कैंसर की 2,700 रुपये की दवा 27,000 में : मरीज के दर्द पर किसका कारोबार ? इस ‘दिन दहाड़े डकैती’ पर सुप्रीम कोर्ट करेगा 29 को भी सुनवाई

कैंसर का नाम सुनते ही किसी परिवार की पहली चिंता बीमारी से पहले इलाज के खर्च की होती है। लेकिन अगर किसी जरूरी कैंसर दवा की प्राइस टू रिटेलर (PTR) सिर्फ 2,700 रुपये हो और उसी पर 27,000 रुपये का MRP छपा हो, तो सवाल सिर्फ दस गुने मूल्य अंतर का नहीं रह जाता। सवाल यह है कि ऐसी कीमत तय करने की इजाजत किस व्यवस्था में मिली, निगरानी करने वाले अधिकारी कहां थे और आखिर इस अंतर की सबसे बड़ी कीमत कौन चुका रहा है?

Written By : Ramnath Rajesh | Updated on: September 23, 2026 8:53 pm

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को इसी सवाल पर सरकार और दवा मूल्य नियंत्रण व्यवस्था को कठघरे में खड़ा कर दिया। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने 2,700 रुपये की PTR और 27,000 रुपये के MRP वाले कैंसर की दवा का उदाहरण सामने आने पर इसे मरीजों के साथ “ब्रॉड डे-लाइट डकैती” और “एक्सटॉर्शन” जैसा बताया। न्यायमूर्ति मेहता ने सवाल किया कि जब निर्माता खुदरा विक्रेता को दवा 2,700 रुपये में बेच रहा है तो मरीज से 27,000 रुपये तक वसूलने की गुंजाइश क्यों होनी चाहिए।

अदालत की नाराजगी का दूसरा सिरा सीधे नियामक व्यवस्था तक पहुंचा। पीठ ने कहा कि जिन अधिकारियों को ऐसी कीमतों पर कार्रवाई करनी चाहिए, उनका इस मामले में चुप रहना हैरान करने वाला है। यानी मामला केवल दवा कंपनी या दुकानदार के मुनाफे का नहीं, निगरानी और जवाबदेही का भी है।

मजबूर मरीज, बंद अस्पताल का विकल्प

सुनवाई में निजी और कॉरपोरेट अस्पतालों की इन-हाउस फार्मेसियों का मुद्दा भी उठा। याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया कि कुछ अस्पताल मरीजों को बाहर से दवा खरीदने का विकल्प नहीं देते और अस्पताल की अपनी फार्मेसी से ही दवा लेने के लिए मजबूर करते हैं। ऐसे मरीज, जो पहले ही कैंसर के इलाज और कीमोथेरेपी के खर्च से टूट चुका होता है, उसके पास कीमत पर सवाल करने की व्यावहारिक गुंजाइश कितनी बचती है—यह इस मामले का बेहद गंभीर पहलू है।

मामले में यह भी आरोप रखा गया कि कुछ कॉरपोरेट अस्पतालों में दवा की खरीद अस्पताल की अपनी व्यवस्था से ही करानी पड़ती है और मरीज को दूसरे स्रोत से सस्ती दवा लेने का विकल्प सीमित हो जाता है। ये याचिकाकर्ताओं के आरोप हैं, सभी निजी अस्पतालों पर लागू न्यायिक निष्कर्ष नहीं। लेकिन अदालत के सामने इन आरोपों का पहुंचना स्वास्थ्य व्यवस्था की उस खामी को जरूर सामने लाता है जिसमें मरीज की बीमारी उसके सौदेबाजी के अधिकार को लगभग खत्म कर देती है।

कीमत का खेल और सरकारी पैसे का सवाल

सुप्रीम कोर्ट की चिंता का एक और महत्वपूर्ण पहलू सरकारी स्वास्थ्य योजनाएं हैं। पीठ ने कहा कि जब इलाज आयुष्मान भारत जैसी सरकारी योजनाओं के तहत होता है और अस्पताल ऊंची कीमत पर दवा खरीदने या उसका भुगतान लेने का दावा करते हैं, तो अंततः इसका बोझ सार्वजनिक धन पर पड़ सकता है। अदालत ने ऐसी स्थिति को “फ्रॉड” तक कहा। यानी एक ही कीमत का असर दो तरफ पड़ सकता है—निजी मरीज के मामले में परिवार की जेब पर और सरकारी योजना के मामले में करदाताओं के पैसे पर।

82 फीसदी दवाओं पर सीधा नियंत्रण नहीं?

सुनवाई में  औषधियों के मूल्य नियंत्रण आदेश 2013  की व्यवस्था भी सवालों के घेरे में आई। याचिकाकर्ता किशन चंद जैन की ओर से बताया गया कि DPCO के तहत लगभग 1,000 अनुसूचित दवाओं के लिए अधिकतम मूल्य व्यवस्था है, जबकि करीब 82 प्रतिशत दवाएं गैर अनुसूचित श्रेणी यानी  non-scheduled category में आती हैं और उनके मूल्य तय करने पर वैसा सीधा नियंत्रण नहीं है। यही वह जगह है जहां सरकार की नीति और नियामक व्यवस्था पर बड़ा सवाल उठता है—अगर शुरुआत में ही कीमत तय करने पर प्रभावी नियंत्रण नहीं है तो बाद में केवल MRP और खुदरा मूल्य के बीच के अंतर पर निगरानी कितनी कारगर होगी ?

सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के.एम. नटराज ने कहा कि सरकार सस्ती दवाओं की उपलब्धता को लेकर गंभीर है और जहां सुधार की जरूरत होगी, वहां प्रयास किए जाएंगे। उन्होंने जनऔषधि केंद्रों का भी उल्लेख किया। अदालत ने हालांकि यह सवाल उठाया कि जिन दवाओं की उपलब्धता जनऔषधि केंद्रों पर नहीं है, उनके मरीज क्या करें।

दवा उद्योग की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कहा कि इतने बड़े मुनाफे के लिए केवल निर्माता को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता और स्टॉकिस्ट तथा रिटेल स्तर पर कीमतों को भी देखा जाना चाहिए। अदालत ने इसके जवाब में यह महत्वपूर्ण बात उठाई कि MRP आखिर निर्माता ही तय करता है। यही इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा सवाल है।

2,700 रुपये की दवा 27,000 रुपये की कैसे हुई?

इसका जवाब अगर निर्माता, स्टॉकिस्ट, रिटेलर, अस्पताल और नियामक व्यवस्था के अलग-अलग हिस्सों में बंटा है, तो नुकसान उठाने वाला एक ही है—वह कैंसर मरीज, जिसके पास इलाज छोड़ने के अलावा कोई आसान विकल्प नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने मामले को 29 सितंबर को आगे सुनवाई के लिए रखा है। अब देखना होगा कि सरकार और संबंधित नियामक इस दस गुने अंतर तथा गैर-अनुसूचित दवाओं की कीमत तय करने की व्यवस्था पर अदालत को क्या जवाब देते हैं। सवाल अब सिर्फ 27,000 रुपये की MRP का नहीं है। सवाल यह है कि कैंसर मरीज की मजबूरी को बाजार की ताकत बनने से रोकने की जिम्मेदारी आखिर किसकी है?

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