सत्य निकेतन हादसा: हॉस्टल की कमी ने छात्रों को बनाया असुरक्षित PG का किरायेदार

सात मौतों के बाद मालिक परिवार गिरफ्तार, पांच MCD अधिकारी निलंबित; DU के ढाई लाख से ज्यादा छात्रों के लिए हॉस्टल में महज कुछ हजार सीटें। सत्य निकेतन में पांच मंजिला PG इमारत के मलबे से सात शव निकलने के बाद अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि इमारत क्यों गिरी। बड़ा सवाल यह है कि दिल्ली विश्वविद्यालय के हजारों छात्र आखिर ऐसी इमारतों में रहने को मजबूर क्यों हैं, जहां एक बेड के लिए 10 से 15 हजार रुपये महीना चुकाने के बावजूद सुरक्षा की कोई पक्की गारंटी नहीं है।

Written By : रामनाथ राजेश | Updated on: September 7, 2026 11:38 pm

सत्य निकेतन हादसे के बाद दिल्ली पुलिस ने मकान मालिक हरिराम गुप्ता, उसकी पत्नी उर्मिला गुप्ता और बेटे महेश गुप्ता को गिरफ्तार कर लिया है। पुलिस के मुताबिक संपत्ति उर्मिला के नाम थी, बिजली कनेक्शन हरिराम के नाम और इमारत का संचालन महेश देख रहा था। हरिराम को राजस्थान के भिवाड़ी से पकड़ा गया।

पांच MCD अधिकारी निलंबित

हादसे के बाद नगर निगम ने भी अपने अधिकारियों पर कार्रवाई की है। दक्षिणी जोन के डिप्टी कमिश्नर राकेश कुमार, अधीक्षण अभियंता रणवीर सिंह, कार्यकारी अभियंता (बिल्डिंग) ललित कुमार गोयल, सहायक अभियंता (बिल्डिंग) सुनील चौहान और कनिष्ठ अभियंता आशीष कुमार को तत्काल प्रभाव से निलंबित किया गया है। इनके खिलाफ विभागीय जांच भी शुरू की गई है।

एमसीडी की जांच में इमारत के स्वीकृत नक्शे और वास्तविक निर्माण को लेकर गंभीर सवाल सामने आए हैं। प्रारंभिक जानकारी के अनुसार मूल अनुमति G+1 की थी, जबकि इमारत का निर्माण बढ़कर G+4 तक पहुंच गया था। अब यह जांच का अहम हिस्सा है कि अतिरिक्त मंजिलें कब और कैसे बनीं और संबंधित विभाग की निगरानी व्यवस्था कहां विफल हुई।

बेसमेंट में निर्माण ने बढ़ाया खतरा

हादसे के समय इमारत के बेसमेंट में मरम्मत अथवा निर्माण का काम चल रहा था। वहां पानी जमा होने की बात भी सामने आई है। पुलिस और तकनीकी विशेषज्ञ इस पहलू की जांच कर रहे हैं कि बेसमेंट में हुए बदलाव और पानी का इमारत की संरचना पर कितना असर पड़ा। हालांकि हादसे की अंतिम तकनीकी वजह स्ट्रक्चरल जांच पूरी होने के बाद ही स्पष्ट होगी।

असली संकट हॉस्टल का

सत्य निकेतन की घटना को सिर्फ एक जर्जर इमारत गिरने की घटना मानना आसान होगा। लेकिन इसके पीछे दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र आवास का वर्षों पुराना संकट है। दिल्ली विश्वविद्यालय में ढाई लाख से अधिक नियमित विद्यार्थी हैं। विश्वविद्यालय और उससे संबद्ध कॉलेजों में हॉस्टल की उपलब्धता इसके मुकाबले बेहद कम है। अलग-अलग श्रेणियों को जोड़ने के तरीके के कारण हॉस्टल सीटों के आंकड़े अलग-अलग सामने आते हैं, लेकिन मोटे तौर पर क्षमता कुछ हजार से लेकर करीब नौ हजार बेड के बीच ही बैठती है। यानी लाखों विद्यार्थियों के मुकाबले सुरक्षित कैंपस आवास बेहद सीमित है।

कॉलेज बढ़े, हॉस्टल नहीं
2026-27 में दिल्ली विश्वविद्यालय में करीब 71 हजार स्नातक सीटें उपलब्ध हैं। हर साल देश के अलग-अलग हिस्सों से हजारों विद्यार्थी दाखिले के लिए दिल्ली आते हैं। इनमें बड़ी संख्या ऐसे छात्रों की होती है जिन्हें दिल्ली में अपना घर नहीं मिलता।

दाखिला मिलने के बाद अगली चुनौती होती है—रहेंगे कहां?

दक्षिण कैंपस के कई प्रमुख कॉलेजों में या तो हॉस्टल नहीं है या उनकी क्षमता छात्रों की संख्या की तुलना में बहुत कम है। लिहाजा कॉलेज के आसपास निजी PG ही सबसे आसान विकल्प बन जाता है।

सत्य निकेतन में 200 से ज्यादा PG

दक्षिण कैंपस से सटे सत्य निकेतन में 200 से अधिक PG होने का अनुमान सामने आया है। छोटे-छोटे मकानों में कमरे बढ़े, कमरों में बेड बढ़े और देखते ही देखते पूरा इलाका छात्रों के लिए निजी आवास का बड़ा बाजार बन गया। लेकिन इस बाजार का कोई एकीकृत सरकारी रिकॉर्ड नहीं है। कितने PG चल रहे हैं? किस इमारत में कितने छात्र रह सकते हैं? कितनी मंजिलें स्वीकृत हैं? कितने बेड की अनुमति है? अग्निशमन सुरक्षा का प्रमाणपत्र है या नहीं? स्ट्रक्चरल ऑडिट कब हुआ? इन सवालों के जवाब अलग-अलग विभागों में बिखरे हुए हैं।

एक बेड के लिए 6 से 25 हजार

छात्रों की मजबूरी का फायदा किराये के बाजार में साफ दिखाई देता है। सत्य निकेतन में कमरे और सुविधाओं के हिसाब से एक बेड का किराया करीब 6 हजार से 15 हजार रुपये तक बताया जाता है। बेहतर कमरे और कम शेयरिंग में यह रकम 20 से 25 हजार रुपये तक पहुंच जाती है। एक ही कमरे में तीन-चार बेड लगाकर किराये को कई गुना बढ़ाया जाता है। छात्र के पास विकल्प सीमित हैं—या तो कॉलेज से दूर जाए और रोज लंबी यात्रा करे, या कैंपस के पास महंगा PG ले। सुरक्षा की गारंटी इस सौदे का हिस्सा अक्सर नहीं होती।

मजबूरी ने बनाया पूरा कारोबार

सत्य निकेतन अकेला इलाका नहीं है। मुखर्जी नगर, हडसन लेन, मुनीरका, महिपालपुर, नानकपुरा, मोती बाग और दक्षिणी दिल्ली के कई दूसरे इलाके भी छात्रों के निजी आवास के बड़े केंद्र बन चुके हैं। मकान मालिकों के लिए यह लाभ का कारोबार है और छात्रों के लिए मजबूरी। पुराने मकान में अतिरिक्त कमरे बनाए जाते हैं, कई जगह पार्टिशन डालकर रहने की जगह बढ़ाई जाती है और सीमित जगह में ज्यादा बेड लगाए जाते हैं। यही मॉडल किसी दिन हादसे का कारण बन सकता है।

अब हर PG की जांच जरूरी

सत्य निकेतन हादसे के बाद सरकार और नगर निगम के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि कार्रवाई केवल एक इमारत तक सीमित न रहे। दिल्ली के सभी प्रमुख छात्र इलाकों में चल रहे PG का एकीकृत सर्वे, भवन की स्वीकृत मंजिलों का सत्यापन, क्षमता के मुकाबले रहने वाले छात्रों की संख्या की जांच, फायर सेफ्टी और स्ट्रक्चरल ऑडिट अनिवार्य किए जाने की जरूरत है। सात मौतों के बाद तीन गिरफ्तारियां और पांच निलंबन तत्काल कार्रवाई का हिसाब है। लेकिन हादसे का स्थायी जवाब तब मिलेगा, जब दिल्ली विश्वविद्यालय के हर छात्र को सुरक्षित और किफायती आवास का विकल्प मिलेगा। सत्य निकेतन का मलबा हट जाएगा। मगर असली सवाल उन हजारों कमरों का है, जहां आज भी छात्र किताबों के साथ अपना भविष्य और अपनी जान दोनों लेकर रह रहे हैं।

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