‘कवि ने कहा’ श्रृंखला में कवियों से स्वयं उनकी कविताओं को चुनकर देने का आग्रह किया गया है .प्रस्तुत संग्रह में भी लीलाधर जगूड़ी जी ने स्वयं कविताओं का चयन किया है .144 पृष्ठ की इस कविता संग्रह में मुख्यतः छोटी कविताओं का ही चयन किया गया है .संभव है पुस्तक के पृष्ठों की बाध्यता के कारण लंबी कविताओं का चयन सायास नहीं किया गया हो.
संग्रह के प्रारंभ में कवि लीलाधर जगूड़ी द्वारा स्वयं लिखित “ग्यारहवीं दिशा में सातवीं ऋतु” के नाम से तीन पृष्ठ का एक लेख छोटा शामिल किया गया है . कविताओं से पूर्व इस लेख को अवश्य पढ़ा जाना चाहिए . पाठकों के लिये इस लेख की कुछ महत्वपूर्ण पंक्तियों को उद्धृत करना चाहूंगा . ” जो बात बताने जा रहा हूँ, नई तो नहीं है लेकिन काम की बहुत है।मतलब कि जो बात कभी भी काम की हो वही नई है।लगभग सवा पांच सौ साल पहले एक कवि ने अपने आराध्य नायक के गुण समूह को ‘पुण्यारण्य'(किये गए अच्छे कार्यों का जंगल)कहकर याद किया। लेकिन उस पुण्यारण्य में अपने आराध्य के प्रिय कवि से पहले उस कवि को ,कवीश्वर कहकर प्रणाम किया जो दृष्टि में विशुद्ध विज्ञान है। इससे पता चलता है कि भक्त की अपेक्षा तुलसी अग्रज कवि के प्रति अधिक आकर्षित हैं और श्रद्धानत भी।
आज के कवियों में कितने कवि हैं जो पूर्ववर्ती किसी कवि के प्रति समझदारी का ऐसा दृष्टिकोण बना बना पाते हों ? वह दुनिया का पहला ऐसा कवि हुआ है जिसने बोले गए शब्द के श्रुति गान और स्तुतिगान के स्थान पर ध्वन्यात्मक वर्णों के लिखित, खचित और उकेरित स्वरूप की प्रार्थना की।….” जगूड़ी जी आगे लिखते हैं : ‘उसी कवि ने कहा है कि- “निज कवित्त केहि लाग न नीका। सरस होय अथवा अति फीका।।” ‘ …..जगूड़ीजी लेख के अंत में लिखते हैं : “अनुभवों के डंसे हुए या अनुभवों के दागे हुए विदग्ध गुणीजन जीवनानुभव की सार्थकता और निरर्थकता को इस दृष्टि से बताए बिना नहीं रहेंगे कि अभिव्यक्ति के लिए मेरी कविता ने मेरे माध्यम से जो प्राप्त किया वह कितना एक कवि की निजी परंपरा में रखे जाने योग्य है।
परंपरा के विकास में आधुनिकता का और आधुनिकता के विकास में परंपरा का कितना हाथ है, यह भी इस संग्रह से कुछ अनुमेय है या नहीं?” 144 पृष्ठ के इस संग्रह में छोटी छोटी 143 कविताएं हैं .पूर्वकथन में कवि इस बात की ओर भी इशारा करते हैं कि उनपर एक आरोप है कि उन्होंने सिर्फ बड़ी कविताएं ही लिखी हैं .संभव है कवि ने इसलिए अपनी महत्वपूर्ण छोटी कविताओं का चयन किया हो . कुछ कविताओं के शीर्षक देखिये तो आपको कवि के दृष्टि -फलक का अनुमान भी हो जाएगा.यथा – अनचाहा मैं, अयाचित आशीष ,एक सांवला प्यार,अ-मृत , प्रेमान्तरण ,अंधेरे में वसंत स्वप्नदण्ड, एक बुढ़िया का इच्छागीत, मातृमुख, पेड़ की आज़ादी,मुक्तियात्रा , वस्तुबोध ,बयासी का वसंत , मरने के पहले, वाद्य ले जाती हुई लड़कियां इत्यादि
” *बयासी का बसंत* कितने काम अंधेरे कितने ज्यादा उजाले में लिखूँ/ जो बयासी के वसंत पर कविता भी हो और शब्दों मरण मितव्ययिता भी हो/ जहां -जहां गोलियां दागी गईं क्या वहाँ – वहां फूल दाग दूं/घावों पर कसीदे काढ़ दूं/चुराए गए बच्चों के लिए लिख दूं कि उनके चहरे फूलों जैसे थे/लापता लोगों के लिए कह दूं कि वे कहीं मौज मार रहे हैं/ यह नाहींकहूँगा कि उनकी याद में आप मौन धारण करें /बल्कि कहूंगा कि बस जरा याद करें/ याद करें कि किन मात हुओं को मरे हुए/ किन कहिए हुओं को खोए हुए आज कितनवाँ बरस हो गया / कुछ को तो एक हफ्ता भी नहीं हुआ है अभी………” संग्रह की सारी कविताएं बहुत भावुक और संवेदनशील कर देने वाली हैं. कवि लीलाधर जगूड़ी जी का शब्द भंडार किसी लेखक कवि के लिए प्रेरणास्रोत बन सकता है .पारंपरिक ,तत्सम और क्षेत्रीय शब्दों के समुचित प्रयोग से कविताएं बहुत आनंद देती हैं. कुछ वृहत कविताओं की कमी खली. संग्रह अति पठनीय और संग्रहणीय है.
प्रकाशक: किताबघर प्रकाशन।
कवि: लीलाधर जगूड़ी, पृष्ठ संख्या :144 ,मूल्य:रु150.

(प्रमोद कुमार झा तीन दशक से अधिक समय तक आकाशवाणी और दूरदर्शन के वरिष्ठ पदों पर कार्यरत रहे. एक चर्चित अनुवादक और हिन्दी, अंग्रेजी, मैथिली के लेखक, आलोचक और कला-संस्कृति-साहित्य पर स्तंभकार हैं।)
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