भारत के वैश्विक सांस्कृतिक सम्बंधों पर 14 से 3 दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन करेगा आईजीएनसीए, 50 देशों के प्रतिनिधि होंगे शामिल

भारत की सभ्यतागत विरासत और विश्व के विभिन्न क्षेत्रों के साथ उसके ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक सम्बंधों की व्यापक पड़ताल के उद्देश्य से संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार के स्वायत्त संस्थान इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र (आईजीएनसीए) द्वारा ‘बृहत्तर भारत’ योजना के अंतर्गत ‘विश्व भर में भारत के सांस्कृतिक सम्बंध’ (Bharat’s Cultural Connections across the Globe) विषय पर तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया जा रहा है। 14 से 16 अक्टूबर 2026 तक विज्ञान भवन, नई दिल्ली में आयोजित होने वाले इस सम्मेलन का उद्घाटन सत्र 14 अक्टूबर को सुबह 10 बजे प्रारम्भ होगा।

प्रतीकात्मक तस्वीर
Written By : डेस्क | Updated on: October 12, 2026 10:56 pm

उद्घाटन केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत करेंगे। इस अवसर पर माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक विशेष वीडियो संदेश के माध्यम से उपस्थित जनसमूह को संबोधित करेंगे। केंद्रीय संस्कृति सचिव विवेक अग्रवाल का परिचयात्मक संबोधन होगा, जबकि आईजीएनसीए के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी स्वागत भाषण देंगे। केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय के संयुक्त सचिव डॉ. अरविंद कुमार धन्यवाद ज्ञापन करेंगे।

यह सम्मेलन संस्कृति मंत्रालय की ‘ग्लोबल इंगेजमेंट स्कीम’ के अंतर्गत आईजीएनसीए द्वारा संचालित बृहत्तर भारत योजना (2026–2031) के तहत आयोजित किया जा रहा है। इस अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में 50 देशों के विद्वान, शोधकर्ता, विभिन्न संस्थानों के प्रतिनिधि और सांस्कृतिक क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञ भारत तथा विश्व के बीच सदियों से चले आ रहे सांस्कृतिक संवाद, ज्ञान के आदान-प्रदान और सभ्यतागत अंतर्सम्बंधों के विविध आयामों पर विचार-विमर्श करेंगे। सम्मेलन का उद्देश्य इन सम्बंधों को ऐतिहासिक साक्ष्यों, अकादमिक अनुसंधान और समकालीन दृष्टिकोणों के आधार पर समझना तथा सहयोग की संभावनाओं को प्रोत्साहित करना है। सम्मेलन के दौरान ‘एशिया की साझा सांस्कृतिक विरासत’ शीर्षक से एक प्रदर्शनी भी आयोजित की जाएगी। इसमें भारत और एशिया के अन्य देशों के बीच साझा विरासत तथा ऐतिहासिक सांस्कृतिक सम्बंधों को प्रदर्शित किया जाएगा।

भारत की सांस्कृतिक विरासत को वैश्विक परिप्रेक्ष्य में समझने का अवसर

प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने भी विभिन्न अवसरों पर भारत की सांस्कृतिक विरासत को समझने, उस पर गर्व करने और विश्व के साथ उसके सम्बंधों को व्यापक संदर्भ में देखने की आवश्यकता पर बल दिया है। भारत की सभ्यतागत दृष्टि में संस्कृति का विकास संवाद, सह-अस्तित्व और परस्पर आदान-प्रदान की प्रक्रियाओं से जुड़ा रहा है। 15 अगस्त 2022 को लाल किले से दिए गए अपने संबोधन में उन्होंने विरासत पर गर्व करने का आह्वान किया था। 21 नवंबर 2024 को गुयाना की संसद में अपने संबोधन के दौरान उन्होंने ‘डेमोक्रेसी फर्स्ट, ह्यूमैनिटी फर्स्ट’ की भावना के साथ भारत की ‘विश्व बंधु’ की भूमिका का उल्लेख किया था।

दस प्रमुख विषयों पर केंद्रित होगा सम्मेलन

सम्मेलन में भारत के वैश्विक सांस्कृतिक सम्बंधों के दस व्यापक विषयों पर चर्चा की जाएगी। इनमें प्रारंभिक संपर्क और सभ्यतागत अंतःक्रियाएं; धार्मिक परम्पराएं, ज्ञान प्रणालिया और दर्शन; विभिन्न सभ्यताओं के बीच भाषाएं : प्रसार, परिवर्तन और साहित्यिक सेतु; कला में विचारों की अभिव्यक्ति; वस्त्र एवं परिधान परम्पराएं; खानपान और पाक परम्पराओं का आदान-प्रदान; सांस्कृतिक अभिव्यक्तियां और उनका समन्वय; प्रदर्शनकारी कलाएं एवं जीवंत परम्पराएं; व्यापार-वाणिज्य के माध्यम से वस्तुओं और विचारों का प्रसार तथा प्रवासी समुदायों, सांस्कृतिक संरक्षण और सभ्यतागत निरंतरता जैसे विषय शामिल हैं।

इन विषयों के माध्यम से सम्मेलन भारत के वैश्विक सांस्कृतिक सम्बंधों को केवल अतीत की ऐतिहासिक घटनाओं के रूप में नहीं, बल्कि उन जीवंत प्रक्रियाओं के रूप में देखने का अवसर प्रदान करेगा, जिनके माध्यम से समाजों ने एक-दूसरे के विचारों, कलाओं, ज्ञान और जीवन-पद्धतियों को ग्रहण किया, उनका स्थानीय संदर्भों में रूपांतरण किया और नई सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों का विकास किया।

बृहत्तर भारत परिषद् के शताब्दी वर्ष में ऐतिहासिक पहल

यह सम्मेलन ऐसे समय में आयोजित हो रहा है, जब बृहत्तर भारत परिषद् (Greater India Society) की स्थापना के सौ वर्ष पूरे हो रहे हैं। परिषद की स्थापना 14 अक्टूबर 1926 को कलकत्ता में भारतीय विद्वानों के एक समूह ने भारत के व्यापक सभ्यतागत संपर्कों के व्यवस्थित अध्ययन को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से की थी। इस बौद्धिक प्रयास से राधाकुमुद मुखर्जी, प्रबोध चंद्र बागची, जदुनाथ सरकार, सुनीति कुमार चटर्जी, रमेश चंद्र मजूमदार, फणीन्द्रनाथ बोस, कालिदास नाग और बिजन राज चटर्जी जैसे विद्वान जुड़े थे। गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर को इस बौद्धिक पहल का आध्यात्मिक मार्गदर्शक माना गया। परिषद के शताब्दी वर्ष में आयोजित यह सम्मेलन उस बौद्धिक परम्परा को समकालीन शोध-पद्धतियों और नए दृष्टिकोणों के साथ आगे बढ़ाने का अवसर है।

राजनीतिक विस्तार नहीं, सभ्यतागत संवाद की अवधारणा है बृहत्तर भारत

‘बृहत्तर भारत’ की अवधारणा किसी राजनीतिक या क्षेत्रीय विस्तार का विचार नहीं, बल्कि सदियों से विभिन्न सभ्यताओं के बीच विकसित हुए सांस्कृतिक संपर्कों, विचारों के आदान-प्रदान, पारस्परिक प्रभाव और स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप हुए रूपांतरण की व्यापक सभ्यतागत परिकल्पना है। भारत की सांस्कृतिक परंपराएं समुद्री एवं स्थल व्यापार मार्गों, तीर्थयात्राओं, बौद्धिक और धार्मिक यात्राओं, मठीय शिक्षा-परम्पराओं, प्रवास, कूटनीतिक संपर्कों तथा व्यापारिक नेटवर्क के माध्यम से विश्व के अनेक क्षेत्रों तक पहुंचीं। इन संपर्कों ने भारतीय उपमहाद्वीप और अन्य समाजों के बीच संवाद के ऐसे सेतु निर्मित किए, जिनके प्रभाव आज भी विभिन्न सांस्कृतिक परम्पराओं में दिखाई देते हैं। भारत और विश्व के बीच इन ऐतिहासिक सम्बंधों के प्रमाण विभिन्न देशों के शिलालेखों, पांडुलिपियों, स्थापत्य, साहित्य, कला, भाषाओं, धार्मिक परंपराओं और प्रदर्शनकारी कलाओं में मिलते हैं। कंबोडिया, वियतनाम, थाईलैंड, इंडोनेशिया और मलय प्रायद्वीप में प्राप्त संस्कृत एवं पालि अभिलेख; कंबोडिया का अंकोरवाट, इंडोनेशिया का बोरोबुदुर और प्रम्बानन तथा म्यांमार का बगान जैसे स्थापत्य परिसर इस सांस्कृतिक अंतर्सम्बंध के महत्त्वपूर्ण उदाहरण हैं।

यह ऐतिहासिक प्रक्रिया लगभग तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व से 15वीं शताब्दी ईस्वी तक विभिन्न रूपों में विकसित हुई और आधुनिक काल में भी नए संदर्भों के साथ जारी रही। भारतीय प्रवासी समुदायों ने भाषा, साहित्य, धर्म, त्योहारों, खानपान और सामाजिक-सांस्कृतिक परम्पराओं के माध्यम से इन सम्बंधों को आगे बढ़ाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

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