राजभवन में आयोजित कैबिनेट विस्तार समारोह में भूपेंद्र सिंह चौधरी और मनोज कुमार पांडे ने कैबिनेट मंत्री के रूप में शपथ ली। वहीं कृष्णा पासवान, सुरेंद्र डिलेर, हंसराज विश्वकर्मा और कैलाश सिंह राजपूत को राज्य मंत्री बनाया गया। इसके अलावा अजीत सिंह पाल और सोमेंद्र तोमर को राज्य मंत्री से पदोन्नत कर स्वतंत्र प्रभार का दर्जा दिया गया।
योगी आदित्यनाथ सरकार के दूसरे कार्यकाल का यह दूसरा कैबिनेट विस्तार है। इससे पहले लोकसभा चुनाव 2024 से पहले भी मंत्रिमंडल में फेरबदल हुआ था। हालांकि इस बार का विस्तार इसलिए ज्यादा अहम माना जा रहा है क्योंकि 2027 विधानसभा चुनाव में अब नौ महीने से भी कम समय बचा है। भाजपा ने इस विस्तार के जरिए सामाजिक और क्षेत्रीय संतुलन साधने का स्पष्ट संकेत देने की कोशिश की है।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार भाजपा ने इस विस्तार में दलित, पिछड़ा, गैर-यादव ओबीसी और सवर्ण समीकरणों को साधने की रणनीति अपनाई है। समाजवादी पार्टी छोड़कर भाजपा में आए मनोज पांडे को कैबिनेट में शामिल कर पार्टी ने ब्राह्मण और पारंपरिक सपा समर्थक तबकों तक संदेश पहुंचाने की कोशिश की है। वहीं कृष्णा पासवान और सुरेंद्र डिलेर जैसे चेहरों के जरिए दलित और वाल्मीकि समाज को प्रतिनिधित्व देने का संकेत दिया गया है।
इस विस्तार की तुलना सितंबर 2021 के उस कैबिनेट विस्तार से की जा रही है, जब विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा ने जितिन प्रसाद को मंत्रिमंडल में शामिल कर ब्राह्मण समाज को राजनीतिक संदेश देने की कोशिश की थी। उस समय भी चुनाव से ठीक पहले कैबिनेट विस्तार की जरूरत पर सवाल उठे थे, लेकिन भाजपा ने इसे सामाजिक प्रतिनिधित्व और संगठनात्मक संतुलन से जोड़ा था।
मीडिया रिपोर्टों में यह भी कहा गया है कि भाजपा पश्चिमी उत्तर प्रदेश और गैर-यादव पिछड़े वर्गों पर विशेष ध्यान दे रही है। प्रदेश भाजपा के पूर्व अध्यक्ष भूपेंद्र सिंह चौधरी को कैबिनेट में शामिल किया जाना जाट और पश्चिमी यूपी के समीकरणों से जोड़कर देखा जा रहा है।
विपक्ष ने भी इस विस्तार पर सवाल उठाए हैं। समाजवादी पार्टी अध्यक्ष Akhilesh Yadav ने तंज कसते हुए इसे “दिल्ली से तय फार्मूला” बताया। हालांकि भाजपा नेताओं का कहना है कि मंत्रिमंडल विस्तार “सबका साथ, सबका विकास” की नीति के तहत सामाजिक प्रतिनिधित्व बढ़ाने के लिए किया गया है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि 2027 विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा संगठन और सरकार दोनों स्तर पर सामाजिक समीकरणों को मजबूत करने की रणनीति पर काम कर रही है। ऐसे में योगी मंत्रिमंडल का यह विस्तार सिर्फ प्रशासनिक बदलाव नहीं बल्कि चुनावी संदेश देने वाला राजनीतिक कदम माना जा रहा है।
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