रविवार को कनॉट प्लेस के आउटर सर्किल में करीब 300 लोग आरक्षण व्यवस्था में बदलाव की मांग को लेकर जुटे। आरक्षण हटाओ आंदोलन के बैनर तले उतरे इन प्रदर्शनकारियों की मांग थी कि आरक्षण और सरकारी सहायता में आर्थिक स्थिति को अधिक महत्व दिया जाए, क्रीमी लेयर को प्रभावी बनाया जाए और मौजूदा व्यवस्था की समीक्षा हो। पुलिस के अनुसार प्रदर्शन की अनुमति नहीं थी, इसी वजह से इन पर कार्रवाई करते हुए 20 से अधिक लोगों को हिरासत में लिया गया है।
यह प्रदर्शन 21 अगस्त को जंतर-मंतर पर हुए घटनाक्रम के ठीक दो दिन बाद हुआ। वहां भी प्रदर्शनकारियों को अनुमति नहीं होने की जानकारी दी गई थी। पुलिस ने उन्हें रामलीला मैदान में शांतिपूर्ण प्रदर्शन की वैकल्पिक अनुमति देने की बात कही थी, लेकिन प्रदर्शनकारी जंतर-मंतर पर ही डटे रहे। बाद में 50 से अधिक लोगों को हिरासत में लिया गया था। दो दिनों के भीतर दिल्ली के दो प्रमुख स्थानों पर हुई कार्रवाई ने आंदोलन को लेकर बहस तेज कर दी है—क्या यह केवल सोशल मीडिया का अभियान है या आरक्षण व्यवस्था के खिलाफ एक संगठित युवा आंदोलन आकार ले रहा है?**
56 लाख Instagram फॉलोअर्स की डिजिटल ताकत
‘आरक्षण हटाओ आंदोलन’ की सबसे बड़ी विशेषता इसकी असाधारण सोशल मीडिया पहुंच है। जुलाई के अंत में इसके Instagram अकाउंट पर 5.6 मिलियन यानी करीब 56 लाख फॉलोअर्स दर्ज किए गए थे। उसी समय X पर इसके 17 हजार से अधिक फॉलोअर्स थे।
हर फॉलोअर आंदोलन का सक्रिय समर्थक हो, यह जरूरी नहीं है। फिर भी किसी मुद्दा-आधारित अभियान के लिए इतने बड़े डिजिटल आधार को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। खासकर तब, जब इसी ऑनलाइन नेटवर्क के जरिए लोगों को दिल्ली में प्रदर्शन के लिए जुटाया जा रहा हो। आंदोलन के संदेश का केंद्र सिर्फ ‘आरक्षण हटाओ’ नहीं है। इसके समर्थक मेरिट, समान अवसर, आर्थिक आधार और क्रीमी लेयर को आरक्षण की बहस के केंद्र में लाने की मांग कर रहे हैं।
यानी सोशल मीडिया पर चल रहा सवाल मूल रूप से यह है—सरकारी अवसरों और सहायता का आधार जाति हो, आर्थिक स्थिति हो या समान प्रतियोगिता?
जंतर-मंतर से कनॉट प्लेस तक
21 अगस्त का जंतर-मंतर प्रदर्शन आंदोलन के लिए पहली बड़ी सड़क परीक्षा था। पुलिस ने पहले ही स्पष्ट कर दिया था कि वहां प्रदर्शन की अनुमति नहीं है और नई दिल्ली जिले में प्रतिबंधात्मक आदेश लागू हैं। प्रदर्शनकारियों को रामलीला मैदान का विकल्प दिया गया, लेकिन वे जंतर-मंतर से हटने को तैयार नहीं हुए। इसके बाद पुलिस ने कार्रवाई की और 50 से ज्यादा लोगों को हिरासत में लिया।
लेकिन कार्रवाई का असर आंदोलन को रोकने के बजाय अगले ही दिन फिर दिखाई दिया। रविवार को कनॉट प्लेस में करीब 300 लोगों का जुटना बताता है कि आंदोलनकारी अब दिल्ली के अलग-अलग सार्वजनिक स्थलों पर अपनी मौजूदगी दर्ज कराने की रणनीति अपना रहे हैं।
कनॉट प्लेस में भी पुलिस ने अनुमति नहीं होने का हवाला दिया और 20 से अधिक लोगों को हिरासत में लिया।
इस आंदोलन की जड़ 1990 के मंडल फैसले में
आज जिस आरक्षण व्यवस्था को लेकर आंदोलन हो रहा है, उसकी मौजूदा राजनीति को समझने के लिए 1990 के मंडल फैसले को समझना जरूरी है। मंडल आयोग का गठन 1978 में हुआ था और बीपी मंडल की अध्यक्षता वाले आयोग ने 1980 में अपनी रिपोर्ट दी। आयोग ने केंद्र सरकार की नौकरियों में अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण की सिफारिश की। करीब एक दशक तक यह सिफारिश लागू नहीं हुई।
1990 में प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार ने इसे लागू करने का फैसला किया। यह फैसला उस समय हुआ जब वीपी सिंह सरकार बेहद जटिल राजनीतिक समीकरणों से गुजर रही थी। सरकार को बाहर से भाजपा और वाम दलों का समर्थन था, जबकि उपप्रधानमंत्री देवी लाल सरकार के भीतर एक मजबूत राजनीतिक शक्ति थे। देवी लाल को मंत्रिमंडल से हटाए जाने के बाद पिछड़े वर्गों के राजनीतिक समर्थन का सवाल और महत्वपूर्ण हो गया। इसी दौर में मंडल आयोग की सिफारिश लागू करने की घोषणा हुई।
इसलिए इतिहासकारों और राजनीतिक विश्लेषकों के बीच यह बहस रही है कि मंडल का फैसला सामाजिक न्याय की प्रतिबद्धता के साथ-साथ तत्कालीन सत्ता संघर्ष और OBC राजनीतिक समर्थन के समीकरण से भी जुड़ा था। इसे केवल ‘कुर्सी बचाने का फैसला’ कहना इतिहास को सरल बना देना होगा, लेकिन यह भी तथ्य है कि मंडल की राजनीति उस समय के सत्ता समीकरण से अलग नहीं थी।
मंडल ने राजनीति बदली, लेकिन सरकार नहीं बची
मंडल की घोषणा के बाद देश के कई हिस्सों में छात्र विरोध शुरू हुआ। उसी समय राम मंदिर आंदोलन भी तेजी पकड़ रहा था। भारतीय राजनीति में इसके बाद ‘मंडल बनाम कमंडल’ की राजनीति प्रमुख हो गई। 23 अक्टूबर 1990 को बिहार में लालकृष्ण आडवाणी की रथयात्रा रोके जाने और उनकी गिरफ्तारी के बाद भाजपा ने वीपी सिंह सरकार से समर्थन वापस ले लिया। सरकार अल्पमत में आ गई और नवंबर 1990 में वीपी सिंह को प्रधानमंत्री पद छोड़ना पड़ा।
विडंबना यह थी कि जिस दौर में मंडल के जरिए पिछड़े वर्गों का समर्थन मजबूत करने की राजनीतिक कोशिश हुई, उसी दौर की मंडल-कमंडल राजनीति ने सरकार के सामने सबसे बड़ा संकट भी खड़ा कर दिया।
मेरिट पर सबसे बड़ा सवाल, लेकिन आंकड़ा क्या कहता है?
‘आरक्षण हटाओ आंदोलन’ की सबसे संवेदनशील दलील मेधावी छात्रों के भविष्य से जुड़ी है। प्रतियोगी परीक्षाओं में लाखों विद्यार्थी सीमित सीटों के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं। ऐसे में अलग-अलग श्रेणियों के लिए आरक्षण और qualifying criteria को लेकर सामान्य वर्ग के छात्रों में असंतोष लंबे समय से दिखाई देता है।
प्रतियोगिता की तीव्रता समझने के लिए JEE Advanced 2026 का आंकड़ा महत्वपूर्ण है। परीक्षा में 1,79,694 उम्मीदवार दोनों पेपरों में शामिल हुए, जबकि 56,880 उम्मीदवार ही क्वालिफाई कर सके। Common Rank List के लिए न्यूनतम aggregate 92/360 था, जबकि OBC-NCL और GEN-EWS के लिए यह 82/360 और SC/ST के लिए 46/360 था।
ये आंकड़े आरक्षण पर बहस को खत्म नहीं करते, बल्कि यह दिखाते हैं कि सीमित सीटों के लिए प्रतिस्पर्धा कितनी कठोर है और अलग-अलग qualifying standards छात्रों की समान अवसर की धारणा को कैसे प्रभावित कर सकते हैं।
क्या आर्थिक आधार नया विकल्प हो सकता है?
यही वह जगह है जहां आंदोलन का मूल तर्क सामने आता है।
प्रदर्शनकारियों का कहना है कि आर्थिक रूप से कमजोर छात्र किसी भी जाति का हो सकता है। इसलिए सरकारी सहायता, छात्रवृत्ति, कोचिंग और अन्य सुविधाओं में आर्थिक स्थिति को अधिक महत्व मिलना चाहिए।
दूसरी ओर आरक्षण समर्थकों का तर्क है कि आरक्षण सिर्फ गरीबी दूर करने की योजना नहीं है। इसका उद्देश्य ऐतिहासिक सामाजिक भेदभाव और सरकारी संस्थानों में प्रतिनिधित्व की कमी को दूर करना भी है। इसलिए बहस सिर्फ जाति बनाम आर्थिक आधार नहीं है। असल सवाल तीन चीजों के बीच संतुलन का है—
सामाजिक न्याय, आर्थिक जरूरत और मेरिट।
36 साल बाद फिर मंडल के सामने चुनौती
1990 में आरक्षण की बहस का केंद्र था—पिछड़े वर्गों को सत्ता और सरकारी संस्थानों में प्रतिनिधित्व कैसे मिले?
2026 में सवाल का दूसरा पक्ष सामने है—क्या मौजूदा आरक्षण व्यवस्था की अब नए सामाजिक और आर्थिक आंकड़ों के आधार पर समीक्षा होनी चाहिए ?
‘आरक्षण हटाओ आंदोलन’ का तेजी से बढ़ता डिजिटल आधार इस बहस को नया रूप दे रहा है। Instagram पर 56 लाख से ज्यादा फॉलोअर्स और दिल्ली की सड़कों पर लगातार प्रदर्शन यह दिखाते हैं कि मुद्दा युवाओं के एक वर्ग में गहरी प्रतिक्रिया पैदा कर रहा है।
लेकिन किसी आंदोलन की वास्तविक राजनीतिक ताकत उसके फॉलोअर्स से नहीं, बल्कि उसके लगातार जनसमर्थन, संगठन और स्पष्ट नीति प्रस्तावों से तय होगी।
फिलहाल इतना साफ है कि मंडल के 36 साल बाद आरक्षण का सवाल फिर राजधानी के केंद्र में है।
तब फैसला संसद और राजनीतिक सत्ता ने लिया था।
आज सवाल सोशल मीडिया से उठ रहा है और सड़क तक पहुंच रहा है।
कनॉट प्लेस में जुटे 300 लोग शायद संख्या में बहुत बड़े नहीं हों, लेकिन उनके पीछे खड़ा डिजिटल नेटवर्क लाखों में है। यही कारण है कि ‘आरक्षण हटाओ आंदोलन’ को केवल एक दिन के प्रदर्शन के रूप में खारिज करना आसान नहीं होगा।
आने वाले दिनों में असली सवाल यही होगा—क्या यह डिजिटल असंतोष एक बड़े सामाजिक आंदोलन में बदलता है, और क्या सरकार आरक्षण व्यवस्था की व्यापक, आंकड़ा-आधारित समीक्षा की मांग को गंभीरता से लेती है?
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