एक बानगी देखिये : ‘हाँ अब मेरे पास ताकत है और मैं एकता के राग को जहन्नुमी राग में तब्दील कर दूंगा, इस दुनिया से अमन की जड़ें उखाड़ कर फेंक दूंगा। इसकी शुरुआत यहीं से करते हैं-मैं यहां का बादशाह हूँ, बादशाहों का बादशाह-शहंशाह…!’ (पृष्ठ 132) ध्यातव्य है कि मूल रचना में निहित व्यंग्य को कुशलता से बरकरार रखा गया है. हिंदी, अंग्रेज़ी और उर्दू की अच्छी जानकारी रखने वाली गुंजन ने सुविधानुसार शब्दों का चयन किया जिससे भारतीय दर्शक तक सारे भाव पहुंच सकें. बहुत कम नाटकों में इस प्रकार संवाद में कटाक्ष और आक्षेप छिपा देखने को मिलता है। ऐसे गंभीर नाटक को पढ़ना, समझना और फिर अनुवाद करना बहुत सरल कार्य नहीं रहा होगा। पूरे अनुवाद में भाषा का प्रवाह ऐसा है कि अनुवाद होने का एहसास भी नहीं होने देता है।
शेक्सपियर के बहुचर्चित नाटक ‘मैकबेथ’ से यह कई अर्थों में भिन्न है। विचारणीय है कि किसी नाटककार को समकालीन परिस्थिति को ध्यान में रखकर किसी नाटक को लिखने की आवश्यकता क्यों महसूस होती है। प्रायः नाटक के गंभीर दर्शक ही इसका उत्तर दे पाएंगे.
इस अनुवाद पुस्तक के प्रारंभ में देश के प्रसिद्ध नाटक अभिनेता, लेखक, निर्देशक प्रताप सहगल ने लिखा है : ‘ mackbett आयनेस्को का अपेक्षाकृत कम चर्चित और कम मंचित नाटक है। दुनिया भर में वे अपने क्लासिक नाटक राइनासर्स के लिए जाने जाते हैं। वे अपने नाटकों दि बाल्ड सोपर्णो, लैसन, द चेयर्स आदि के लिए अधिक चर्चा में रहे हैं। उनकी गिनती सैमुएल बैकेट जैसे नाटककारों के साथ होती है। अब्सर्ड नाटककार कहलाना आयनेस्को को पसंद नहीं, यह लेकिन यह अक्सर होता है कि लोग और आलोचक किसी रचनाकार की प्लेसमेंट अपनी सोच-समझ के अनुसार कर देता हैं।
हाँ, कांशस लेवेल पर आयनेस्को ने एंटी प्लेस की रचना की और घोषित रूप से वे ऐसा मानते भी थे। हम जानते हैं कि चाहे एन्टी पोएट्री हो या एन्टी प्ले, उसका असर हिन्दी की कविता और नाटकों पर भी पड़ा। कविता पर अधिक, नाटक पर लगभाग नगण्य।’ प्रताप जी अनुवादक गुंजन के बारे में आगे लिखते हैं : ‘इस नाताक के लिए लिखी गयी गुंजन की भूमिका से पता चला कि यह कठिन अनुवाद उसने मात्र अपनी दसवीं कक्षा पास करते ही किया। प्रतिभा-सम्पन्न लोगों की उम्र नहीं देखी जाती। उनकी पहचान उनकी प्रतिभा से होती है।’
अपनी भूमिका में गुंजन लिखती हैं कि ‘ इस नाटक का मुख्य आकर्षण इसका प्लाट और उसकी शब्दावली थी। इतनी समृद्घ लेकिन सरल भाषा।……भाषाई स्तर पर उन्हेँ अलग-अलग शैली देना मेरा काम था। मेरा मानना है कि ये सबसे कठिन कामों में से एक था मेरे लिए। इसलिए अनुवाद में मिश्रित भाषा का प्रयोग किया है मैंने। कुछ पात्रों की भाषा शुद्ध हिंदी या शुद्ध उर्दू है, तो कुछ अन्य के पास सामान्य दिन -प्रतिदिन की भाषा है।’ गुंजन आगे लिखती हैं ….’ इस नाटक में आयनेस्को कहते हैं कि “मनुष्य घटनाओं पर शासन नहीं करता है। घटनायें उस पर शासन करती हैं। राजा उठते और गिराए जाते हैं। लेकिन उनके इरादे क्या मायने रखते हैं, महत्वपूर्ण वह है। सभी नियम कुशासन हैं और जहाँ तक भीड़ का सवाल है, वे षड्यंत्रकारी और पाखंडी हैं।” 132 पृष्ठ के इस नाटक का मंचन पूरे देश में कई स्थानों पर किया जा चुका है।
एक अनुवादक के रूप में गुंजन में अपार सम्भावनाएँ दिखती हैं। छपाई सुंदर है. प्रकाशक ने प्रूफ रीडिंग में थोड़ा ध्यान दिया होता तो पढ़ते समय स्वाद खराब नहीं होता! संग्रह अति पठनीय और संग्रहणीय है।
@ अनुवादक : गुंजन अज़हर, पृष्ठ-132, प्रकाशन वर्ष-2022, प्रकाशक : प्रलेक प्रकाशन, मुम्बई. मूल्य:रु 249.

(प्रमोद कुमार झा तीन दशक से अधिक समय तक आकाशवाणी और दूरदर्शन के वरिष्ठ पदों पर कार्यरत रहे. एक चर्चित अनुवादक और हिन्दी, अंग्रेजी, मैथिली के लेखक, आलोचक और कला-संस्कृति-साहित्य पर स्तंभकार हैं।)
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बहुत अच्छी समीक्षा, पढ़ने की इच्छा हो रही, गुंजन को हार्दिक शुभकामनाएं
बेहतरीन समीक्षा..साधुवाद!!
पठनीय, बढ़िया समीक्षा प्रमोद जी
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