पुस्तक “मुक्तिपथ का अनथक पथिक” का संपादन किया है हिंदी के चर्चित लेखक रणेन्द्र और हिंदी के प्राध्यापक , समालोचक मिथिलेश ने. इस पुस्तक में एक वृहत संपादकीय के अतिरिक्त बाईस संस्मरणात्मक लेख और स्वयं डॉ खगेंद्र ठाकुर का भी एक लेख शामिल है .इन लेखों के लेखक/लेखिका इस प्रकार हैं: 1.मेरे मित्र खगेंद्र :मुरली मनोहर प्रसाद सिंह 2. साहित्य और राजनीति के अनन्य साधक:डॉ व्रज कुमार पाण्डेय 3. खगेंद्रजी:अरुण कमल 4.खगेंद्रजी का जाना : कर्मेंदु शिशिर 5.विनयशीलता की प्रतिमूर्ति थे खगेंद्र ठाकुर: जयनंदन 6. सामाजिक सरोकार की खोज के आलोचक: डॉ.अमरनाथ 7. मैंने उनको जब जब देखा लोहा देखा:संतोष दीक्षित 8.दिल्ली दरबार बड़ा संकीर्ण है:पूनम सिंह 9.खगेंद्र ठाकुर :साहित्य और जीवन दर्शन: रवींद्र नाथ राय 10.खगेंद्र ठाकुर का राजनीतिक – वैचारिक चिंतन:प्रो.मिथिलेश 11. नाम में क्या रखा है:कमल 12.समाज,साहित्य और और जीवन के महान योद्धा : सुमंत शरण 13.वह चिराग जिससे मयस्सर होती रही रोशनी: कृपाशंकर 14.’साहित्य बाजार के लिए नहीं लिखा जाता ‘: अरविंद श्रीवास्तव . पुस्तक के दूसरे खंड में सिर्फ संस्मरण हैं . 15.पक्षधर की भूमिका में :रेवती रमण 16.सिर्फ गतिशीलता नहीं ,उनमें प्रगतिशीलता और संगठन के लिए तार्किक प्रतिबद्धता थी :विनीत तिवारी 17.मेरे बाबूजी : निशि प्रभा (डॉ खगेंद्र ठाकुर की सुपुत्री )19.हिंदी में आलोचना और खगेंद्र ठाकुर :सतीश कुमार राय 20.परिवर्तनकामी युवाओं के प्रेरक प्रतिबद्ध आत्मीयता लेखक:रमेश ऋतंभर 21. डॉ.खगेंद्र ठाकुर को जैसा मैंने देखा :शेखर मल्लिक 22.जस की तस धर दीनी चदरिया:वागीश कुमार झा एवं राजेश कुमार झा. और तीसरा खंड साक्षात्कार एवं उनके लेख का है. खगेंद्र ठाकुर की संगिनी इंदिरा ठाकुर से लेखिका पूनम सिंह का एक आत्मीय संवाद एवं खगेंद्र ठाकुर जी का विशद लेख.
दो सौ चौसठ पृष्ठ के इस पुस्तक में हिंदी के एक विद्वान प्राध्यापक समालोचक, सामाजिक कार्यकर्ता और चिंतक के बारे में विशेष जानकारी प्राप्त होती है जिससे उनके अनेक चाहने वाले अनभिज्ञ थे .पुस्तक की छपाई बहुत ही सुंदर है.सारे विद्वानों का लेख भी बहुत पठनीय है. पुस्तक अति पठनीय और संग्रहणीय है.
पुस्तक: मुक्तिपथ का अनथक पथिक, संपादक: रणेन्द्र,मिथिलेश
पृष्ठ: 264 , प्रकाशक: अभिधा बुक्स, मूल्य: रु.400.

(प्रमोद कुमार झा तीन दशक से अधिक समय तक आकाशवाणी और दूरदर्शन के वरिष्ठ पदों पर कार्यरत रहे. एक चर्चित अनुवादक और हिन्दी, अंग्रेजी, मैथिली के लेखक, आलोचक और कला-संस्कृति-साहित्य पर स्तंभकार हैं।)
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आलोचक और चिंतक डॉ. खगेंद्र ठाकुर पर केंद्रित पुस्तक मुक्तिपथ का अनथक पथिक हिंदी साहित्य की वैचारिक परंपरा को समझने का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज़ है। रणेन्द्र और मिथिलेश के संपादन में तैयार यह कृति केवल संस्मरणों का संकलन भर नहीं, बल्कि एक ऐसे प्रतिबद्ध बुद्धिजीवी के जीवन, विचार और संघर्ष का जीवंत चित्र प्रस्तुत करती है, जिसने साहित्य को समाज से जोड़कर देखा।
पुस्तक में संकलित विविध लेखों के माध्यम से डॉ. ठाकुर का व्यक्तित्व अनेक आयामों में उद्घाटित होता है—एक गंभीर आलोचक, एक सक्रिय सामाजिक चिंतक और एक विनम्र मनुष्य के रूप में। यह कृति न केवल उनके समकालीनों की स्मृतियों को सहेजती है, बल्कि नई पीढ़ी के लिए भी वैचारिक प्रेरणा का स्रोत बनती है। संक्षेप में, यह पुस्तक हिंदी साहित्य में वैचारिक प्रतिबद्धता और सामाजिक सरोकारों की परंपरा को समझने के लिए अत्यंत पठनीय और संग्रहणीय है।
संपूर्ण पुस्तक का सुंदर परिचय!
खगेंद्र ठाकुर के जीवन के विविध आयामों से परिचित होने के लिए यह निश्चित ही संग्रहणीय और पठनीय संपादित पुस्तक साबित होगी।
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