कार्यक्रम का आरंभ संचालक डॉ. हर्षबाला द्वारा श्रीकांत वर्मा के जीवन, साहित्यिक अवदान, पत्रकारिता तथा राजनीतिक योगदान के परिचय से हुआ। इसके उपरांत विशिष्ट अतिथियों, वरिष्ठ साहित्यकारों एवं वर्मा परिवार के सदस्यों द्वारा स्वर्गीय वर्मा को श्रद्धांजलि अर्पित की गई तथा दीप प्रज्ज्वलन के साथ कार्यक्रम का विधिवत शुभारंभ हुआ। विश्व हिंदी परिषद के राष्ट्रीय महासचिव डॉ. विपिन कुमार ने उपस्थित अतिथियों का स्वागत करते हुए स्व. श्रीकांत वर्मा के साहित्यिक अवदान का स्मरण किया।
इस अवसर पर डॉ. अभिषेक वर्मा ने श्रीकांत वर्मा ट्रस्ट की ओर से उपस्थित साहित्यकारों एवं विशिष्ट अतिथियों को श्री वर्मा की पुस्तक ‘मगध’ और मोती माला भेंट कर सम्मानित किया। कार्यक्रम में स्वर्गीय श्रीकांत वर्मा के साहित्यिक अवदान, उनके रचनात्मक व्यक्तित्व तथा वैचारिक विरासत पर आधारित चार मिनट के एक वृत्तचित्र का प्रदर्शन भी किया गया।
डॉ. विपिन वर्मा ने अपने स्वागत भाषण में कहा कि श्रीकांत वर्मा ने अपने समय की पीड़ा, लोगों की वेदना और सत्ता की खामोशी को अपनी कविता में अभिव्यक्त किया। सत्ता के नजदीक रहते हुए भी उन्होंने सत्ता से सवाल करने का साहस। वे अतीत में वर्तमान और वर्तमान में भविष्य को देखते थे। वे भारतीय संस्कृति में विश्वास करते थे और देश के प्रति उनमें गहरा प्रेम था। डॉ. विपिन कुमार ने श्रीकांत वर्मा को देश के सबसे बड़े नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ दिए जाने के मांग करते हुए कहा कि इस सम्बंध में भारत सरकार को एक ज्ञापन सौंपा जाएगा।
डॉ. अभिषेक वर्मा ने श्रीकांत वर्मा से जुड़ी स्मृतियों तथा ‘श्रीकांत वर्मा सम्मान’ की जानकारी साझा की। उन्होंने अपने पिता श्रीकांत वर्मा के आखिरी दिनों को याद किया। उन्होंने श्रीकांत वर्मा की स्मृति में उनके जन्मदिन पर दिए जाने वाले पांच पुरस्कारों के बारे जानकारी दी, जो साहित्य, पत्रकारिता और कला के क्षेत्र में दिए जाएंगे। इसमें साहित्य के क्षेत्र में दिए जाने वाले शिखर सम्मान में 21 लाख रुपये की राशि दी जाएगी, जो भारत में दिए जाने साहित्यिक पुरस्कारों में सबसे अधिक हैं।
इसके बाद आयोजित स्मृति एवं साहित्यिक विमर्श सत्र में अनेक वक्ताओं ने श्रीकांत वर्मा के जीवन और साहित्य के विविध पक्षों पर अपने विचार रखे।
मुख्य अतिथि के रूप में अपने विचार व्यक्त करते हुए वरिष्ठ साहित्यकार अशोक वाजपेयी ने स्वर्गीय श्रीकांत वर्मा जी के साथ बिताए समय और उनसे जुड़ी अविस्मरणीय साहित्यिक यादों को जीवंत किया। उन्होंने कहा कि श्रीकांत वर्मा एक लड़ाकू कवि थे। किसी भी सभा में वे अपने वैचारिक और कविता के तेवर को स्थगित नहीं करते थे। वे जो कहना चाहते थे, कह देते थे। वो हिंदी के पहले सबसे नाराज़ कवि थे। वे अपने नरक में अकेले थे। वे 20वीं सदी के अंधेरे की शिनाख्त करने वाले पहले कवि थे।
प्रख्यात साहित्यकार एवं कला समीक्षक विनोद भारद्वाज ने ‘कला एवं आलोचना’ विषय पर अत्यंत सारगर्भित वक्तव्य प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि श्रीकांत वर्मा के तेवर अपने समय के हिंदी के अन्य साहित्यकारों से बिल्कुल अलग थे। श्रीकांत वर्मा से जुड़े आत्मीय संस्मरण साझा करते हुए विनोद भारद्वाज ने कहा कि दुनिया बदल जाती हैं, लेकिन स्मृतियाँ रह जाती हैं।
वहीं जनसत्ता के पूर्व संपादक ओम थानवी ने ‘श्रीकांत वर्मा के बौद्धिक तेवर’ विषय पर केंद्रित व्याख्यान दिया, जिसमें उन्होंने श्री वर्मा की वैचारिक प्रखरता को रेखांकित किया। उन्होंने कहा, श्रीकांत जी बड़े साहित्यकार थे, बड़े पत्रकार थे। जब दिनमान की पत्रकारिता को याद करते हैं, तो वे बहुत याद आते हैं। वो पत्रकारिता के स्वर्णिम दिन थे, जब साहित्यकार पत्रकारिता में थे। आज जिस तरह की पत्रकारिता है, उसमें श्री वर्मा और भी याद आते हैं।
कला-संस्कृति, फिल्म और रंगमंच समीक्षक रवीन्द्र त्रिपाठी ने श्रीकांत वर्मा से अपनी मुलाकातों को याद किया और साहित्य तथा पत्रकारिता के अंतर्संबंधों को उजागर करते हुए “पत्रकारिता और श्रीकांत वर्मा” विषय पर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा, समाज में जो हो रहा है, उसको जानने का माध्यम पत्रकारिता है। पत्रकारिता और आधुनिक साहित्य का इतिहास एक दूसरे से जुड़ा है।
एनडीटीवी की वरिष्ठ पत्रकार अदिति राजपूत ने समकालीन पत्रकारिता की दशा-दिशा पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने “वर्तमान पत्रकारिता और श्रीकांत वर्मा” विषय पर महत्वपूर्ण वक्तव्य प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा, श्री वर्मा ने हमें बताया कि पत्रकारिता एक उद्योग नहीं है, यह लोक चेतना है। उन्होंने कहा, पहले पत्रकारिता मिशन थी, फिर प्रोफेशन में बदली और अब मार्केट में बदल गई है।
प्रसिद्ध शिक्षाविद् प्रो. पूरनचंद टंडन ने ‘कथा एवं साहित्य’ विषय पर अकादमिक और विचारोत्तेजक व्याख्यान प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा, किसी भी व्यक्ति के लिए पूरी बेबाकी के साथ और संवेदना के साथ अपनी बात कहना बड़ा कठिन होता है। श्री वर्मा के गद्य में उनकी सहृदयता परिलक्षित होती है। उनके साहित्य में युगबोध और कालबोध दिखाई देता है। अपने गद्य में उन्होंने मध्यवर्ग की कुंठा को चित्रित किया है। उनका लेखन बहुत अनुशासित है। उनके लेखन में राष्ट्र सर्वोपरि रहा है।
कार्यक्रम के अंत में, प्रसिद्ध आलोचक प्रो. अरविंद त्रिपाठी द्वारा धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया गया। उन्होंने मुख्य अतिथि, विशिष्ट अतिथियों, वक्ताओं, साहित्यकारों, सहयोगी संस्थाओं तथा उपस्थित श्रोताओं के प्रति आभार व्यक्त किया।
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