⋅दिलचस्प बात यह है कि दिल्ली में BRICS सम्मेलन के खत्म होने के बाद भी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से सम्मेलन पर कोई नई प्रत्यक्ष टिप्पणी सामने नहीं आई है। ऐसे समय में जब ट्रंप प्रशासन की टैरिफ नीति और अमेरिका की आर्थिक प्राथमिकताओं को लेकर BRICS देशों में चिंता व्यक्त की गई है, ट्रंप की चुप्पी अपने आप में कूटनीतिक चर्चा का विषय बन गई है। क्या अमेरिका BRICS के बढ़ते प्रभाव को फिलहाल नजरअंदाज करना चाहता है या वाशिंगटन इस समूह के अगले कदम का इंतजार कर रहा है—यह सवाल अब अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में अहम हो गया है।
दिल्ली सम्मेलन का संदेश हालांकि केवल अमेरिका तक सीमित नहीं रहा। भारत ने BRICS को किसी देश के खिलाफ गठबंधन बनाने के बजाय ग्लोबल साउथ की आवाज को मजबूत करने वाले मंच के रूप में पेश किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी भारत की स्वतंत्र विदेश नीति को रेखांकित किया और BRICS के साथ-साथ दुनिया के अन्य प्रमुख शक्ति केंद्रों के साथ संबंधों को संतुलित रखने का संकेत दिया।
इसी बीच चीन की ओर से आया बयान इस सम्मेलन के सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक संदेशों में शामिल हो गया है। चीनी विदेश मंत्री वांग यी ने 14 सितंबर को कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच बातचीत में यह महत्वपूर्ण सहमति बनी कि भारत और चीन को “प्रतिद्वंद्वी नहीं, साझेदार” के रूप में देखना चाहिए।
वांग यी का यह बयान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि पिछले कुछ वर्षों में सीमा विवाद और आपसी अविश्वास ने भारत-चीन संबंधों को प्रभावित किया है। अब चीन खुले तौर पर दोनों देशों के संबंधों को साझेदारी और विकास के नजरिये से आगे बढ़ाने की बात कर रहा है।
शी जिनपिंग ने भी मोदी के साथ बैठक में कहा कि चीन और भारत दोनों अलग-अलग राष्ट्रीय परिस्थितियों वाले देश हैं, लेकिन दोनों को एक-दूसरे की ताकत का लाभ उठाना चाहिए, सहयोग करना चाहिए और साथ मिलकर विकास करना चाहिए। चीन के आधिकारिक बयान के मुताबिक शी ने दोनों देशों से सीमा क्षेत्रों में शांति बनाए रखने, आर्थिक एवं व्यापारिक संबंधों को स्थिर करने और BRICS तथा अन्य बहुपक्षीय मंचों पर सहयोग बढ़ाने की अपील की।
प्रधानमंत्री मोदी की ओर से भी स्पष्ट संदेश दिया गया कि भारत-चीन संबंध किसी तीसरे देश के प्रभाव से निर्धारित नहीं होते। भारत ने चीन के साथ संबंधों को रणनीतिक और दीर्घकालिक दृष्टि से देखने की बात कही तथा अगले साल चीन की BRICS अध्यक्षता में सहयोग जारी रखने का भरोसा दिया।
यानी दिल्ली BRICS सम्मेलन से दो समानांतर संदेश निकलते दिखाई दे रहे हैं। पहला—BRICS देश वैश्विक व्यापार और आर्थिक व्यवस्था में एकतरफा दबाव और संरक्षणवाद के खिलाफ सामूहिक आवाज उठाना चाहते हैं। दूसरा—भारत और चीन अपने द्विपक्षीय संबंधों को फिर से पटरी पर लाने की कोशिश कर रहे हैं।
BRICS घोषणा-पत्र में कहा गया है कि एकतरफा बढ़ाए गए टैरिफ और गैर-टैरिफ उपाय वैश्विक व्यापार तथा आपूर्ति श्रृंखलाओं को नुकसान पहुंचा सकते हैं। घोषणा में एकतरफा आर्थिक और सेकेंडरी प्रतिबंधों का भी विरोध किया गया है। साथ ही BRICS ने बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था और ग्लोबल साउथ की अधिक प्रभावी भूमिका की वकालत की है।
यहीं से अमेरिका और ट्रंप का सवाल फिर सामने आता है। BRICS ने अमेरिका का नाम लिए बिना उन नीतियों पर सवाल उठाए हैं जिन्हें ट्रंप प्रशासन अपनी आर्थिक और विदेश नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा मानता है। लेकिन सम्मेलन के बाद ट्रंप की ओर से अभी कोई नया प्रत्यक्ष जवाब नहीं आया है।
दरअसल, भारत की पूरी रणनीति भी इस सम्मेलन में महत्वपूर्ण रही। नई दिल्ली ने BRICS को अमेरिका-विरोधी संगठन के रूप में पेश करने से परहेज किया, लेकिन साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि भारत किसी एक शक्ति केंद्र के दबाव में अपनी विदेश नीति तय नहीं करेगा। यही वजह है कि दिल्ली सम्मेलन को केवल BRICS की बैठक के बजाय बदलती वैश्विक शक्ति-समीकरण में भारत की स्वतंत्र कूटनीतिक स्थिति के प्रदर्शन के रूप में भी देखा जा रहा है।और इसी तस्वीर में चीन की नई भाषा सबसे महत्वपूर्ण हो जाती है—“प्रतिद्वंद्वी नहीं, साझेदार।”
यदि भारत और चीन वास्तव में इस सोच को आगे बढ़ाते हैं, सीमा पर शांति कायम रहती है और दोनों देश BRICS तथा ग्लोबल साउथ के मुद्दों पर अधिक समन्वय करते हैं, तो इसका असर केवल एशिया तक सीमित नहीं रहेगा। इससे वैश्विक शक्ति-संतुलन पर भी प्रभाव पड़ सकता है।
अब निगाहें वाशिंगटन पर हैं। दिल्ली से निकले इस संदेश पर डोनाल्ड ट्रंप कब और किस अंदाज में प्रतिक्रिया देते हैं, यह आने वाले दिनों में इस कहानी का अगला महत्वपूर्ण अध्याय हो सकता है।
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