अगर थोड़ा पीछे मुड़ कर देखें तो एलिस एक्का जैसी लेखिका यहां हुई हैं, जिन्होंने हिन्दी लेखन में अपनी छाप छोड़ी है. महानगरीय कथा लेखिकाओं से अलग हटकर झारखंड की लेखिकाओं ने इस भौगोलिक क्षेत्र और व्यक्तियों को अपनी कथाओं में प्रमुखता से स्थान दिया है. अगर कुछ कथा लेखिकाओं की चर्चा यहां करूँ तो प्रासंगिक होगा. ये लेखिकाएं हैं -अनिता रश्मि, वंदना टेटे, विनीता परमार, रश्मि शर्मा, सारिका भूषण इत्यादि. अब तक साझा संकलनों में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाने के बाद चर्चित कवयित्री , लेखिका प्रतिमा त्रिपाठी ने वृहत् हिन्दी उपन्यास के साथ धमाकेदार उपस्थिति दर्ज करायी है. “एक अनोखा प्रेम ” प्रतिमा त्रिपाठी जी का पहला उपन्यास है. 351 पृष्ठों के इस उपन्यास का ताना बाना पूर्ण रूपेण समकालीन समाज की घटनाओं को लेकर बुना गया है. प्रतिमा जी के सारे पात्र हमारे इर्द- गिर्द के लगते हैं. उपन्यास का विकास बड़ा ही स्वाभाविक ढंग से हुआ है. इसमें कहीं नाटकीयता नहीं है. पात्रों के चरित्र का विकास भी बड़ा स्वाभाविक ” आर्गेनिक “है. लेखिका पात्रों पर अपने विचार थोपती नहीं लगती. न ही पात्रों के संबाद, भाषा, तकिया कलाम आयातित लगते है. प्रतिमा की भाषा प्रांजल है पर उन्होंने सायास अपने पात्रों को विदुषी की तरह बात करते नहीं पेश किया है.
उपन्यास के प्रारंभ में अपने उद्गार व्यक्त करते हुए मुकेश कुमार सिन्हा जी लिखते हैं: “‘एक अनोखा प्रेम ‘ में दर्शन है, कला है, विचार है, सुझाव है, रोमांस है, रोमांच है. शब्दों का सुंदर प्रयोग है-तुम दोनों तो अजनबियों की तरह व्यवहार कर रहे हो. अरे यार! आराम से बैठो…सबसे पहले तो अपने बीच के भारत-पाकिस्तान की सीमा विवाद को समाप्त करो. वहीं, ‘हे ईश्वर किस जलेबी के साथ मुझे उलझा दिए. जिसकी मिठास मुझे लुभाती है और करीब आता हूं तो उलझ जाता हूँ ‘बस यह बानगी है. ”
मुकेश जी ने संक्षेप में उपन्यास के मूल तत्व की चर्चा की है. प्रतिमा त्रिपाठी जी स्वयं लिखती हैं:” यह रचना भी निःस्वार्थ मित्रता, अटूट प्रेम आस्था, विश्वास के साथ ही पारिवारिक कलह , विद्वेष ,स्वार्थ, ईर्ष्या, जीवन की तमाम प्रवंचनावों ,सामाजिक विसंगतियों की कोमल कठोर भावनाओं के धागे से बुनी गयी हैं. प्रत्येक स्त्री के जीवन की गाथा है-“एक अनोखा प्रेम ” की कथा. ” एक सफल उपन्यास वही है जो आपके दृष्टिकोण को प्रभावित करता है. लगता है प्रतिमा को पहले प्रयास में ही इसमें आंशिक सफलता मिल गई! उपन्यास पठनीय और संग्रहणीय है .छपाई उत्कृष्ट है मुखपृष्ठ आकर्षक है. उपन्यासकार ने शीर्षक पर और ध्यान दिया होता तो बेहतर हो सकता था.
उपन्यास: एक अनोखा प्रेम उपन्यासकार:प्रतिमा त्रिपाठी प्रकाशक:प्राची डिजिटल पृष्ठ:351. मूल्य:रू610.

(प्रमोद कुमार झा तीन दशक से अधिक समय तक आकाशवाणी और दूरदर्शन के वरिष्ठ पदों पर कार्यरत रहे. एक चर्चित अनुवादक और हिन्दी, अंग्रेजी, मैथिली के लेखक, आलोचक और कला-संस्कृति-साहित्य पर स्तंभकार हैं।)
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