समापन सत्र के मुख्य अतिथि भारतीय सांस्कृतिक सम्बंध परिषद् के पूर्व अध्यक्ष एवं पूर्व राज्यसभा सांसद डॉ. विनय सहस्रबुद्धे तथा मुख्य वक्ता नीति आयोग के पूर्व मुख्य कार्यकारी अधिकारी अमिताभ कांत थे। सम्मेलन के संरक्षक एवं केन्द्रीय संस्कृति सचिव विवेक अग्रवाल ने भी समापन सत्र में विचार व्यक्त किए, जबकि सम्मेलन के संरक्षक डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने तीन दिनों के विमर्श और कार्यवाहियों की रिपोर्ट प्रस्तुत की। सम्मेलन के संयोजक एवं आईजीएनसीए के बृहत्तर भारत विभाग के अध्यक्ष प्रो. धर्म चंद चौबे ने धन्यवाद ज्ञापन किया। इस अवसर पर केन्द्रीय संस्कृति मंत्रालय के अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक सम्बंध विभाग के संयुक्त सचिव डॉ. अरविंद कुमार भी उपस्थित रहे।
डॉ. विनय सहस्रबुद्धे ने कहा कि भारतीय दर्शन और संस्कृति का प्रसार विस्तारवाद अथवा विजय के माध्यम से नहीं, बल्कि स्वाभाविक, सहज और शांतिपूर्ण सांस्कृतिक सम्बंधों से हुआ। भारत के विचारों, ज्ञान और परम्पराओं को विश्व तक पहुंचाने में सैन्य शक्ति या कूटनीति के बजाय संस्कृति की प्रमुख भूमिका रही। उन्होंने संस्कृत के प्रति अंतरराष्ट्रीय रुचि, भारतीय गणित एवं दर्शन, रामायण-महाभारत, शास्त्रीय और लोक नृत्य परम्पराओं, आयुर्वेद तथा सिद्ध चिकित्सा पद्धति के वैश्विक प्रभाव का उल्लेख किया। उन्होंने वैश्विक मंचों पर भारतीय विरासत की दृश्यता बढ़ाने, भ्रांतियां दूर करने, पड़ोसी देशों से संवाद मजबूत करने और उनकी भाषाएं सीखने पर बल दिया। साथ ही कहा कि भारत का आचरण उन मूल्यों के अनुरूप होना चाहिए, जिनकी वह वकालत करता है।
मुख्य वक्ता के रूप में अमिताभ कांत ने कहा कि व्यापारियों, भिक्षुओं, विद्वानों, कलाकारों और यात्रियों ने सदियों से सांस्कृतिक आदान-प्रदान के जीवंत नेटवर्क विकसित किए। उन्होंने भौगोलिक संकेतक (जीआई) संरक्षण, सामूहिक ब्रांडिंग, डिजिटल बिक्री और डिजाइनरों के साथ साझेदारी के माध्यम से कारीगरों को उनके काम से उत्पन्न मूल्य में उचित हिस्सा दिलाने की आवश्यकता बताई। उन्होंने विरासत को समकालीन अवसरों से जोड़ने, परम्पराओं के प्रति आत्मविश्वास बनाए रखने और सांस्कृतिक आदान-प्रदान बढ़ाने का आह्वान करते हुए संस्कृति मंत्रालय तथा आईजीएनसीए को बधाई दी।
विवेक अग्रवाल ने कहा कि संस्कृति मंत्रालय की वैश्विक सहभागिता योजना के अंतर्गत बृहत्तर भारत परियोजना का उद्देश्य विद्वानों, शैक्षणिक संस्थानों और भारत मैत्री समितियों के बीच साझेदारी से अंतरराष्ट्रीय सहयोग बढ़ाना है। उन्होंने ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक सम्बंधों की स्थापना के लिए साक्ष्यों और अकादमिक कठोरता पर आधारित साझा शोध की आवश्यकता बताई।
डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने बताया कि सम्मेलन में 28 सत्रों के दौरान 270 शोधपत्र प्रस्तुत किए गए और 1,350 से अधिक प्रतिनिधियों ने पंजीकरण कराया। सम्मेलन के साथ आयोजित 28 पैनलों वाली प्रदर्शनी ने विभिन्न देशों के साथ भारत के सांस्कृतिक एवं बौद्धिक सम्बंधों को प्रदर्शित किया। उन्होंने कहा कि सांस्कृतिक जुड़ाव समाजों को एक सूत्र में बांधते हैं। युवा प्रतिनिधियों की उत्साहजनक भागीदारी सम्मेलन की उल्लेखनीय उपलब्धि रही।
सम्मेलन के तीसरे दिन विश्वविख्यात नृत्यगुरु, पूर्व राज्यसभा सांसद एवं आईजीएनसीए की ट्रस्टी पद्म विभूषण डॉ. सोनल मानसिंह ने भारत के चिरस्थायी सभ्यतागत प्रभाव और सांस्कृतिक परम्पराओं की शक्ति पर प्रकाश डाला। अष्टभुजा दुर्गा और ज्वालामुखी मंदिर के व्यापक प्रभाव का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा, “सांस्कृतिक कूटनीति सदियों से चली आ रही है। सिल्क रूट हो, समुद्री मार्ग हो या स्थल मार्ग, यदि संस्कृति नहीं है तो ये मार्ग बेमानी हैं। संस्कृति ही इन संपर्कों को अर्थ देती है और समाजों को एक-दूसरे से जोड़ती है।”
प्रसिद्ध लेखक एवं राजनयिक अमीश त्रिपाठी ने ऑनलाइन माध्यम से भारत की समुद्री परम्पराओं पर विचार रखे। भाजपा के विदेश मामलों के विभाग के प्रभारी एवं लेखक श्री विजय चौथाईवाले ने योग, विदेशों में बने मंदिरों और बौद्ध सर्किट के माध्यम से सांस्कृतिक कूटनीति का महत्त्व बताया। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के अपर महानिदेशक जाह्नवीज शर्मा ने हिंद महासागर क्षेत्र में ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक सम्बंधों को मजबूत बनाने में ‘प्रोजेक्ट मौसम’ की भूमिका रेखांकित की। सत्र का संचालन आईजीएनसीए के डीन एवं कलाकोश प्रभाग के प्रमुख डॉ. सुधीर लाल ने किया। चर्चाओं में प्राचीन समुद्री मार्गों, जीवंत परम्पराओं और सांस्कृतिक कूटनीति के माध्यम से भारत की विरासत की समकालीन प्रासंगिकता सामने आई।
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