CJP संस्थापक अभिजीत दीपके ने शुक्रवार शाम पांच बजे कनॉट प्लेस के सेंट्रल पार्क में ‘लहरा दो तिरंगा’ मार्च का आह्वान किया है। पार्टी का कहना है कि यह कार्यक्रम उसके नेताओं आशुतोष रांका और सौरव दास के समर्थन में आयोजित किया जा रहा है। दोनों नेताओं को पांच दिन की न्यायिक हिरासत में भेजकर तिहाड़ जेल में रखा गया है। उन पर शांति बनाए रखने के लिए दिए गए बांड का उल्लंघन करने और जंतर-मंतर में कथित तौर पर अनधिकृत प्रवेश करने के आरोप हैं। दीपके ने राष्ट्रीय ध्वज के साथ प्रदर्शन करने को लोकतांत्रिक अधिकार बताते हुए समर्थकों से मार्च में शामिल होने की अपील की है।
दो दिन बंद रहेगा सेंट्रल पार्क
NDMC ने 15 अक्टूबर को जारी नोटिस में प्रशासनिक कारणों का हवाला देते हुए सेंट्रल पार्क को दो दिन बंद रखने की घोषणा की है। नोटिस में बंदी का कोई विस्तृत कारण नहीं बताया गया है। हालांकि, यह आदेश ऐसे समय आया है जब CJP ने इसी स्थान पर तिरंगा मार्च करने की घोषणा की है।
दिल्ली पुलिस ने निषेधाज्ञा का हवाला देते हुए लोगों से प्रदर्शन स्थल पर नहीं आने की अपील की है। पुलिस ने कहा है कि राष्ट्रीय ध्वज फहराने, उसे लेकर चलने और राष्ट्रगान गाने के दौरान निर्धारित नियमों, सम्मान और मर्यादा का पालन सुनिश्चित किया जाएगा। पुलिस के अनुसार, उपयुक्त स्थान पर 11 लोगों के समूह को तिरंगा लेकर राष्ट्रगान गाने की सुविधा दी जा सकती है।
दूसरी ओर, दिल्ली हाई कोर्ट ने 16 अक्टूबर के प्रस्तावित प्रदर्शन पर रोक लगाने से इनकार कर दिया है। हालांकि, अदालत ने पुलिस के इस आश्वासन को रिकॉर्ड पर लिया कि प्रदर्शनकारियों की गतिविधियों को नियंत्रित करने और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए आवश्यक कदम उठाए जाएंगे। कनॉट प्लेस के व्यापारियों ने त्योहारों के मौसम में प्रदर्शन और संभावित प्रतिबंधों से कारोबार तथा आम लोगों की आवाजाही प्रभावित होने की आशंका जताई है।
सुप्रीम कोर्ट में भीड़ और राजनीतिक प्रदर्शन पर सवाल
सुप्रीम कोर्ट में 15 अक्टूबर को हुई सुनवाई के दौरान CJI सूर्यकांत ने स्पष्ट किया कि कोई भी न्यायपालिका को डराने-धमकाने या दबाव में लाने की कोशिश नहीं कर सकता। यह टिप्पणी 12 अक्टूबर को इंडिया ब्लॉक के नेताओं के सुप्रीम कोर्ट की ओर मार्च करने के बाद दाखिल उस याचिका की सुनवाई के दौरान आई, जिसमें अदालत परिसर और उसके आसपास राजनीतिक प्रदर्शनों को नियंत्रित करने के लिए दिशा-निर्देश बनाने की मांग की गई है।
सुनवाई के दौरान अदालत ने संबंधित याचिका पर नोटिस जारी किया और घटनाक्रम से जुड़े सीसीटीवी फुटेज तथा अन्य डिजिटल साक्ष्यों को सुरक्षित रखने का निर्देश दिया। इस मामले का केंद्र अदालत परिसर की गरिमा, सुरक्षा और राजनीतिक प्रदर्शनों के नियमन का सवाल है। इसे CJP के तिरंगा मार्च पर सीधे लागू हुआ कोई अलग प्रतिबंधात्मक आदेश नहीं समझा जाना चाहिए।
विरोध का अधिकार और कानून-व्यवस्था की चुनौती
दोनों घटनाक्रमों के बीच बड़ा सवाल यह है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में विरोध दर्ज कराने के अधिकार और सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी के बीच संतुलन कैसे कायम किया जाए। CJP तिरंगा मार्च को लोकतांत्रिक अधिकार के रूप में पेश कर रही है, जबकि पुलिस और प्रशासन कानून-व्यवस्था, यातायात तथा आम नागरिकों की सुविधा को लेकर सतर्क हैं।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी भी यह रेखांकित करती है कि न्यायिक प्रक्रिया पर राजनीतिक दबाव बनाने और कानूनी सवालों को अदालत के सामने रखने में अंतर है। अदालत द्वारा नोटिस जारी किए जाने का अर्थ है कि संबंधित पक्षों से जवाब मांगा गया है; इससे याचिका में लगाए गए आरोप अपने-आप सिद्ध नहीं होते।
अब सबकी नजर 16 अक्टूबर पर है। सेंट्रल पार्क बंद रहने, निषेधाज्ञा और पुलिस की अपील के बीच CJP अपने घोषित कार्यक्रम को किस रूप में आगे बढ़ाती है, यह देखना अहम होगा। इस पूरे घटनाक्रम में दिल्ली प्रशासन के सामने कानून-व्यवस्था बनाए रखने की चुनौती है, जबकि राजनीतिक और नागरिक समूहों के लिए विरोध के अधिकार तथा उसकी कानूनी सीमाओं का सवाल केंद्र में बना हुआ है।