भाषा और परिसीमन पर सियासी घमासान: डीएमके बनाम केंद्र सरकार

तमिलनाडु की डीएमके सरकार ने केंद्र की नई शिक्षा नीति के तीन-भाषा फॉर्मूले और 2026 के बाद संभावित परिसीमन पर विरोध जताया है।

Written By : MD TANZEEM EQBAL | Updated on: March 27, 2025 10:19 pm

केंद्र सरकार की नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) में शामिल तीन-भाषा नीति और 2026 के बाद प्रस्तावित परिसीमन अभ्यास को लेकर तमिलनाडु की सत्ताधारी पार्टी डीएमके और केंद्र की भाजपा सरकार के बीच तीखी राजनीतिक बहस छिड़ गई है। डीएमके ने इस नीति को हिंदी थोपने की कोशिश” करार दिया है, जबकि बीजेपी ने डीएमके पर विभाजनकारी राजनीति” का आरोप लगाया है।

तीन-भाषा फॉर्मूले पर डीएमके का विरोध

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने केंद्र की तीन-भाषा नीति को खारिज करते हुए कहा कि यह दक्षिण भारत पर हिंदी थोपने का प्रयास है। उन्होंने कहा कि तमिलनाडु हमेशा से दो-भाषा नीति (तमिल और अंग्रेज़ी) का समर्थन करता रहा है, और किसी भी भाषा को थोपे जाने का वे कड़ा विरोध करते हैं।

“हम किसी भाषा का विरोध नहीं करते, हम भाषा के ज़बरदस्ती थोपने और सांस्कृतिक वर्चस्व के खिलाफ हैं,” — एम.के. स्टालिन

परिसीमन पर दक्षिण के राज्यों की चिंता

मुख्यमंत्री स्टालिन ने केंद्र के आगामी सीटों के परिसीमन (Delimitation) अभ्यास पर भी सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि 2026 के बाद जब लोकसभा सीटों का वितरण जनसंख्या के आधार पर होगा, तो दक्षिणी राज्यों को नुकसान उठाना पड़ेगा।

उन्होंने कहा कि दक्षिणी राज्यों ने परिवार नियोजन और जनसंख्या नियंत्रण में उल्लेखनीय सफलता पाई है। लेकिन जब संसदीय प्रतिनिधित्व की बात होगी, तो कम जनसंख्या की वजह से सीटें कम हो सकती हैं, जबकि उत्तर भारत के राज्यों को अधिक प्रतिनिधित्व मिल सकता है।

“हमने जनसंख्या नियंत्रण के ज़रिए देश के विकास में योगदान दिया है, लेकिन उसी वजह से संसद में हमारी आवाज़ कमज़ोर कर दी जाएगी?” — स्टालिन

योगी आदित्यनाथ का पलटवार: “यह देश को बांटने की राजनीति”

डीएमके के आरोपों पर प्रतिक्रिया देते हुए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि हिंदी से घृणा करना अनुचित है। उन्होंने कहा कि तमिल और संस्कृत जैसी भाषाएं भारत की प्राचीन धरोहर हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हिंदी को खारिज किया जाए।

“देश को भाषा और क्षेत्र के आधार पर नहीं बांटना चाहिए। यह देश की एकता के खिलाफ है। डीएमके सिर्फ वोट बैंक बचाने के लिए भाषा की राजनीति कर रही है।” — योगी आदित्यनाथ

उन्होंने काशी-तमिल संगमम् के आयोजन का उदाहरण देते हुए प्रधानमंत्री मोदी को धन्यवाद भी दिया और कहा कि यह कार्यक्रम दोनों संस्कृतियों को जोड़ने का माध्यम है।

🔹 स्टालिन का तीखा जवाब: “हमें नफरत पर उपदेश मत दीजिए”

योगी आदित्यनाथ के बयान पर स्टालिन ने एक्स (पूर्व ट्विटर) पर तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने लिखा:

“तमिलनाडु का स्टैंड अब देशभर में गूंज रहा है और बीजेपी साफ तौर पर बौखलाई हुई है। अब योगी आदित्यनाथ हमें नफ़रत पर उपदेश दे रहे हैं? यह व्यंग्य नहीं, राजनीतिक ब्लैक कॉमेडी है।”

स्टालिन ने आगे कहा कि यह लड़ाई दंगा कर वोट लेने की राजनीति” नहीं है, बल्कि यह सम्मान और न्याय के लिए है।

भाषा और परिसीमन को लेकर डीएमके और केंद्र सरकार के बीच चल रहा यह विवाद, केवल राजनीतिक बहस नहीं, बल्कि भारत के संघीय ढांचे और क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व के भविष्य से भी जुड़ा हुआ है। आने वाले समय में यह मुद्दा संसद और सड़क दोनों पर गहराई से चर्चा का विषय बन सकता है।

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