सेना में महिला अधिकारियों से जुड़े अदालत के इस फैसले को विशेषज्ञों ने ऐतिहासिक, सुधारात्मक और महिला सशक्तिकरण की दिशा में बड़ा कदम करार दिया है। फैसले में कोर्ट ने सेना को निर्देश दिया कि परमानेंट कमीशन देने की प्रक्रिया पारदर्शी, निष्पक्ष और समान अवसर के सिद्धांत पर आधारित हो।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि महिलाओं के मूल्यांकन में अपनाए गए कुछ मानक और ACR (Annual Confidential Report) जैसे पहलू पूर्वाग्रह से ग्रसित रहे, जिससे उनकी समग्र मेरिट प्रभावित हुई। अदालत ने इसे “सिस्टमेटिक डिस्क्रिमिनेशन” मानते हुए सुधार के निर्देश दिए।
इस फैसले के साथ ही सेना में लंबे समय से चली आ रही उस व्यवस्था पर भी चोट की गई है, जिसमें महिला अधिकारियों को परमानेंट कमीशन के अवसर सीमित या बाधित रहे। कोर्ट ने यह भी कहा कि अब चयन प्रक्रिया में वैकेंसी, कट-ऑफ और अंक जैसी जानकारियों को अधिक पारदर्शी बनाया जाए, ताकि किसी तरह की मनमानी की गुंजाइश न रहे।
मानवीय पहलू को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने उन महिला अधिकारियों को भी राहत दी है, जिन्हें पहले परमानेंट कमीशन नहीं मिल पाया था। अदालत ने निर्देश दिया कि ऐसी अधिकारियों को 20 वर्ष की सेवा के आधार पर पेंशन लाभ दिया जाए, भले ही उन्हें दोबारा सेवा में शामिल करना संभव न हो। मीडिया के एक बड़े वर्ग ने इस फैसले को जेंडर इक्वालिटी की दिशा में निर्णायक कदम बताया है। रिपोर्ट्स के अनुसार, यह निर्णय न केवल वर्तमान बल्कि भविष्य में सेना में शामिल होने वाली महिलाओं के लिए भी करियर सुरक्षा और समान अवसर सुनिश्चित करेगा।
रक्षा व्यवस्था के जानकारों का मानना है कि यह फैसला सिर्फ एक सेवा शर्त का बदलाव नहीं, बल्कि सेना की संरचना और कार्यप्रणाली में दीर्घकालिक सुधार की शुरुआत है। इससे न केवल चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता बढ़ेगी, बल्कि सैन्य बलों में महिलाओं की भूमिका भी और व्यापक होगी। कुल मिलाकर, सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय एक साथ तीन स्तरों पर प्रभाव डालता है—
संवैधानिक स्तर पर समानता की पुष्टि, सामाजिक स्तर पर महिला सशक्तिकरण को मजबूती,
और संस्थागत स्तर पर सैन्य व्यवस्था में आवश्यक सुधार।
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