बिहार के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान ने भारत की सांस्कृतिक जड़ों और राष्ट्रीय चेतना के पुनरुत्थान पर लिखी गई इस पुस्तक के महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने मत व्यक्त किया कि भारतीय ज्ञान परम्परा को वैश्विक विमर्श में स्थापित करने के लिए ऐसे गंभीर अध्ययन अत्यंत आवश्यक हैं। उन्होंने कहा, हमने साधारणतया रिलीजन का अनुवाद धर्म समझ लिया, जिसे मैं सही नहीं मानता। धर्म बुनियादी तौर पर कर्तव्य और अपनी ज़िम्मेदारियों को निभाना है। धर्म का वास्तविक आशय परिस्थितियों के अनुसार अपने कर्म का निर्णय करना है। धर्म निर्देशात्मक है, यह अवधारणा भारतीय धारणा के ख़िलाफ जाती है। उन्होंने कहा कि नेशन-स्टेट की अवधारणा 100-150 साल पुरानी है। दुनिया में शासन के दो ही तरीके थे- साम्राज्य और कबीले। भारत राष्ट्र को यूरोपीय पैमाने से परिभाषित मत कीजिए। वहां राष्ट्र की अवधारणा महज 100-150 साल पुरानी है। भारत की राष्ट्रीय चेतना आध्यात्मिक है, सांस्कृतिक है। भारत ने मानवता का दिव्यताकरण किया और दिव्यता का मानवीकरण किया। यह दुनिया को भारत की सबसे बड़ी देन है। दुनिया में एक ही संस्कृति है भारत, जिसने कहा कि हर व्यक्ति में दिव्यता देखो।
उन्होंने मुग़ल औपनिवेशिकता और ब्रिटिश औपनिवेशिकता के संदर्भ में बात करते हुए कहा कि ब्रिटिश शासन स्पष्ट रूप से औपनिवेशिक था, परंतु मुग़ल शासन सांस्कृतिक और मानसिक स्तर पर उससे भी अधिक हानिकारक सिद्ध हुआ। उन्होंने यह भी कहा कि भारत के इतिहास को न समझना या नज़रअंदाज़ करना केवल भारत के साथ अन्याय नहीं, बल्कि उस व्यापक ज्ञान-परम्परा के प्रति भी उपेक्षा का भाव था, जिसे विश्व स्तर पर सराहा गया। उन्होंने संदर्भित किया कि इस्लामी परम्परा के भीतर भी ज्ञान को सर्वोच्च माना गया है और पैग़म्बर द्वारा व्यक्त यह कथन रेखांकित किया कि उन्हें “हिन्द की धरती से ज्ञान की शीतल हवा” महसूस होती थी। उन्होंने कहा कि यदि ज्ञान की यह प्रतिष्ठा स्वीकार की जाती है, तो भारत की ज्ञान-परम्परा और इतिहास को समझना स्वयं उस दायित्व का ही अंग है। पुस्तक के संदर्भ में उन्होंने कहा कि इसमें अनेक नए तथ्य और दृष्टिकोण प्रस्तुत किए गए हैं, विशेषकर कुछ अध्याय भारतीय इतिहास की जटिलताओं और सांस्कृतिक प्रवाह को समझने में अत्यंत महत्त्वपूर्ण संकेत करते हैं। उन्होंने कहा कि अध्ययन, इतिहास-बोध और आत्म-विवेक ही राष्ट्र के प्रति कर्तव्य को सही अर्थ में पहचानने का मार्ग बनाते हैं।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए राम बहादुर राय ने कहा कि यह पुस्तक न केवल इतिहास का पुनर्स्मरण कराती है, बल्कि भारत की सभ्यतागत दृष्टि की व्याख्या करते हुए हमारे वर्तमान और भविष्य को दिशा प्रदान करती है। उन्होंने कहा कि यह पुस्तक कुछ लोगों को आनंदित करेगी, कुछ लोगों को उदास करेगी। यह उन लोगों को उदास करेगी, जो भ्रमित हैं और अपनी पहचान से परिचित नहीं हैं। यह पुस्तक आत्मपरिचय कराती है। यह बताती है कि हमारा अतीत क्या है और अपने अतीत को हम कैसे जान सकते हैं। उन्होंने लेखक अभिजीत जोग की प्रशंसा करते हुए कहा कि लेखक ने बहुत शोध करके यह पुस्तक लिखी है। उन्होंने यह भी कहा कि संविधान हमको भारतीयता के क़रीब नहीं पहुंचाता। संविधान का 73वां और 74वां संशोधन महात्मा गांधी के ग्राम स्वराज के सपने के पूरा करता है क्या? इसका उत्तर है- नहीं।
विशिष्ट अतिथि के रूप में विचार व्यक्त करते हुए डॉ. राम माधव ने लेखक की शोधपूर्ण दृष्टि और विषय की प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि भारत की वास्तविक पहचान को समझने के लिए ऐसी वैचारिक पुस्तकों का समाज में व्यापक प्रचार-प्रसार होना चाहिए। उन्होंने कहा, एक बड़े परिवर्तन के दौर से गुज़र रहा है हमारा देश। यह एक संधिकाल है। पुराने अनुभवों को छोड़ते हुए, नए अनुभवों तक पहुंचने के दौरान कुछ बुरी शक्तियां भी अपना सिर उठाती हैं। हमें इस परिवर्तन को गंभीरता से लेना चाहिए। यह परिवर्तन 70 साल पहले हो जाना चाहिए था, देश को भारत बनने की ओर अग्रसर होना चाहिए था। उन्होंने संविधान सभा में हुई कुछ बहसों का उल्लेख करते हुए कहा कि संविधान में देश का नाम ‘इंडिया दैट इज भारत’ लिखा है। कुछ लोग चाहते थे कि देश का नाम इंडिया होना चाहिए, तो कुछ का मानना था कि भारत होना चाहिए। उन्होंने कहा, संविधान में ‘भारत’ समझौते के तहत आया, पूरे मन से नहीं आया। उन्होंने यह भी कहा कि भारत महान राष्ट्र है, यह भावना महसूस होती है क्या? जब तक हममें इसकी अनुभूति पैदा नहीं होगी, तब तक केवल कहने से काम नहीं चलेगा।
उद्घाटन संबोधन देते हुए आईजीएनसीए के सदस्य सचिव डॉ. सचिदानन्द जोशी ने कहा कि भारत की सांस्कृतिक परम्पराओं के संरक्षण एवं संवर्धन का कार्य तभी सार्थक होगा, जब हम अपनी जड़ों और अस्मिता को समझने वाले साहित्य को बढ़ावा देंगे। उन्होंने कहा, यह पुस्तक भारत की अवधारणा को बताने की कोशिश करती है। भारत के बारे में सत्य क्या है, भारत का सत्त्व क्या है और भारत का स्वत्व क्या है, यह जानने-समझने में पुस्तक मदद करती है। उन्होंने यह भी कहा कि ब्रिटिशों के आने से पहले भी क्या भारत उपनिवेश था मुगलों का, और अगर था तो दोनों उपनिवेश में फर्क क्या था, इस पर अध्ययन होना चाहिए।
पुस्तक के लेखक अभिजीत जोग ने कहा कि इस पुस्तक के लोकार्पण और चर्चा के लिए आईजीएनसीए से बेहतर और कोई जगह नहीं हो सकती थी। उन्होंने कहा कि हमें बार-बार इतनी प्रकार से समझाया गया कि भारत अशिक्षित था, ग़रीब था कि हम भी मानने लगे। इस बात ने भारत को स्थायी रूप से नुकसान पहुंचाया। प्रधानमंत्री ने आह्वान किया है कि हमें ‘मैकाले मानसिकता’ से अगले 10 सालों में मुक्त होना है। इस आह्वान के बाद भी यह मानसिकता अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई। यह पुस्तक भारत की वास्तविक पहचान को लोगों के समक्ष लाने का एक छोटा-सा प्रयास है।
स्वागत भाषण आईजीएनसीए के डीन प्रो. (डॉ.) रमेश सी. गौर ने दिया। उन्होंने वक्ताओं और अतिथियों का स्वागत किया और कार्यक्रम की रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए लेखक के शोध कार्य और पुस्तक की मुख्य अवधारणाओं का संक्षिप्त परिचय दिया। कार्यक्रम का प्रारम्भ और समापन राष्ट्रगान से हुआ। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में विद्वानों, शोधार्थियों, विद्यार्थियों और साहित्य-संस्कृति के क्षेत्र से जुड़े लोगों ने भाग लिया। उपस्थित जनसमूह ने पुस्तक के प्रस्तुत चिंतन, विमर्श और वक्ताओं के विचारों में गहरी रुचि दिखाई।
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