प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सम्मेलन के समापन पर ब्रिक्स को केवल देशों का समूह नहीं, बल्कि समाधान देने वाला सहयोग तंत्र बताया और जोर दिया कि सम्मेलन में लिए गए निर्णय फाइलों तक सीमित न रहें, बल्कि समयबद्ध तरीके से जमीन पर उतरें। भारत ने अगले कार्यकाल के लिए ब्रिक्स की अध्यक्षता चीन को सौंप दी है।
इस सम्मेलन की सबसे बड़ी राजनीतिक उपलब्धि यह नहीं है कि ब्रिक्स ने पश्चिम के खिलाफ कोई नया गठबंधन बना लिया है। वास्तविक महत्व इस बात का है कि भारत, चीन, रूस, ईरान, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे अलग-अलग रणनीतिक हितों वाले देशों ने गंभीर मतभेदों के बावजूद एक साझा घोषणा पर सहमति बनाई। यही नई दिल्ली सम्मेलन की कूटनीतिक परीक्षा भी थी और उसकी सीमा भी।
वैश्विक दक्षिण को ‘नियम-निर्धारक’ बनाने की कोशिश
नई दिल्ली से निकला सबसे स्पष्ट संदेश वैश्विक शासन में विकासशील देशों की भूमिका बढ़ाने का है। प्रधानमंत्री मोदी ने वैश्विक दक्षिण (ग्लोबल साउथ) को केवल दुनिया में पहले से तय नियमों का पालन करने वाला पक्ष न मानकर नियमों को आकार देने वाला पक्ष बनाने की जरूरत बताई।
ब्रिक्स ने बहुध्रुवीयता और बहुपक्षवाद को मजबूत करने तथा वैश्विक संस्थाओं को आज की आर्थिक और राजनीतिक वास्तविकताओं के अनुरूप बनाने की मांग की है। विशेष रूप से संयुक्त राष्ट्र और उसकी सुरक्षा परिषद में सुधार के साथ अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) और विश्व बैंक जैसी वित्तीय संस्थाओं में विकासशील देशों के प्रतिनिधित्व को बढ़ाने की मांग महत्वपूर्ण है।
इसका सीधा अर्थ यह है कि ब्रिक्स अब केवल आर्थिक सहयोग का मंच नहीं रहना चाहता। वह वैश्विक शासन की संरचना पर भी प्रभाव डालने की कोशिश कर रहा है।
हालांकि भारत ने इस पहल को पश्चिम विरोधी परियोजना के रूप में पेश नहीं किया। मोदी का स्पष्ट संदेश रहा कि ब्रिक्स किसी के खिलाफ नहीं है। भारत की रणनीति टकराव के बजाय ऐसी बहुध्रुवीय व्यवस्था की है, जिसमें अधिक देशों को निर्णय प्रक्रिया में प्रभावी
नई दिल्ली घोषणा में एकतरफा शुल्क यानी टैरिफ (टैरिफ) और गैर-शुल्क व्यापार बाधाओं पर चिंता जताई गई है। ब्रिक्स ने उन एकतरफा आर्थिक उपायों का भी विरोध किया है जिन्हें संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की मंजूरी प्राप्त नहीं है। साथ ही वैश्विक व्यापार, आपूर्ति शृंखला, ऊर्जा प्रवाह और समुद्री सुरक्षा को बनाए रखने पर जोर दिया गया है।
महत्वपूर्ण यह है कि घोषणा में अमेरिका का नाम लेकर शुल्क नीति की आलोचना नहीं की गई। यही भारत की कूटनीतिक शैली को भी दर्शाता है। ब्रिक्स के कई सदस्य अमेरिका के साथ महत्वपूर्ण व्यापारिक और रणनीतिक संबंध रखते हैं। इसलिए साझा घोषणा की भाषा को इस तरह रखा गया कि समूह का संदेश स्पष्ट रहे, लेकिन वह किसी एक देश के खिलाफ औपचारिक मोर्चे के रूप में दिखाई न दे।
इसका अर्थ यह है कि ब्रिक्स और पश्चिम के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है, लेकिन इसे अभी सीधा शीतयुद्ध या दो विरोधी खेमों में दुनिया के बंटने के रूप में देखना जल्दबाजी होगी।
डॉलर से दूरी की दिशा, लेकिन साझा मुद्रा नहीं
ब्रिक्स के आर्थिक एजेंडे का एक महत्वपूर्ण हिस्सा स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और सीमा-पार भुगतान व्यवस्था को मजबूत करना है। घोषणा में स्थानीय मुद्राओं के इस्तेमाल तथा सीमा-पार भुगतान प्रणालियों को बेहतर बनाने की बात कही गई है।
लेकिन यहां तथ्यात्मक सावधानी जरूरी है। नई दिल्ली सम्मेलन ने ब्रिक्स की कोई साझा मुद्रा शुरू करने का फैसला नहीं किया है और न ही डॉलर को तत्काल हटाने का निर्णय लिया गया है।
असल बदलाव यह है कि सदस्य देश अंतरराष्ट्रीय व्यापार और भुगतान में अपनी राष्ट्रीय मुद्राओं तथा वैकल्पिक भुगतान तंत्र के इस्तेमाल की संभावनाओं को बढ़ाना चाहते हैं। यदि यह व्यवस्था धीरे-धीरे व्यापक होती है तो इससे अंतरराष्ट्रीय कारोबार में डॉलर पर निर्भरता कुछ हद तक कम हो सकती है। लेकिन यह लंबी अवधि की प्रक्रिया होगी, तत्काल परिणाम नहीं।
पश्चिम एशिया ने ब्रिक्स की एकता की परीक्षा ली
नई दिल्ली सम्मेलन की सबसे कठिन कूटनीतिक चुनौती पश्चिम एशिया रही। ईरान ब्रिक्स का सदस्य है, जबकि सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देश क्षेत्रीय राजनीति में अलग-अलग सुरक्षा और रणनीतिक हित रखते हैं। ईरान और संयुक्त अरब अमीरात के बीच जारी तनाव की पृष्ठभूमि में भी ब्रिक्स ने साझा घोषणा जारी की।
घोषणा में पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए अधिकतम संयम, बातचीत और कूटनीति की आवश्यकता पर जोर दिया गया। साथ ही नागरिकों और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे पर हमलों तथा शांतिपूर्ण परमाणु प्रतिष्ठानों की सुरक्षा को लेकर चिंता जताई गई।
यहां ब्रिक्स की ताकत और उसकी सीमा दोनों दिखाई देती हैं। सदस्य देशों ने साझा भाषा खोज ली, लेकिन इतनी सामान्य भाषा में कि किसी एक पक्ष को सीधे जिम्मेदार ठहराने से बचा जा सके।
यानी ब्रिक्स संकटों पर बातचीत का मंच बनने की क्षमता रखता है, लेकिन सदस्य देशों के परस्पर विरोधी हितों के कारण सामूहिक कार्रवाई की उसकी क्षमता अभी सीमित है।
फिलिस्तीन पर अधिक स्पष्ट रुख
फिलिस्तीन के मुद्दे पर ब्रिक्स की भाषा अपेक्षाकृत अधिक स्पष्ट रही। घोषणा में फिलिस्तीनियों के जबरन विस्थापन का विरोध किया गया और गाजा में मानवीय सहायता की निर्बाध पहुंच तथा फिलिस्तीन की पूर्ण संयुक्त राष्ट्र सदस्यता के समर्थन को दोहराया गया। दो-राष्ट्र समाधान और 1967 की सीमाओं के आधार पर स्वतंत्र फिलिस्तीनी राज्य की स्थापना की मांग भी दोहराई गई।
यह पश्चिम एशिया में ब्रिक्स के सामूहिक राजनीतिक रुख को समझने के लिए महत्वपूर्ण है, हालांकि इससे तत्काल कोई व्यावहारिक समाधान निकलना अलग विषय है।
रूस-यूक्रेन युद्ध पर सावधानी
यूक्रेन युद्ध के मामले में ब्रिक्स ने किसी एक पक्ष के समर्थन की बजाय संवाद, परामर्श और कूटनीति के जरिये विवादों के समाधान की सामान्य भाषा अपनाई। घोषणा में ऐसे एकतरफा प्रतिबंधों का विरोध किया गया जिन्हें संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की मंजूरी प्राप्त नहीं है। यूक्रेन का नाम लेकर कोई नया सामूहिक शांति प्रस्ताव घोषणा में नहीं रखा गया।
भारत के लिए यह संतुलन महत्वपूर्ण है। रूस भारत का प्रमुख रणनीतिक साझेदार है, वहीं अमेरिका और यूरोप के साथ भारत के आर्थिक और तकनीकी संबंध भी लगातार महत्वपूर्ण हैं। इसलिए नई दिल्ली ने ब्रिक्स मंच को किसी एक शक्ति-गुट की राजनीति में बदलने के बजाय संवाद और बहुध्रुवीयता के मंच के रूप में आगे बढ़ाने की कोशिश की।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता और महत्वपूर्ण खनिज : अगली शक्ति-राजनीति
ब्रिक्स की नई दिल्ली बैठक का एक कम चर्चित लेकिन भविष्य के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण पक्ष तकनीक है। प्रधानमंत्री मोदी ने तकनीक और महत्वपूर्ण खनिजों के हथियारीकरण यानी किसी देश पर दबाव बनाने के लिए उनके इस्तेमाल के खतरे की ओर ध्यान दिलाया।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस), डिजिटल बुनियादी ढांचे, विज्ञान, तकनीकी सहयोग और महत्वपूर्ण खनिजों को अब केवल आर्थिक मुद्दे के बजाय रणनीतिक मुद्दे के रूप में देखा जा रहा है।
चीन ने ब्रिक्स के भीतर कृत्रिम बुद्धिमत्ता सहयोग को आगे बढ़ाने और मुक्त-स्रोत कृत्रिम बुद्धिमत्ता से जुड़ी पहल की पेशकश की। इससे साफ है कि ब्रिक्स का एजेंडा अब केवल तेल, गैस, बैंकिंग और पारंपरिक व्यापार तक सीमित नहीं है।
आने वाले वर्षों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता, अर्धचालक तकनीक, महत्वपूर्ण खनिज और डिजिटल भुगतान जैसी व्यवस्थाएं वैश्विक शक्ति संतुलन का महत्वपूर्ण आधार बन सकती हैं।
आपूर्ति शृंखला और ऊर्जा सुरक्षा भी एजेंडे में
कोरोना महामारी, रूस-यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया के संघर्षों ने दुनिया को यह दिखाया है कि किसी देश की शक्ति केवल उसके सैन्य संसाधनों से तय नहीं होती। आवश्यक वस्तुओं, ऊर्जा, तकनीक और कच्चे माल की निर्बाध आपूर्ति भी राष्ट्रीय सुरक्षा का हिस्सा बन चुकी है।
इसीलिए नई दिल्ली घोषणा में लचीली और विविधीकृत वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं, ऊर्जा सुरक्षा तथा औद्योगिक सहयोग पर जोर दिया गया है।
ब्रिक्स देशों के बीच सहयोग बढ़ने पर इसका लाभ विशेष रूप से विकासशील अर्थव्यवस्थाओं को मिल सकता है, क्योंकि वे पश्चिमी बाजारों और वित्तीय संस्थाओं पर अपनी निर्भरता के साथ-साथ वैकल्पिक आर्थिक साझेदारियां भी विकसित करना चाहती हैं।
अंतरिक्ष से स्वास्थ्य तक सहयोग का विस्तार
नई दिल्ली घोषणा में अंतरिक्ष सहयोग को भी आगे बढ़ाने की दिशा दिखाई गई है। ब्रिक्स दूरसंवेदी उपग्रह समूह के विस्तार में हुई प्रगति को स्वीकार किया गया और ब्रिक्स अंतरिक्ष परिषद के लिए कार्य-प्रारूप तैयार होने की जानकारी दी गई। विज्ञान, क्वांटम तकनीक और अनुसंधान सहयोग को भी महत्व दिया गया है।
स्वास्थ्य क्षेत्र में संक्रामक रोगों के लिए एकीकृत पूर्व-चेतावनी प्रणाली स्थापित करने पर भी सहमति बनी। इसका उद्देश्य भविष्य की महामारियों के लिए बेहतर तैयारी और समय रहते प्रतिक्रिया की क्षमता विकसित करना है।
इससे ब्रिक्स की बदलती प्राथमिकता स्पष्ट होती है—संगठन अब केवल वैश्विक व्यवस्था की आलोचना करने के बजाय अपने सदस्यों के बीच व्यावहारिक सहयोग की संस्थाएं विकसित करने की कोशिश कर रहा है।
भारत की सबसे बड़ी उपलब्धि क्या?
नई दिल्ली सम्मेलन को भारत की कूटनीति के संदर्भ में देखें तो सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि यह है कि उसने अलग-अलग ध्रुवों से संबंध रखने वाले देशों को एक साझा मंच पर बनाए रखा।
चीन और भारत के बीच अपने रणनीतिक मतभेद हैं। रूस पश्चिमी प्रतिबंधों के दबाव में है। ईरान और खाड़ी देशों के बीच गंभीर क्षेत्रीय तनाव हैं। फिर भी घोषणा सर्वसम्मति से पारित हुई। यही भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण परिणाम है।
मोदी ने जिस नियम-निर्धारक वैश्विक दक्षिण की बात की है, उसका वास्तविक परीक्षण अब सम्मेलन के बाद शुरू होगा। क्या स्थानीय मुद्राओं में व्यापार वास्तव में बढ़ेगा? क्या वैकल्पिक भुगतान व्यवस्था प्रभावी बन पाएगी? क्या अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व बैंक और संयुक्त राष्ट्र में सुधार के लिए ब्रिक्स अपने राजनीतिक प्रभाव को परिणाम में बदल पाएगा? क्या कृत्रिम बुद्धिमत्ता और महत्वपूर्ण खनिजों में ठोस साझा परियोजनाएं बनेंगी? और सबसे महत्वपूर्ण—क्या अलग-अलग रणनीतिक हित रखने वाले सदस्य कठिन अंतरराष्ट्रीय संकटों में भी साझा कार्रवाई कर पाएंगे? इन सवालों के जवाब आने वाले वर्षों में मिलेंगे।
फिलहाल नई दिल्ली ब्रिक्स सम्मेलन का सबसे बड़ा संदेश यही है कि दुनिया की आर्थिक और राजनीतिक शक्ति संरचना बदल रही है। ब्रिक्स अभी पश्चिमी व्यवस्था का विकल्प नहीं बना है, लेकिन वह ऐसी विश्व व्यवस्था की मांग को अधिक संगठित रूप दे रहा है जिसमें एशिया, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और अन्य विकासशील देशों की आवाज पहले की तुलना में अधिक निर्णायक हो। और इस बदलती व्यवस्था में भारत की चुनौती केवल ब्रिक्स को मजबूत करना नहीं, बल्कि रूस और चीन के साथ संबंध बनाए रखते हुए अमेरिका और यूरोप के साथ अपने हितों की रक्षा करना तथा वैश्विक दक्षिण और विकसित दुनिया के बीच एक विश्वसनीय सेतु बने रहना है।
नई दिल्ली सम्मेलन ने इस भूमिका के लिए भारत को एक बड़ा मंच दिया है। अब उसकी सफलता इस बात से तय होगी कि घोषणाओं को कितनी तेजी से ठोस आर्थिक, तकनीकी और कूटनीतिक परिणामों में बदला जाता है।
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