प्रदूषण की जहरीली मार के बीच धनतेरस पर बाजारों में उमड़ेगी भीड़, प्रतिबंध के बावजूद गूंज रहे पटाखे

दिल्ली-NCR में वायु प्रदूषण की स्थिति लगातार गंभीर होती जा रही है। राजधानी में 2 नवंबर को वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) 324 था, जो 3 नवंबर को बढ़कर 350 और 4 नवंबर को 377 तक पहुंच गया। यानी महज तीन दिनों में प्रदूषण का स्तर लगातार बढ़ा है। 5 नवंबर को भी सुबह हवा की गुणवत्ता बेहद खराब बनी रही। पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के पूर्वानुमान के मुताबिक 6 और 7 नवंबर को दिल्ली की हवा गंभीर श्रेणी में पहुंच सकती है। ऐसे चिंताजनक माहौल के बीच 6 नवंबर को धनतेरस और 8 नवंबर को दीपावली है। त्योहार को लेकर बाजारों में खरीदारी का उत्साह चरम पर है। सोने-चांदी से लेकर वाहन, इलेक्ट्रॉनिक्स और घरेलू सामान की दुकानों पर ग्राहकों की भीड़ उमड़ने की तैयारी है। दूसरी तरफ दीपावली पर आतिशबाजी की तैयारियां भी शुरू हो गई हैं।

Written By : रामनाथ राजेश | Updated on: November 6, 2026 12:31 am

हैरानी की बात यह है कि पटाखों पर प्रतिबंध और सुप्रीम कोर्ट के सख्त निर्देशों के बावजूद कई इलाकों में धनतेरस से पहले से ही पटाखों की आवाज सुनाई देने लगी है। अवैध पटाखों की बिक्री और भंडारण पर कार्रवाई के बावजूद इनका कारोबार पूरी तरह थमता नजर नहीं आ रहा। देश में हर साल दीपावली पर हजारों करोड़ रुपये के पटाखों का कारोबार होता है। ऐसे में सवाल है कि पहले से प्रदूषण की मार झेल रहे शहरों की हवा दीपावली के बाद कितनी जहरीली होगी? त्योहार की खुशियों के बीच क्या पर्यावरण और लोगों की सेहत की चिंता पीछे छूट जाएगी?

प्रतिबंध के बावजूद बाजारों में बिक रहे पटाखे, सुप्रीम कोर्ट ने भी जताई चिंता

पटाखों की बिक्री को नियंत्रित करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली-NCR में इस साल सशर्त छूट दी है। अदालत के निर्देश के मुताबिक केवल प्रमाणित ग्रीन पटाखों के निर्माण और बिक्री की अनुमति निर्धारित अवधि में दी गई है। 4 से 6 नवंबर तक इनकी बिक्री की अनुमति है, जबकि 7 और 8 नवंबर को सुबह 6 से 7 बजे तथा रात 8 से 10 बजे तक ही आतिशबाजी की जा सकेगी। 9 नवंबर से फिर पूर्ण प्रतिबंध लागू हो जाएगा।

इसके बावजूद बाजारों में नियमों की अनदेखी की खबरें सामने आ रही हैं। दिल्ली के सदर बाजार और कुतुब रोड जैसे इलाकों में निर्धारित बिक्री अवधि शुरू होने से पहले ही पटाखों की खरीद-बिक्री देखी गई। कुछ विक्रेता खुले तौर पर पटाखे बेचते नजर आए। कई उत्पादों की पैकेजिंग पर ग्रीन पटाखों के लोगो और QR कोड भी थे, लेकिन केवल हरे रंग का लोगो होना किसी पटाखे के प्रमाणित होने की गारंटी नहीं है।

इसी तरह की रिपोर्टों पर संज्ञान लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से प्रतिबंधों को सख्ती से लागू कराने को कहा है। अदालत ने लाइसेंस वाले और बिना लाइसेंस वाले पटाखों की बिक्री पर चिंता जताई है। दिल्ली में अवैध पटाखों के कारोबार पर पुलिस की कार्रवाई भी इस समस्या की गंभीरता बताती है। पिछले महीने पुलिस ने पांच थाना क्षेत्रों में छापेमारी कर 1,073 किलोग्राम से अधिक पटाखे जब्त किए और अवैध भंडारण तथा बिक्री के आरोप में 10 एफआईआर दर्ज कीं। राजधानी में लगभग 125 स्थायी पटाखा विक्रेता पंजीकृत हैं। इसके अलावा त्योहार के दौरान सीमित संख्या में अस्थायी लाइसेंस भी जारी किए जाते हैं।

7 हजार करोड़ रुपये का है शिवकाशी का पटाखा उद्योग, दीपावली पर होती है सबसे ज्यादा बिक्री

दीपावली पर पटाखों की मांग का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि तमिलनाडु का शिवकाशी देश में पटाखा निर्माण का सबसे बड़ा केंद्र है। यहां के पटाखा उद्योग का सालाना कारोबार करीब 7,000 करोड़ रुपये आंका गया है। देश के संगठित पटाखा कारोबार में शिवकाशी की हिस्सेदारी लगभग 85 प्रतिशत बताई जाती है। इस उद्योग से करीब 3 लाख लोगों को प्रत्यक्ष रोजगार मिलता है, जबकि लगभग 5 लाख परिवार इससे जुड़े हुए हैं। पटाखा उद्योग का कारोबार पूरे साल चलता है, लेकिन दीपावली इसका सबसे बड़ा बिक्री सीजन है।

उपलब्ध उद्योग अनुमानों के मुताबिक शिवकाशी के पटाखा कारोबार की करीब 80 प्रतिशत बिक्री दीपावली के दौरान होती है। यानी अकेले इस एक त्योहार के आसपास यहां से 4,000 करोड़ रुपये से अधिक के पटाखों की बिक्री का अनुमान है। यह आंकड़ा सिर्फ शिवकाशी के उद्योग से संबंधित है। इसे पूरे देश के पटाखा कारोबार का कुल आंकड़ा नहीं माना जा सकता। देशभर में पटाखों के अंतिम खुदरा कारोबार और अवैध बिक्री का कोई एक विश्वसनीय समेकित आंकड़ा उपलब्ध नहीं है।

ग्रीन पटाखों के नाम पर भी नियमों का उल्लंघन, पहचानना आसान नहीं

प्रदूषण की समस्या को देखते हुए ग्रीन पटाखों को पारंपरिक पटाखों के विकल्प के तौर पर पेश किया गया है। CSIR-NEERI ने SWAS, SAFAL और STAR जैसी कम प्रदूषण वाली श्रेणियों के पटाखों के फॉर्मूले विकसित किए हैं। इनमें कुछ उत्पादों से पारंपरिक पटाखों की तुलना में उत्सर्जन कम करने का दावा किया गया है। उदाहरण के लिए SWAS फॉर्मूलेशन से कणीय उत्सर्जन में लगभग 30 से 35 प्रतिशत तक कमी का दावा किया गया है। हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि ग्रीन पटाखे पूरी तरह प्रदूषण मुक्त हैं। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के मुताबिक सिर्फ CSIR-NEERI और PESO से आवश्यक प्रमाणन प्राप्त पटाखे ही निर्धारित शर्तों के तहत बेचे जा सकते हैं। उत्पाद पर लगा QR कोड और प्रमाणन की जांच जरूरी है। पारंपरिक पटाखे, बेरियम वाले पटाखे और लंबी लड़ियों की बिक्री पर रोक है।

दिल्ली ही नहीं, देश के दूसरे शहरों में भी बढ़ेगी प्रदूषण की चुनौती

दीपावली पर पटाखों का असर केवल दिल्ली-NCR तक सीमित नहीं रहता। पटना, लखनऊ, कानपुर, वाराणसी, जयपुर, भोपाल, मुंबई और कोलकाता जैसे शहरों में भी त्योहार के दौरान आतिशबाजी से प्रदूषण बढ़ने की आशंका रहती है।

पटाखों से निकलने वाले धुएं में PM2.5 और PM10 जैसे सूक्ष्म कणों के अलावा सल्फर डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड और विभिन्न धातुओं के कण हो सकते हैं। इनका असर सांस के मरीजों, बुजुर्गों और बच्चों पर विशेष रूप से पड़ता है। खास बात यह है कि इस बार दीपावली ऐसे समय में पड़ रही है जब उत्तर भारत में पराली जलाने की घटनाएं भी जारी हैं। हवा की गति कम होने पर प्रदूषक तत्व वातावरण में लंबे समय तक बने रह सकते हैं। ऐसे में पटाखों से होने वाला अतिरिक्त उत्सर्जन पहले से खराब हवा को और नुकसान पहुंचा सकता है।

त्योहार की खुशियां या जहरीली हवा का संकट?

धनतेरस से शुरू होकर दीपावली और उसके बाद छठ तक चलने वाले त्योहारों के इस मौसम में बाजारों में रौनक और खरीदारी का उत्साह स्वाभाविक है। पटाखा उद्योग से लाखों लोगों की रोजी-रोटी भी जुड़ी हुई है। लेकिन सवाल यह है कि क्या त्योहार मनाने के नाम पर पर्यावरण और लोगों की सेहत को नजरअंदाज किया जा सकता है?

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