दिल्ली में फिर इमारत गिरी, 5 की मौत और कई घायल, आंकड़े बता रहे भवन सुरक्षा का बड़ा संकट

दिल्ली के सत्य निकेतन में रविवार को पांच मंजिला छात्र पीजी इमारत के ढहने से कम-से-कम पांच लोगों की मौत और चार लोगों के घायल होने की घटना ने राजधानी में भवन सुरक्षा और निर्माण मानकों के पालन पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मलबे में अभी भी कई लोगों के दबे होने की आशंका है और देर शाम तक राहत-बचाव अभियान जारी था। हादसे में इस्तेमाल हो रही इमारत करीब पांच मंजिला थी और इसमें मुख्य रूप से छात्र रहते थे। प्रारंभिक जानकारी के मुताबिक इमारत के बेसमेंट में काम चल रहा था। हालांकि हादसे की वास्तविक वजह की आधिकारिक जांच अभी बाकी है।

दिल्ली के सत्य नगर इलाके में गिरे पीजी हॉस्टल के मलबे के नीचे दबे लोगों को निकालने का काम देर रात तक जारी रहा
Written By : रामनाथ राजेश | Updated on: September 7, 2026 12:15 am

सत्य निकेतन में इमारत गिरने की घटना को महज एक स्थानीय हादसा मानना इसलिए मुश्किल है क्योंकि दिल्ली में पिछले कुछ वर्षों में ऐसी घटनाएं लगातार सामने आती रही हैं। उपलब्ध दिल्ली फायर सर्विस के आंकड़ों के मुताबिक वित्त वर्ष 2022-23 में भवन ढहने के 349 मामले सामने आए और इनमें 43 लोगों की मौत हुई, जबकि 315 लोग घायल हुए। वित्त वर्ष 2023-24 में 371 भवन गिरने की घटनाएं हुईं, जिनमें 23 लोगों की मौत और 171 लोग घायल हुए। इसके बाद अप्रैल 2024 से 27 जनवरी 2025 तक ही 413 भवन ढहने की घटनाएं दर्ज हुईं, जिनमें 32 लोगों की मौत और 187 लोग घायल हुए।

यानी आंकड़े यह संकेत देते हैं कि समस्या केवल किसी एक जर्जर इमारत तक सीमित नहीं है। भवनों में अतिरिक्त मंजिलें बनाना, कमजोर नींव पर निर्माण, अनधिकृत बदलाव और निर्माण नियमों की निगरानी में कमी जैसे सवाल बार-बार सामने आते रहे हैं। विशेषज्ञों ने भी भवन गिरने के पीछे नींव, जमीन की क्षमता और भवन पर पड़ने वाले अतिरिक्त भार को प्रमुख कारणों में गिनाया है।

2026 में ही दिल्ली में कई बड़े भवन हादसे

साल 2026 में भी राजधानी में भवन गिरने की घटनाओं ने चिंता बढ़ाई है। मई में दक्षिण दिल्ली के साकेत मेट्रो स्टेशन के पास एक बहुमंजिला व्यावसायिक इमारत ढहने से छह लोगों की मौत और आठ लोग घायल हुए थे। घटना के बाद दो MCD इंजीनियरों को निलंबित किए जाने की जानकारी सामने आई थी।

इसके कुछ ही समय बाद जुलाई में रोहिणी सेक्टर-16 में निर्माणाधीन दो चार मंजिला इमारतों के गिरने से तीन लोगों की मौत हुई। पुलिस के मुताबिक इस हादसे में पांच लोग मलबे में फंसे थे और करीब 14 घंटे चले बचाव अभियान के बाद ऑपरेशन पूरा हुआ। मामले में लापरवाही और निर्माण से संबंधित धाराओं में केस भी दर्ज किया गया। इन घटनाओं के बीच अब सत्य निकेतन की इमारत का गिरना यह सवाल सामने ला रहा है कि राजधानी में ऐसे भवनों की पहचान और निगरानी का तंत्र कितना प्रभावी है।

सत्य निकेतन में क्या हुआ ?

रविवार दोपहर करीब 1:30 बजे दक्षिण-पश्चिम दिल्ली के सत्य निकेतन इलाके में ‘Hostel Daze’ नाम से इस्तेमाल की जा रही पांच मंजिला इमारत अचानक ढह गई। यह इलाका दिल्ली विश्वविद्यालय के साउथ कैंपस के आसपास छात्रों के लिए बड़ी संख्या में पीजी और हॉस्टल की वजह से जाना जाता है। हादसे के तुरंत बाद दिल्ली फायर सर्विस, पुलिस, NDRF और अन्य एजेंसियों ने बचाव अभियान शुरू किया। छह लोगों को शुरुआती चरण में मलबे से निकालकर अस्पताल पहुंचाया गया था।

प्रारंभिक जांच में बेसमेंट में चल रहे काम को लेकर सवाल उठे हैं। कुछ रिपोर्टों में बेसमेंट में पानी जमा होने और संरचना की कमजोरी की बात भी सामने आई है, लेकिन इन कारणों को अभी अंतिम रूप से हादसे का कारण नहीं माना जा सकता। मामले में पुलिस ने भवन मालिक के खिलाफ केस दर्ज किया है और प्रशासन ने जांच शुरू कर दी है। रिपोर्ट के अनुसार बचाव अभियान के साथ-साथ जिम्मेदारी तय करने की प्रक्रिया भी शुरू हो चुकी है।

सवाल सिर्फ मलबे से लोगों को निकालने का नहीं

सत्य निकेतन की घटना का सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या दिल्ली में ऐसे भवनों की पहचान हादसे से पहले की जा रही है? यदि पिछले तीन वित्त वर्षों में ही सैकड़ों भवन ढहने की घटनाएं दर्ज हुई हैं और दर्जनों लोगों की जान गई है, तो केवल प्रत्येक हादसे के बाद जांच और कार्रवाई पर्याप्त नहीं मानी जा सकती। खास तौर पर छात्रों और कामगारों के लिए इस्तेमाल होने वाली पुरानी इमारतों, पीजी और अनधिकृत रूप से बदली गई संरचनाओं की नियमित structural safety audit, बेसमेंट में होने वाले निर्माण/मरम्मत की निगरानी और स्वीकृत नक्शे से अलग निर्माण पर समय रहते कार्रवाई इस पूरे संकट की अहम कड़ी बनती है।

सत्य निकेतन में बचाव अभियान अभी जारी है। इसलिए फिलहाल सबसे बड़ी प्राथमिकता मलबे में फंसे लोगों को सुरक्षित निकालना है। लेकिन बचाव अभियान खत्म होने के बाद राजधानी को इस सवाल का जवाब भी देना होगा कि एक ऐसी इमारत, जिसमें बड़ी संख्या में छात्र रह रहे थे, वह गिरने से पहले सुरक्षा जांच के दायरे में क्यों नहीं आई।

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