BRICKS सम्मेलन से पहले पुतिन की ‘खरी-खरी’, मोदी के साथ की पौन घंटे वार्ता; दिल्ली में जुटी दुनिया की बड़ी ताकतें

भारत की मेजबानी में होने वाले 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से पहले शुक्रवार को नई दिल्ली वैश्विक कूटनीति का केंद्र बन गई। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के दिल्ली पहुंचने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उनकी करीब 45 मिनट की अहम द्विपक्षीय वार्ता हुई। दोनों नेताओं ने भारत-रूस के विशेष और विशेषाधिकार प्राप्त रणनीतिक संबंधों को और मजबूत करने पर सहमति जताई। बातचीत में व्यापार, ऊर्जा, रक्षा, अंतरिक्ष, औद्योगिक सहयोग, कौशल और क्षेत्रीय परिस्थितियों सहित कई महत्वपूर्ण मुद्दे शामिल रहे।

Written By : Ramnath Rajesh | Updated on: September 12, 2026 12:11 am

इसी बीच ब्रिक्स बिजनेस फोरम में पुतिन ने बदलती वैश्विक आर्थिक व्यवस्था का उल्लेख करते हुए पश्चिमी देशों को कड़ा संदेश दिया। उन्होंने कहा कि पिछले पांच वर्षों में ब्रिक्स देशों की वैश्विक अर्थव्यवस्था में हिस्सेदारी 40 प्रतिशत से अधिक रही है, जबकि जी7 की हिस्सेदारी करीब 29 प्रतिशत है। इसी संदर्भ में उन्होंने ‘सो-कॉल्ड जी7’ यानी ‘कथित जी7’ का उल्लेख किया। पुतिन का संदेश साफ था कि वैश्विक आर्थिक शक्ति का संतुलन तेजी से बदल रहा है और उभरती अर्थव्यवस्थाओं की भूमिका लगातार बढ़ रही है।

मोदी-पुतिन वार्ता में ऊर्जा से लेकर रक्षा तक

प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति पुतिन की बैठक में दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों की व्यापक समीक्षा हुई। ऊर्जा और रक्षा सहयोग के साथ आर्थिक एवं औद्योगिक संबंधों को आगे बढ़ाने पर विशेष जोर रहा। दोनों नेताओं ने 2030 तक आर्थिक सहयोग कार्यक्रम को आगे बढ़ाने तथा व्यापार और निवेश बढ़ाने की दिशा में काम जारी रखने पर सहमति जताई। भारत और रूस ने 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को 100 अरब डॉलर तक ले जाने का लक्ष्य रखा है।

दोनों नेताओं ने पश्चिम एशिया और काला सागर क्षेत्र के संघर्षों से पैदा हुई परिस्थितियों पर भी विचार किया। इन संघर्षों का असर समुद्री व्यापार और भारतीय नाविकों की सुरक्षा पर पड़ रहा है। प्रधानमंत्री मोदी ने भारत के इस रुख को दोहराया कि अंतरराष्ट्रीय संघर्षों का समाधान संवाद और कूटनीति से होना चाहिए। भारत ने शांति प्रयासों में सहयोग की अपनी तत्परता भी दोहराई।

वार्ता के बाद मोदी और पुतिन ने भारत-रूस औद्योगिक प्रदर्शनी का दौरा भी किया। वहां रूस की तकनीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, विमानन, अंतरिक्ष, परमाणु विज्ञान, भारी इंजीनियरिंग, खनन और बैंकिंग क्षेत्र से जुड़ी क्षमताओं को प्रदर्शित किया गया। प्रधानमंत्री मोदी ने पुतिन को तमिल की प्राचीन कृति ‘तिरुक्कुरल’ का रूसी अनुवाद भेंट किया। पुतिन ने मोदी को रूस में होने वाले अगले भारत-रूस वार्षिक शिखर सम्मेलन के लिए आमंत्रित किया, जिसे प्रधानमंत्री ने स्वीकार कर लिया।

पुतिन का पश्चिमी आर्थिक व्यवस्था पर निशाना

ब्रिक्स बिजनेस फोरम में पुतिन ने कहा कि दुनिया में आर्थिक शक्ति का पुराना संतुलन बदल रहा है। उनके अनुसार ब्रिक्स देशों का वैश्विक अर्थव्यवस्था में योगदान 40 प्रतिशत से अधिक है, जबकि जी7 की हिस्सेदारी करीब 29 प्रतिशत है। इसी तुलना के जरिए उन्होंने जी7 की प्रासंगिकता पर सवाल खड़ा किया। पुतिन ने रूस पर लगाए गए पश्चिमी प्रतिबंधों के संदर्भ में भी आर्थिक दबाव की नीति की आलोचना की। उनका तर्क था कि प्रतिबंधों और व्यापारिक पाबंदियों के बावजूद रूस की अर्थव्यवस्था वैश्विक परिस्थितियों में मजबूती दिखा रही है।

यह बयान ऐसे समय आया है जब ब्रिक्स के भीतर डॉलर पर निर्भरता कम करने, सीमा-पार भुगतान को आसान बनाने और स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने जैसे मुद्दे चर्चा में हैं। हालांकि ब्रिक्स के सभी सदस्य देशों की इस मुद्दे पर एक जैसी स्थिति नहीं है।

मोदी ने भी गिनाई ब्रिक्स की ताकत

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ब्रिक्स बिजनेस फोरम में कहा कि ब्रिक्स देशों की आर्थिक वृद्धि वैश्विक अर्थव्यवस्था की तुलना में करीब दोगुनी गति से हो रही है। उन्होंने कहा कि विस्तारित ब्रिक्स करीब 50 प्रतिशत विश्व आबादी, लगभग 40 प्रतिशत वैश्विक जीडीपी और 25 प्रतिशत से अधिक वैश्विक व्यापार का प्रतिनिधित्व करता है।

मोदी ने सुरक्षित समुद्री मार्गों और व्यापार की निर्बाध आवाजाही को महत्वपूर्ण बताया। पश्चिम एशिया और अन्य क्षेत्रों में जारी संघर्षों के बीच भारत का यह संदेश महत्वपूर्ण है, क्योंकि समुद्री मार्गों में व्यवधान का सीधा असर ऊर्जा आपूर्ति, व्यापार और वैश्विक आपूर्ति शृंखला पर पड़ता है।

पेजेशकियन का डॉलर व्यवस्था पर सवाल

ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन भी ब्रिक्स सम्मेलन के लिए नई दिल्ली पहुंचे। उन्होंने ब्रिक्स देशों के बीच राष्ट्रीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने की वकालत की और इसके लिए वित्तीय व्यवस्था को मजबूत करने की जरूरत बताई।

पेजेशकियन ने एकतरफा आर्थिक दबाव और प्रतिबंधों की आलोचना करते हुए ब्रिक्स को ऐसे देशों के बीच सहयोग का महत्वपूर्ण मंच बताया जो वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में अधिक संतुलन चाहते हैं।

दिल्ली में नेताओं का जमावड़ा

शिखर सम्मेलन से पहले रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन और दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति सिरिल रामाफोसा समेत कई देशों के शीर्ष नेता नई दिल्ली पहुंच चुके हैं। ब्रिक्स के सदस्य देशों के अलावा साझेदार देशों के नेता और वरिष्ठ प्रतिनिधि भी सम्मेलन में हिस्सा ले रहे हैं।

चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मौजूदगी भी सम्मेलन को विशेष महत्व दे रही है। भारत और चीन के संबंधों में पिछले कुछ समय में संवाद और संपर्क बढ़ने के बाद मोदी-शी मुलाकात पर पूरी दुनिया की नजर है। दोनों देशों के बीच सीमा, व्यापार और व्यापक द्विपक्षीय संबंधों से जुड़े मुद्दे इस बातचीत की पृष्ठभूमि में महत्वपूर्ण रहेंगे।

यूक्रेन से पश्चिम एशिया तक संकटों के बीच BRICS

इस बार का ब्रिक्स सम्मेलन ऐसे समय हो रहा है जब दुनिया यूक्रेन और पश्चिम एशिया में जारी संघर्षों, ऊर्जा सुरक्षा, समुद्री व्यापार में व्यवधान और वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता से जूझ रही है।

ब्रिक्स के विस्तार के बाद समूह का आर्थिक और जनसांख्यिकीय वजन काफी बढ़ा है, लेकिन सदस्य देशों के बीच कई मुद्दों पर मतभेद भी हैं। इसलिए दिल्ली सम्मेलन की सबसे बड़ी परीक्षा यह होगी कि क्या ब्रिक्स केवल बदलती वैश्विक शक्ति-समीकरण का राजनीतिक मंच बनकर रहता है या व्यापार, वित्त, भुगतान व्यवस्था और वैश्विक संस्थाओं में सुधार जैसे मुद्दों पर कोई ठोस साझा पहल सामने आती है।

भारत के लिए यह सम्मेलन विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। एक तरफ नई दिल्ली रूस और ईरान जैसे देशों के साथ रणनीतिक और आर्थिक संबंध बनाए हुए है, दूसरी ओर अमेरिका तथा पश्चिमी देशों के साथ भी उसके महत्वपूर्ण रणनीतिक रिश्ते हैं। ऐसे में प्रधानमंत्री मोदी के सामने चुनौती केवल ब्रिक्स को सफल बनाना नहीं, बल्कि भारत की रणनीतिक स्वायत्तता और राष्ट्रीय हितों के बीच संतुलन बनाए रखना भी है।

12-13 सितंबर को होने वाला मुख्य शिखर सम्मेलन इस पूरी कूटनीतिक कवायद का निर्णायक चरण होगा। दिल्ली में पुतिन की मौजूदगी, मोदी के साथ उनकी महत्वपूर्ण वार्ता, पश्चिमी आर्थिक व्यवस्था पर उनका तीखा संदेश और शी जिनपिंग की प्रस्तावित भागीदारी ने इस सम्मेलन को केवल आर्थिक बैठक से कहीं अधिक महत्वपूर्ण वैश्विक कूटनीतिक आयोजन बना दिया है।

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