3 नवंबर को हुए इस चुनाव में महंगाई, जीवनयापन की बढ़ती लागत, ईरान के साथ युद्ध, आव्रजन नीति और सरकार के कामकाज को लेकर असंतोष प्रमुख मुद्दे रहे। समाचार एजेंसी रॉयटर्स और एसोसिएटेड प्रेस की रिपोर्टों के मुताबिक, डेमोक्रेट्स ने उन राज्यों और निर्वाचन क्षेत्रों में भी जीत दर्ज की है जहां पिछले राष्ट्रपति चुनाव में ट्रंप को उल्लेखनीय समर्थन मिला था।
435 हाउस और 35 सीनेट सीटों पर हुआ चुनाव
अमेरिकी मिडटर्म चुनाव में प्रतिनिधि सभा की सभी 435 सीटों पर मतदान हुआ, जबकि सीनेट की 100 सीटों में से 35 सीटों के लिए चुनाव कराया गया। सीनेट में 33 नियमित चुनाव और दो विशेष चुनाव शामिल थे।
4 नवंबर को भारतीय समयानुसार दोपहर 2:50 बजे उपलब्ध चुनावी आंकड़ों के मुताबिक:
सदन डेमोक्रेटिक पार्टी रिपब्लिकन पार्टी बहुमत
प्रतिनिधि सभा 228 139 218
सीनेट 54 44 51
प्रतिनिधि सभा में अभी 68 सीटों के परिणाम घोषित होना बाकी थे। सीनेट में मिसिसिपी और अलास्का की दो सीटों पर मतगणना जारी थी। सीनेट में डेमोक्रेटिक आंकड़े में दो निर्दलीय सदस्य भी शामिल हैं, जो डेमोक्रेट्स के साथ मतदान करते हैं। इसलिए डेमोक्रेटिक गठबंधन का आंकड़ा 54 है।
रिपब्लिकन पार्टी की हार के पांच प्रमुख कारण
1. महंगाई और जीवनयापन का खर्च: चुनाव से पहले कराए गए एग्जिट पोल के मुताबिक करीब 90 प्रतिशत मतदाताओं ने जीवनयापन की लागत को अपने मतदान के फैसले में महत्वपूर्ण मुद्दा बताया। महंगाई और रोजमर्रा की चीजों की बढ़ती कीमतों को लेकर मतदाताओं की नाराजगी रिपब्लिकन उम्मीदवारों के खिलाफ गई।
2. ईरान युद्ध का आर्थिक दबाव: ईरान के साथ आठ महीने से जारी संघर्ष के कारण तेल और गैस की आपूर्ति प्रभावित हुई। पेट्रोल-डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी ने अमेरिकी परिवारों पर आर्थिक दबाव बढ़ाया। इस मुद्दे पर ट्रंप प्रशासन को जवाबदेह ठहराया गया।
3. ट्रंप की नीतियों के प्रति असंतोष: आव्रजन, टैरिफ और आर्थिक नीतियों को लेकर रिपब्लिकन पार्टी को मतदाताओं की नाराजगी का सामना करना पड़ा।
4. रिपब्लिकन उम्मीदवारों की चुनौती: कई राज्यों में डेमोक्रेटिक उम्मीदवारों ने ऐसे रिपब्लिकन नेताओं को हराया, जिन्हें पहले मजबूत स्थिति में माना जा रहा था। टेक्सास, कंसास, ओहायो और साउथ कैरोलिना जैसे राज्यों में डेमोक्रेट्स की जीत इसका उदाहरण है।
5. स्वतंत्र मतदाताओं का समर्थन: डेमोक्रेट्स को अपने परंपरागत समर्थकों के साथ स्वतंत्र मतदाताओं का भी समर्थन मिला। रॉयटर्स के चुनावी विश्लेषण में इसे डेमोक्रेटिक पार्टी की व्यापक सफलता का महत्वपूर्ण कारण बताया गया है।
ट्रंप के लिए आगे क्या होंगी राजनीतिक चुनौतियां ?
अमेरिका में मिडटर्म चुनाव राष्ट्रपति के कार्यकाल के बीच में होते हैं। इन चुनावों का मकसद कांग्रेस की संरचना तय करना है। इस बार नतीजों ने ट्रंप के सामने ऐसी राजनीतिक स्थिति पैदा कर दी है जिसमें व्हाइट हाउस में राष्ट्रपति तो रिपब्लिकन पार्टी का रहेगा, लेकिन संसद के दोनों सदनों पर डेमोक्रेट्स का नियंत्रण होगा। इसका पहला असर विधायी कामकाज पर पड़ेगा। ट्रंप प्रशासन को बजट, नए कानूनों और बड़े नीतिगत प्रस्तावों को पारित कराने के लिए डेमोक्रेट्स का सहयोग लेना पड़ेगा। डेमोक्रेटिक बहुमत सरकारी अधिकारियों को संसदीय समितियों में बुलाकर उनसे जवाब मांग सकता है। प्रशासन के फैसलों, सरकारी खर्च और नीतियों की जांच भी तेज हो सकती है।
दूसरा बड़ा असर राष्ट्रपति की नियुक्तियों और प्रशासनिक फैसलों पर पड़ सकता है। सीनेट की भूमिका संघीय नियुक्तियों और कई महत्वपूर्ण पदों की पुष्टि में होती है। डेमोक्रेटिक नियंत्रण से ट्रंप के लिए अपनी पसंद के उम्मीदवारों को मंजूरी दिलाना कठिन हो सकता है। महाभियोग (Impeachment) की राजनीतिक चर्चा भी तेज हो सकती है, हालांकि केवल सदन में बहुमत हासिल करने से राष्ट्रपति को पद से हटाया नहीं जा सकता। इसके लिए प्रतिनिधि सभा में महाभियोग प्रस्ताव पारित होने के बाद सीनेट में दो-तिहाई समर्थन जरूरी होता है। हालांकि ट्रंप के पास राष्ट्रपति के रूप में वीटो का अधिकार रहेगा। इसलिए डेमोक्रेटिक बहुमत के बावजूद उनकी सरकार के सभी फैसले रुक जाएंगे, ऐसा नहीं कहा जा सकता। रॉयटर्स के विश्लेषण के मुताबिक दोनों दलों के बीच विधायी गतिरोध की आशंका बढ़ गई है।
भारत-अमेरिका संबंधों पर क्या होगा असर ?
इस चुनाव का भारत के लिए भी खास महत्व है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और डोनाल्ड ट्रंप के बीच व्यक्तिगत राजनीतिक संबंधों के बावजूद पिछले कुछ समय से भारत-अमेरिका संबंधों में व्यापार शुल्क (टैरिफ), व्यापार समझौते और आव्रजन जैसे मुद्दों पर मतभेद सामने आते रहे हैं। व्यापार समझौते पर भारत को मिल सकती है राहत: रॉयटर्स की 4 नवंबर की रिपोर्ट में भारत के पूर्व वाणिज्य सचिव अनूप वाधवान के हवाले से कहा गया है कि कांग्रेस में ट्रंप की कमजोर स्थिति से मनमाने ढंग से टैरिफ लगाने की उनकी क्षमता पर दबाव पड़ सकता है। इससे भारत के साथ लंबित व्यापार समझौते की बातचीत को कुछ राहत मिलने की संभावना है। खासकर कृषि क्षेत्र के हितों की रक्षा को लेकर भारत को बातचीत में अधिक गुंजाइश मिल सकती है। हालांकि टैरिफ लगाने के लिए राष्ट्रपति के पास कुछ मौजूदा कानूनी अधिकार बने रहेंगे।
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