जनजातीय समाज का योगदान हर युग में महत्वपूर्ण रहा है : दुर्गादास उइके

इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र (आईजीएनसीए) के कला निधि प्रभाग द्वारा, इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय, भोपाल के सहयोग से आयोजित 10वें राष्ट्रीय जनजातीय एवं लोक संस्कृति साहित्य महोत्सव का शुभारम्भ केन्द्र के समवेत सभागार में गरिमामय वातावरण में हुआ। 25-26 मार्च, 2026 को आयोजित हो रहे इस महोत्सव की थीम है- “जनजातीय साहित्य, भाषाओं, ज्ञान-परम्पराओं एवं सांस्कृतिक विरासत का उत्सव”। कार्यक्रम के उद्घाटन सत्र के मुख्य अतिथि थे भारत सरकार के जनजातीय कार्य राज्य मंत्री दुर्गादास उइके। कार्यक्रम की अध्यक्षता की आईजीएनसीए के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने। विशिष्ट अतिथि थे उत्कल यूनिवर्सिटी ऑफ कल्चर, भुवनेश्वर के पूर्व कुलपति प्रो. के. के. मिश्रा, जबकि विशेष अतिथि थे अलीपुरद्वार विश्वविद्यालय, पश्चिम बंगाल के कुलपति प्रो. सरित के. चौधुरी। 

'द कल्चरल हेरिटेज ऑफ मिज़ोरम' पुस्तक का लोकार्पण करते हुए प्रो. रमेश चंद्र गौड़, प्रो. अमिताभ पांडे, प्रो. के.के. मिश्रा, दुर्गादास उइके, डॉ. सच्चिदानंद जोशी, प्रो. सरित के चौधुरी और प्रो. के. अनिलकुमार
Written By : डेस्क | Updated on: March 25, 2026 11:41 pm

दुर्गादास उइके ने अपने उद्बोधन में जनजातीय साहित्य और संस्कृति को भारतीय अस्मिता का अभिन्न अंग बताते हुए इसके संरक्षण और संवर्धन की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि यह महोत्सव केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि भारत की आत्मा में रचे-बसे लोक और जनजातीय जीवन का सजीव उत्सव है। जनजातीय समाज की कथाएं मात्र मनोरंजन का माध्यम नहीं हैं, बल्कि वे जीवन का गूढ़ दर्शन, प्रकृति के साथ संतुलन, सामाजिक न्याय, सामूहिकता और नैतिक मूल्यों का गहन संदेश देती हैं।

उन्होंने आगे कहा कि यदि हम आदिकाल से लेकर आज तक के इतिहास को देखें तो जनजातीय समाज का योगदान हर युग में अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। ऋग्वेद में भी जनजातीय समुदायों की उपस्थिति और उनके जीवन मूल्यों का उल्लेख मिलता है, जो यह दर्शाता है कि भारतीय सभ्यता के निर्माण में उनका गहरा योगदान रहा है। केन्द्रीय राज्य मंत्री ने सामाजिक समरसता पर बल देते हुए राजा जनक द्वारा पुत्री सीता के स्वयंवर के प्रसंग का उल्लेख किया, जहां धनुष उठाने की शर्त में किसी प्रकार का भेदभाव नहीं था। इससे यह स्पष्ट होता है कि भारतीय समाज की मूल भावना समानता की रही है।

स्वतंत्रता संग्राम में जनजातीय समाज की भूमिका को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा कि अनेक वीरों ने राष्ट्र की स्वतंत्रता के लिए अपने प्राणों का बलिदान दिया। इस संदर्भ में उन्होंने धरती आबा बिरसा मुंडा का उल्लेख करते हुए कहा कि आज उनके योगदान को व्यापक स्तर पर पहचान मिल रही है। उन्होंने यह भी कहा कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में ऐसे भूले-बिसरे रणबांकुरों को खोजकर उन्हें सम्मानजनक स्थान देने का कार्य निरंतर किया जा रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि जनजातीय समाज की गहराई को समझना केवल अध्ययन का विषय नहीं, बल्कि एक संवेदनात्मक अनुभव है। उन्होंने कहा कि आज आवश्यकता इस बात की है कि हम जनजातीय संस्कृति, भाषा और परम्पराओं को केवल संरक्षित ही न करें, बल्कि उन्हें मुख्यधारा के विमर्श का हिस्सा बनाएं।

डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने कहा कि जनजातीय परम्पराओं, भाषाओं और ज्ञान-प्रणालियों के दस्तावेजीकरण तथा प्रसार में संस्थान की भूमिका को रेखांकित किया। उन्होंने कहा, भारत के प्रत्येक महत्वपूर्ण साहित्यिक आयोजन में जनजातीय साहित्य को समुचित स्थान मिलना चाहिए। उन्होंने जनजातीय भाषाओं के संरक्षण पर बल देते हुए बताया कि भारत सरकार शीघ्र ही जनजातीय भाषाओं की लिपियों के शोध एवं विकास हेतु एक विशेष अभियान प्रारम्भ करने जा रही है। डॉ. जोशी ने पाण्डुलिपियों के सर्वेक्षण कार्य में सभी से सहयोग का आह्वान किया और कहा कि भाषा एवं ज्ञान की परम्परा को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना हम सबकी सामूहिक जिम्मेदारी है।
स्वागत भाषण करते हुए प्रो. रमेश चंद्र गौड़ ने बताया कि इस राष्ट्रीय सम्मेलन में 200 से अधिक प्रतिभागियों ने पंजीकरण कराया है। उन्होंने कहा कि भारतीय भाषाओं और संस्कृति के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए यह आयोजन एक नव-जागरण का सूत्रपात करेगा।

प्रो. के. के. मिश्रा ने जनजातीय ज्ञान परम्पराओं की अकादमिक प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला, तो प्रो. सरित के. चौधुरी ने जनजातीय साहित्य की विविधता और उसके वैश्विक महत्व पर अपने विचार व्यक्त किए।

महोत्सव के दौरान दो महत्वपूर्ण पुस्तकों – प्रो. के.के. मिश्रा की “रिइमैजिनिंग इंडियन एंथ्रोपोलॉजी : पास्ट एंड फ्यूचर” तथा प्रो. सरित के. चौधुरी की “द कल्चरल हेरिटेज ऑफ मिज़ोरम” का लोकार्पण भी किया गया। ये कृतियां भारतीय भाषाई एवं सांस्कृतिक विमर्श को नई दिशा प्रदान करती हैं।

महोत्सव के पहले दिन, उद्घाटन के बाद आयोजित बीज वक्तव्य सत्र में “परम्परा के स्वर : भारत में आदिवासी अमूर्त सांस्कृतिक विरासत” विषय पर गहन विमर्श हुआ। पहले दिन का समापन सायंकालीन सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के साथ हुआ, जिसमें जनजातीय कला और लोक अभिव्यक्तियों की जीवंत झलक दर्शकों को देखने को मिलीं।

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