अमेरिकी हमलों और युद्धविराम समाप्त होने की घोषणा ने पहले से अस्थिर पश्चिम एशिया में नए सैन्य टकराव की आशंकाओं को और गहरा कर दिया है। हाल के दिनों में हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य में तीन वाणिज्यिक जहाजों पर हुए हमलों के बाद अमेरिका और ईरान के बीच तनाव लगातार बढ़ता गया था। अमेरिका ने इन घटनाओं के लिए ईरान को जिम्मेदार ठहराते हुए उसके कई सैन्य प्रतिष्ठानों, मिसाइल अड्डों और नौसैनिक ठिकानों पर कार्रवाई की। इसके जवाब में ईरान ने खाड़ी क्षेत्र में स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया।
सबसे संवेदनशील घटनाक्रम उस समय सामने आया जब ईरान में खामनेई के अंतिम संस्कार और शोक सभाएं चल रही थीं। इसी दौरान दक्षिणी ईरान के कई सैन्य ठिकानों पर विस्फोट और हवाई हमलों की खबरें आईं। ईरान ने इसे अपनी संप्रभुता पर सीधा हमला बताते हुए कड़ी प्रतिक्रिया की चेतावनी दी है। शोकसभा में बड़ी संख्या में लोगों ने अमेरिका और इज़राइल विरोधी नारे लगाए तथा जवाबी कार्रवाई की मांग की।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि अमेरिका अब युद्धविराम को समाप्त मानता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि अमेरिकी हितों, सैनिकों या अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार पर दोबारा हमला हुआ तो अमेरिका और अधिक कठोर सैन्य कार्रवाई करेगा। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि ईरान की ओर से बातचीत का संदेश मिला है और कूटनीतिक प्रयास जारी रह सकते हैं।
तनाव का सबसे बड़ा केंद्र हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य बना हुआ है। दुनिया के समुद्री मार्ग से होने वाले तेल निर्यात का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है। इस क्षेत्र में किसी भी बड़े सैन्य संघर्ष का सीधा असर अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार, तेल की कीमतों और वैश्विक व्यापार पर पड़ सकता है। कई जहाजरानी कंपनियों ने सुरक्षा कारणों से अपने जहाजों की आवाजाही धीमी कर दी है, जबकि बीमा कंपनियों ने जोखिम प्रीमियम बढ़ाना शुरू कर दिया है।
कतर सहित कई खाड़ी देशों ने दोनों पक्षों के बीच मध्यस्थता की कोशिशें तेज कर दी हैं ताकि संघर्ष को पूर्ण युद्ध में बदलने से रोका जा सके। संयुक्त राष्ट्र और अनेक देशों ने भी संयम बरतने तथा तत्काल कूटनीतिक समाधान निकालने की अपील की है।
अंतरराष्ट्रीय रणनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सैन्य कार्रवाई और जवाबी हमलों का सिलसिला जारी रहा तो इसका प्रभाव केवल ईरान और अमेरिका तक सीमित नहीं रहेगा। इज़राइल, खाड़ी देश, लाल सागर और हॉर्मुज़ क्षेत्र सहित पूरा पश्चिम एशिया एक बड़े क्षेत्रीय संघर्ष की चपेट में आ सकता है। ऐसे में वैश्विक अर्थव्यवस्था, ऊर्जा आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा व्यवस्था पर भी दूरगामी प्रभाव पड़ने की आशंका जताई जा रही है।
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