संविधान केवल पुस्तक नहीं, न्याय, समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व का संकल्प है : गजेन्द्र सिंह शेखावत

इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आईजीएनसीए) में बुधवार को “नींव : भारतीय संविधान की महिला शिल्पी” शीर्षक से एक विशेष प्रदर्शनी और विचार-विमर्श कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कलाकोश विभाग द्वारा नारी संवाद प्रकल्प के अंतर्गत यह कार्यक्रम आयोजित हुआ। कार्यक्रम का उद्देश्य संविधान निर्माण में महिलाओं के योगदान को सामने लाना है। कार्यक्रम का उद्घाटन केंद्रीय संस्कृति मंत्री  गजेन्द्र सिंह शेखावत ने किया।

Written By : डेस्क | Updated on: November 26, 2025 10:26 pm

संविधान दिवस पर अपने संबोधन में संस्कृति मंत्री शेखावत ने कहा कि संविधान दिवस के इस गरिमामयी अवसर पर हम वर्ष भर चलने वाले स्मरणोत्सव के समापन के साक्षी हैं, जिसने संविधान के 75 वर्ष पूरे होने पर पूरे देश को एक सूत्र में जोड़ा। उन्होंने कहा कि भारत की स्वतंत्रता हजारों संघर्षों और बलिदानों का परिणाम है। उन्होंने उल्लेख किया कि अंग्रेजों के आगमन के बाद पूरे देश में प्रतिकार की लौ जली, किसी ने फांसी का फंदा स्वीकार किया, किसी ने गोलियां खाईं, किसी ने कालापानी की यातनाएं सही। इन बलिदानों के बाद संविधान ने भारत को एक जीवंत राष्ट्र के रूप में परिभाषित किया। माननीय मंत्री ने कहा कि तकनीकी बदलावों के इस युग में यह और भी महत्त्वपूर्ण हो जाता है कि नई पीढ़ी संविधान निर्माताओं की भावना, उनके विचार और 166 बैठकों की विमर्श-परंपरा को समझे।

उन्होंने आगे कहा कि भारत की विविध भाषाएँ, संस्कृतियाँ, विश्वास, परंपराएँ और हजारों वर्षों का ज्ञान भारत की एकता का आधार रहे हैं, और कुंभ जैसे उदाहरण हमारे सांस्कृतिक एकत्व को प्रमाणित करते हैं। आधुनिक भारत में हमारे संविधान, राष्ट्रध्वज, राष्ट्रगान, समानता के अधिकार और कर्तव्य- ये सब इस एकता के स्तंभ हैं। उन्होंने कहा कि संविधान केवल एक पुस्तक नहीं, बल्कि न्याय, समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व का संकल्प है। संविधान सभा की बहसों को समझे बिना संविधान की आत्मा को नहीं समझा जा सकता। मंत्री ने “नींव” प्रदर्शनी का उल्लेख करते हुए कहा कि यह प्रदर्शनी संविधान निर्माण में मातृशक्ति के योगदान को सशक्त रूप से सामने लाती है। उन्होंने कहा कि भारत की सामाजिक संरचना में स्त्री-पुरुष समानता प्राचीन मान्यताओं का हिस्सा रही है- यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः। संविधान निर्माताओं ने इसी परंपरा को आगे बढ़ाया। उन्होंने संविधान सभा की पंद्रह महिला सदस्यों- अम्मू स्वामीनाथन, एनी मस्करेन, बेगम कुदसिया एजाज रसूल, दक्षायणी वेलायुधन, दुर्गाबाई देशमुख, हंसा मेहता, कमला चौधरी, लीला राय, मालती चौधरी, पूर्णिमा बनर्जी, राजकुमारी अमृत कौर, रेणुका रे, सरोजिनी नायडू, सुचेता कृपलानी और विजयलक्ष्मी पंडित- के असाधारण योगदान को रेखांकित करते हुए कहा कि ये महिलाएँ संख्या में भले कम थीं, पर अपने विचार, साहस और दृष्टि में अद्वितीय थीं। उन्होंने कहा कि यह प्रदर्शनी केवल स्मरण नहीं, बल्कि महिलाओं की ऐतिहासिक भूमिका, स्वतंत्रता की यात्रा और संविधान की आत्मा से जुड़ने का अवसर है। उन्होंने कहा कि हमारा दायित्व केवल संविधान को पढ़ना नहीं, बल्कि उसकी भावना से भी गहराई से जुड़ना है। वर्षभर चले कार्यक्रम का समापन किसी विराम नहीं, बल्कि संवैधानिक चेतना को आगे बढ़ाने की निरंतर प्रेरणा है।

केंद्रीय संस्कृति सचिव विवेक अग्रवाल ने कहा कि भारत का संविधान केवल एक कानूनी दस्तावेज नहीं, बल्कि राष्ट्र के जीवन-मूल्यों का आधार है। लॉ के विद्यार्थी से लेकर भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी बनने तक, उन्होंने हर स्तर पर संविधान की महत्ता को अनुभव किया। उन्होंने बताया कि संविधान की मूल संरचना चार स्तंभों पर टिकी है, 1. संघीय व्यवस्था (Federalism), जो भारत की एकता तथा विविधता दोनों की रक्षा करती है। 2. मौलिक अधिकार, जो विश्व के किसी भी संविधान से अधिक व्यापक हैं और नागरिकों को स्वतंत्रता, समानता और न्याय का संरक्षण देते हैं। 3. पावर का विभाजन और चेक्स एंड बैलेंस, जिससे कोई भी व्यक्ति या संस्था निरंकुश न हो सके और हर निर्णय को चुनौती देने का अधिकार नागरिकों के पास रहे। 4. न्यायिक पुनरावलोकन (Judicial Review), जो नागरिकों के अधिकारों की अंतिम सुरक्षा-रेखा है। अग्रवाल ने कहा कि संविधान के 75 वर्षों की यात्रा हमें सिखाती है कि राष्ट्र की एकता, विकास और लोकतंत्र की निरंतरता तभी संभव है, जब नागरिक संविधान की भावना, कर्तव्यों और “रूल ऑफ लॉ” के प्रति निष्ठा रखें।

दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रो. अलका चावला ने कहा कि ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ जैसी मानवीय संवेदनाओं की मूल प्रेरणा समाज में सबसे पहले स्त्री देती है। उन्होंने प्रदर्शनी में प्रदर्शित संविधान सभा की 15 महिला सदस्यों के योगदान को रेखांकित किया।

आईजीएनसीए के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने कार्यक्रम में स्वागत वक्तव्य देते हुए बताया कि संविधान निर्माण के 75 वर्ष पूरे होने पर वर्षभर विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए गए, जिनका आज समापन है। इस अवसर पर एक विशेष प्रदर्शनी का उद्घाटन केंद्रीय संस्कृति मंत्री श्री गजेंद्र सिंह शेखवत ने किया, जिसमें संविधान निर्माण में योगदान देने वाली 15 महिला सदस्यों- सुचेता कृपलानी, सरोजिनी नायडू, विजयलक्ष्मी पंडित के साथ-साथ, अम्मू स्वामीनाथन, रेणुका रे, बेगम कुदसिया एजाज रसूल आदि के महत्व को रेखांकित किया गया है। उन्होंने कहा कि संविधान की मजबूती के लिए नीति-निर्माताओं के साथ जनता की आस्था और प्रतिबद्धता समान रूप से जिम्मेदार है। अंत में उन्होंने सभी से संविधान के सम्मान और पालन का संकल्प लेने की अपील की और संस्कृति मंत्री के मार्गदर्शन व संस्कृति संरक्षण के प्रति उनकी प्रतिबद्धता की सराहना की। संविधान पचहत्तर वर्षीय यात्रा, चुनौतियों और उपलब्धियों पर आधारित एक विशेष डॉक्यूमेंट्री की स्क्रीनिंग की गई। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में शोधकर्ताओं, छात्रों, सांस्कृतिक कर्मियों और नागरिकों ने भाग लिया।

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