इनकी कविताओं के संग्रह भी प्रकाशित हो चुके हैं . मॉरिशस के यशस्वी लेखक डॉ रामदेव धुरंधर ने एक मनोरंजक प्रयोग कर अस्सी शब्दों में लघुकथा लिखने की शुरुआत की और सैकड़ों लोकप्रिय कथाएं लिख डालीं ! सत्या को भी कुछ वैसा ही महारथ हासिल है .छोटी सी कथा में भी कुछ ‘घट’ जाता है,’हो’जाता है और एक कहानी बन जाती है. “वक़्त कहाँ लौट पाता है ” एक 127 पृष्ठ का लघुकथा संग्रह है इसमें 66 लघुकथा है !
कुछेक कथाओं का नाम ही यह दर्शाता है कि कैसे आम ज़िंदगी के बहुत छोटे और अनछुए प्रसंग को भी सत्याजी ने कहानी का रूप दिया है .कुछ नाम देखें: प्रोफाइल पिक, प्रवासी, रक्तबीज, मोजे, मूक साथी, हामिद और राहुल, आभासी भय, बेरंग तस्वीर,मृगतृष्णा, पासवर्ड, ऑनली मी, आज का बुद्ध इत्यादि.एक लघुकथा के इस अंश को देखिए : “वह मन ही मन यह सोच कर उदास हो रहा था कि उसके ही पिता की उम्र का होगा यह रिक्शे वाला,किन्तु इस उम्र में भी बच्चों के लिए आधी रात को मेहनत कर रहा है।………. गंतव्य पर पहुंच, वह पैसे निकाल ही रहा था कि मोबाइल की घंटी बजी उधर से छोटे भाई ने फफकते हुए कहा ‘भैया थोड़ी देर पहले पिताजी इस दुनिया से चले गए।अंत समय में आपको बहुत याद कर रहे थे।’……………. हतप्रभ सा वह रिक्शेवाले की ओर पैसे देने को पलटा, पर वह कहीं नहीं था। वह फूट फूट कर रो पड़ा! क्या वे पिताजी ही थे जो अंतिम बार उससे मिलने आये थे?” (वात्सल्य, पृष्ठ:34-35)
ये एक छोटा सा उदाहरण है जो आपको पल भर के लिए अवाक कर देती है. सत्या बहुत बड़ी गंभीर बातें सहजता, सरलता से कह जाती हैं बिना किसी लंबी चौड़ी भूमिका के, बिना क्लिष्ट शब्दों के., पर आप कई दिनों तक सोचते रह जाते हैं .
सत्या की भाषा सुंदर है .शब्दों का विपुल भंडार है और अनुभवों का खजाना भी . उन्हें प्रायःसही स्थान पर उचित शब्द प्रयोग करने की सलाहियत भी है. कुछ लघुकथाओं में वृहत कहानी हुई छुपी दिखती है जिसे लघु कथा में समेट लिया गया है . आत्मकथ्य में सत्या ने बहुत बेवाक ढंग से अपनी बात रखी है जिसे संग्रह की कहानियों को पढ़ने के पूर्व पढ़ा जाना चाहिये! संग्रह का मुखपृष्ठ आकर्षक है, छपाई संतोषप्रद है. ये लघुकथाएं ऐसी हैं कि इस संग्रह को पठनीय ही नहीं संग्रहणीय की श्रेणी में रखना चाहिए.
संग्रह: वक़्त कहाँ लौट पाता है,
लेखिका:सत्या शर्मा ‘कीर्ति’,
प्रकाशक: श्वेतवर्णा प्रकाशन, नई दिल्ली
मूल्य:रु.199.

(प्रमोद कुमार झा तीन दशक से अधिक समय तक आकाशवाणी और दूरदर्शन के वरिष्ठ पदों पर कार्यरत रहे. एक चर्चित अनुवादक और हिन्दी, अंग्रेजी, मैथिली के लेखक, आलोचक और कला-संस्कृति-साहित्य पर स्तंभकार हैं।)
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इतने सुंदर ,सार्थक एवं सारगर्भित समीक्षा हेतु सादर धन्यवाद सर।
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