आदि के प्रतीक के रूम में स्थापित किया है। उन्होंने कहा, ‘कहो कालिदास!’ के लेखक युगल जोशी को इस रचनात्मक प्रयास के लिए बधाई देते हुए उम्मीद जताई कि पुस्तक का व्यापक रूप से पाठ हो और उस पर संवाद हो, ताकि पाठकों को कालिदास को नए दृष्टिकोण से समझने का अवसर मिले।
रामबहादुर राय ने कहा, ‘कहो कालिदास!’ महाकवि कालिदास के जीवन की औपन्यासिक प्रस्तुति है। उन्होंने कहा, कालिदास देश-काल की सीमाओं से परे हैं। वह केवल भारत के कवि नहीं, बल्कि वैश्विक कवि हैं। कालिदास ने जो साहित्य रचा, वह हर देश, हर काल, हर व्यक्ति और हर समाज के लिए है। उनका साहित्य युवा मन की आशा, उमंग, वेदना और विरह की कलात्मक अभिव्यक्ति है। यह पुस्तक बहुत सामयिक है और अवश्य पढ़ी जानी चाहिए।
डॉ. जोराम आनिया ने पुस्तक की विस्तृत समीक्षा करते हुए कहा, पुस्तक का शीर्षक ‘कहो कालिदास!’ संबोधन नहीं है, बल्कि कालिदास से संवाद करता है। कालिदास के बारे में इतिहास मौन है, लेकिन उनकी रचनाएं उनके बारे में बोलती हैं। ‘कहो कालिदास!’ एक ऐसी कृति है, जो कालिदास के जीवन के अज्ञात अंधकार पर लेखक की कल्पना से रोशनी डालने का प्रयास करती है। आज के समय यह उपन्यास कालिदास का पुनर्पाठ है। इस पुस्तक को पढ़ने के बाद कालिदास के साहित्य को पढ़े बिना नहीं रहा जा सकता।
लेखक युगल जोशी ने पुस्तक की अंतर्वस्तु के बारे में बात करते हुए कहा, प्रसिद्ध लेखक गेटे ने कालिदास के बारे में कहा था – यदि स्वर्गलोक को और मानव लोक को देखा जा सकता है, तो वह कालिदास के ‘शाकुंतलम्’ में ही संभव है। उन्होंने आगे कहा, मिथिला वाले कालिदास को अपने यहां का मानते हैं। उज्जैन वाले उन्हें अपना कहते हैं। उत्तराखंड के लोग भी ऐसा ही समझते हैं। देश के हर जगह के लोग उन्हें अपने यहां का कहते हैं, लेकिन कालिदास पूरे देश के हैं। ‘कहो कालिदास!’ महाकवि कालिदास पर आधारित उपन्यास है।
कार्यक्रम में साहित्य, कला, संस्कृति और अकादमिक जगत से जुड़े अनेक लोग उपस्थित रहे। मंच संचालन मंजीत ठाकुर ने किया और मंजुल प्रकाशन के सुशांत झा ने कार्यक्रम के अंत में अतिथियों और उपस्थित जनों के प्रति आभार व्यक्त किया।
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