इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक तक आते आते कविता जीवन के बहुत समीप आ गयी है .हिंदी की प्राध्यापिका ,लेखिका प्रज्ञा गुप्ता जी का प्रथम काव्य संग्रह है ‘कांस के फूलों ने कहा जोहार’.एक संयोग मात्र है के कई सालों से विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में नियमित साहित्यिक लेखों, पुस्तकों के संपादन और कविता लेखन के बाद प्रज्ञा ने कविता के संकलन कर बारे में सोचा.
कविता संग्रह ‘कांस के फूलों ने कहा जोहार’के प्रारंभ में “दो शब्द” में पुस्तक के बारे में विस्तार से प्रतिष्ठित साहित्यकार रणेन्द्र कहते हैं : “इन कविताओं का सृजन किस क्षण में हुआ ‘वह क्षण विशेष’ रचनाकार के लिए भी एक रहस्यपूर्ण ,अपरिभाषित, चेतन और अचेतन के बीच की पर्देदारी में कहीं आंख मिचौली कर रहा है।उसे पर्दे में ही रहने दिया जाय।अभी हमारे झारखंड के सुदूर गांव की मिट्टी,हवा, आकास बतास, बनैले-देहाती फूलों -बनस्पतियों की खुशबू ,रंग,ध्वनि, स्पर्श, आदि आपके हाथों में पहुंच रही है,यही सबसे महत्वपूर्ण,सबसे खुशी का क्षण है।”
रणेन्द्र जी की ऊपर लिखी पंक्तियों में इस संग्रह की बहुत सटीक व्याख्या की गई है . ध्यातव्य है कि प्रज्ञा जी ने यह पुस्तक को समर्पित करते हुए लिखा है :”अपने गाँव ‘केरसई’ के लिए”. आपने बहुत सारे कवियों-कवित्रियों के संग्रह को देखा और पढ़ा होगा पर इस प्रकार का समर्पण आपको शायद ही मिला हो! आइए संग्रह में संकलित कविताओं के शीर्षक की ओर नज़र डालें ।कुछेक शीर्षक की ओर देखें :पिता!,उड़द की बड़ियाँ, मेरी बेटी इन दिनों मेरी दोस्त है,चैता, मैं कोई कोंहड़ा का फूल नहीं, विस्थापन, थेथइर के फूल, दिल्ली अब शहर नहीं रहा, बिच्छू,ऐ सहिया, कचिया लखे, अंबा बगइचा इत्यादि. इन कविताओं में इस प्रदेश के जन- जीवन,प्रकृति, लोगों के दृष्टिकोण, मानवीय संबंधों, बड़े शहरों के प्रति उनकी सोच, आपसी व्यक्तिगत संबंध ,प्रकृति और मनुष्य के संबंध सभी की झलक दिखाई देती है. सबसे आकर्षक है क्षेत्रीय भाषाओं और संस्कृतियों के शब्दों का सुंदर प्रयोग . प्रज्ञा जैसी कवयित्री हिंदी में इन शब्दों का प्रयोग कर भाषा को समृद्ध कर रही हैं . आज दुनिया भर की भाषाओं और बोलियों के शब्दों को आत्मसात कर ही अंग्रेज़ी इतनी समृद्ध और प्रभावी भाषा बनी है. यदि आप संग्रह के नाम पर ही विचार करें तो गुदगुदी सी होगी. काँस के फूल झारखंड की एक विशेष पहचान है और ये काँस के फूल कहते है ‘जोहार’ जोहार झारखंड और छत्तीसगढ़ में “अभिवादन”का सबसे महत्वपूर्ण अभिव्यक्ति है .एक तरह से पाठक मानसिक रूप से तैयार होकर संग्रह को उठाता है कि वह झारखंड में प्रवेश कर विचरण करने जा रहा है. इस संग्रह में स्थानीय आचार – विचार, शब्द और भाव को उपादान के रूप में अवश्य सफलता पूर्वक व्यवहार किया गया है पर प्रज्ञा की कविताएं कभी -कभी बड़े विचारवान महान कविताओं की आगे की कड़ी होने का एहसास कराती हैं .देखिए रणेन्द्र जी ने संग्रह के बारे में आगे क्या कहा है:
“….काँस के ये सादे -सफेद फूल आपकी हाथों में हैं। काँस जो बंजर और उजाड़ में बिना किसी माली की सहायता के खुद ही उग आते हैं ,एक अवांक्षणीय बनस्पति ,एक खर पतवार।जनम -जनम के आवारा- बंजारा झाड़ी और फूल जो न जाने कब से वर्षा माई के की बिदाई और दुर्गा माई की अगवानी-स्वागत-निहोरा के प्रतीक बन गए । जो अनजाने कालिदास,तुलसीदास,टैगोर और काज़ी नज़रुल की काव्य -सम्पदाओं से गुज़रते हुए अचानक यहां उपस्थित हुए हैं।वे आपको अपना झारखंडी जोहार -अभिवादन और मंगलकामनाएँ समर्पित कर रहे हैं ।”आप प्रज्ञा गुप्ता जी के कविताओं की कुछ पंक्तियों पर ध्यान दीजिए: ‘थेथइर के फूल’ “नहीं होना मुझे गुलाब/मुझे तो ‘थेथइर’ का फूल होना है/नहीं बनाना लाजवंती/’थेथइर’ ही रहना है/उखड़ कर उगती ही रहूंगी/सड़क किनारे ‘दोइन’में /जहाँ कहीं भी हो थोड़ी सी नमी, आँइख भर पानी/ ‘थेथइर’ के फूलों सी झूमती रहूंगी/किसी देवता की पूजा का फूल नहीं बनना मुझे।” बहुत सरल शब्दों में कवयित्री बिल्कुल ग्रामीण अंदाज़ में अपनी बात कह जाती है जो पूरी मानव सभ्यता पर एक आक्षेप की तरह है. इसी प्रकार एक और कविता देखिये: ‘ अंबा बगइचा’: “कने गेलक महुआ गाछ / जेकर तरे बइठ के/खेलत रही ‘गोटी’/ कने गेलक अंबा गाछ/जेकर तरे नाइच नाइच व/खेलत रही कबड्डी/ टापर -टुपुर झिमकत रहे बदरी/चमकत रहे बिजुरी…..” कवयित्री ने इस संकलन में एक- दो नागपुरी कविता को भी संलग्न किया है .साथ में इन कविताओं का हिन्दी अनुवाद भी संलग्न है. संग्रह में कुल 81 छोटी छोटी कविताएं हैं. कवियित्री की भाषा प्रवाहमान, सुंदर और आकर्षक है. सायास तत्सम शब्दों के प्रयोग से परहेज किया गया है जो इस संग्रह को प्रायः अधिक पठनीय बनाएगा. संग्रह की बहुत सारी कविताएं विस्तार की संभावना दिखती है .कविताओं के विषय गंभीर हैं विस्तार देकर उसे अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है. सुंदर कागज व छपाई के साथ छपी कविता संग्रह पठनीय और संग्रहणीय है.
संग्रह :“काँस के फूलों ने कहा जोहार” (कविता संग्रह),
कवयित्री: प्रज्ञा गुप्ता, पृष्ठ:144, प्रकाशक: बोधि जन संस्करण, प्रकाशन वर्ष:2025,मूल्य:रु 249.

(प्रमोद कुमार झा तीन दशक से अधिक समय तक आकाशवाणी और दूरदर्शन के वरिष्ठ पदों पर कार्यरत रहे. एक चर्चित अनुवादक और हिन्दी, अंग्रेजी, मैथिली के लेखक, आलोचक और कला-संस्कृति-साहित्य पर स्तंभकार हैं।)
ये भी पढ़ें :-अति पठनीय और संग्रहणीय है डॉ. दिनेश कुमार मिश्र की पुस्कत ‘बागमती की सद्गति’
बहुत सुंदर लिखा सर आपने, हार्दिक आभार!🙏
https://shorturl.fm/X4Kwg