पुस्तक समीक्षा : पढ़ें, प्रेमरंजन अनिमेष का गजल संग्रह ‘पहला मौसम’

पेशे से भारतीय रिजर्व बैंक के वरिष्ठ अधिकारी प्रेमरंजन अनिमेष का पिछले चार दशकों से साहित्य से गंभीर संबंध रहा है. तीन दशक से भी पहले, अंग्रेजी साहित्य में एम.ए .करने के बाद जीविका के लिए भले ही उन्होंने रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया जॉइन कर लिया हो पर साहित्य से उनका लगाव बढ़ता ही गया. पिछले साढ़े तीन दशकों में उन्होंने साहित्य के अनेक विधाओं में लेखन किया.

पुस्तक के आवरण का अंश
Written By : प्रमोद कुमार झा | Updated on: January 15, 2026 10:44 pm

उनकी कुछ कृतियों की ओर ध्यान दें: कविता संग्रह 1. मिट्टी के फल, 2.कोई नया समाचार 3. संगत 4. अच्छा आदमी 5. अमराई 6..अंधेरे में अंताक्षरी 7. बिना मुंडेर की छत 8.संक्रमणकाल 9. साइकिल पर संसार 10. माँ के साथ 11.स्त्रीसूक्त 12..जीवन खेल 13. कविता नई सदी 14. ऊंट और 15स्याही और रोशनाई .आइए इनकी कहानी संग्रह को देखें:1. एक मधुर सपना 2. एक स्वप्निल प्रेमकथा 3. गूंगी माँ का गीत, 4. पानी पानी 5. लड़की जिसे रोना नहीं आता था 6. नटूआ नाच. इनकी कविताएं खूब पढ़ी गईं, कहानियाँ लोगों ने बार बार पढ़ा . प्रेम रंजन अछिमेष को अब तक भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार, अमृतलाल नागर पुरस्कार और कथादेश शीर्ष पुरस्कार से विभूषित किया जा चुका है..प्रेमरंजन अनिमेष का ग़ज़ल संग्रह “पहला मौसम ” 168 पृष्ठ का है. इसमें उन्होंने 119 ग़ज़लों को शामिल किया है. प्रेम के ग़ज़लों की एक खासियत है कि इसमें आम जीवन के बहुत सारे पहलुओं को विषय बनाया गया है. इश्किया और नातिया ग़ज़लों से आगे जाकर प्रेम ने आम जिंदगी को भी ग़ज़ल में महत्पूर्ण जगह दी है.

इस संग्रह के पहली ग़ज़ल को ही देखिए : “माँओं की खोयी लोरियाँ ”

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माँओं की खोयी लोरियाँ ढूँढो/ घर में बिखरी कहानियाँ ढूँढो/ मैं उजाला तलाश करता हूँ/ तुम अंधेरे में सीढियाँ ढूंढ़ो /जिन किताबों को वक़्त पढ़ता है/उन किताबों की गलतियाँ ढूँढो”

प्रेमरंजन की एक और ग़ज़ल देखिए :  ‘थक गया हूं .. ‘

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“थक गया हूँ एक कोना चाहता हूं/ कब का जागा हूं मैं सोना चाहता हूँ/हैं भरी आँखें तू बरसा बूँदें अपनी/ पानी को पानी से धोना चाहता हूं/ उससे भी अच्छा मिलेगा कहते हैं सब/मैं वही टूटा खिलौना चाहता हूं “.

प्रेम की ग़ज़लों में कहीं भी आक्रोश नहीं है. बहुत सरल शब्दों में हौले से कोई गंभीर बात कह जाते हैं. इनकी ग़ज़लों को पढ़ते हुए कभी दुष्यंत कुमार और कभी निदा फाजली की याद आती है. इनकी ग़ज़लों के कुछ शीर्षक देखिए: “एक सच है/ फिर सन्नाटा/ घर कोई/ कोई धुन/ मेरे अन्दर/ सोचने से/तेरा यकीन/ भाषा ” इत्यादि. प्रेम की इस ग़ज़ल संग्रह पर प्रसिद्ध फ़िल्मकार, शाइर मुजफ्फर अली ने कहा: “ऐसे कितने ही बाकमाल अशआर के शायर प्रेम रंजन अनिमेष को उनके ‘पहला मौसम ‘ दीवान के लिए ढेरों मुबारकबाद!मेरी राय में यह हर किसी के पढ़ने-सुनने -सराहने के काबिल एक जरूरी किताब है.” प्रेमरंजन की भाषा सुन्दर है. ग़ज़लों में इन्होंने तत्सम शब्दों का भी काफी प्रयोग किया है. ग़ज़ल संग्रह अति पठनीय और संग्रहणीय है.

ग़ज़ल संग्रह: पहला मौसम, कवि : प्रेमरंजन अनिमेष. पृष्ठ:168, प्रकाशक: सर्व भाषा ट्रस्ट प्रकाशन, वर्ष: 2025 मूल्य:रू.320.

(प्रमोद कुमार झा तीन दशक से अधिक समय तक आकाशवाणी और दूरदर्शन के वरिष्ठ पदों पर कार्यरत रहे. एक चर्चित अनुवादक और हिन्दी, अंग्रेजी, मैथिली के लेखक, आलोचक और कला-संस्कृति-साहित्य पर स्तंभकार हैं।)

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