यह बातें सोमवार को बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन में, दोनों काव्य-विभूतियों की जयंती पर आयोजित कवि-गोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए,सम्मेलन-अध्यक्ष डॉ अनिल सुलभ ने कही। उन्होंने कहा कि, मनुष्यों ने कबीर के दोहों को रट तो लिया, उन पर व्याख्यान और उपदेश भी दिए, पर उन पर अमल नहीं किया। कबीर ने जिस वितराग और त्याग को, सार्थक जीवन का आधार और सोपान बताया, हमने उसे अपना ज्ञान प्रदर्शित करने का साधन समझा, आचरण योग्य नही माना। आज वासनाओं में डूबा संसार उसी पाखंड का परिणाम है।
डा सुलभ ने कहा था कि नागार्जुन एक जीवंत कवि थे। संतकवि कबीर की तरह अखंड और फक्कड़ थे। बेतरतीब बिखरे बाल, बढ़ी हुई दाढ़ी और उसमें भी छोटा क़द ! उन्हें एक विचित्र सा, किंतु स्तुत्य व्यक्तित्व प्रदान करता था। एक निरंतर गतिमान, महात्मा बुद्ध के उद्घोष – “बहुजन हिताए, बहुजन सुखाए, लोकानुकंपाए, चरैवेति! चरैवेति!” के प्रत्यक्ष और जीवंत उदाहरण थे बाबा! इसलिए कहीं एक जगह ठहरते नहीं थे।
इस अवसर पर आयोजित कवि-सम्मेलन का आरंभ चंदा मिश्र ने वाणी-वंदना से किया। वरिष्ठ कवि डा रत्नेश्वर सिंह, चित्तरंजन लाल भारती, इरफ़ान अहमद बेलहरबी, आचार्य सचिन बृजनाथ, कुमार अनुपम, विभा रानी श्रीवास्तव, ईं अशोक कुमार, इन्दु भूषण सहाय, कमल नयन श्रीवास्तव, डा मदन कुमार चौरसिया, अरविंद कुमार वर्मा आदि कवियों ने अपनी रचनाओं से उत्सव को मधुमय बनाया। मंच का संचालन कवि ब्रह्मानन्द पाण्डेय ने तथा धन्यवाद-ज्ञापन कृष्ण रंजन सिंह ने किया।
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