पाठकों को हिंदी के प्रसिद्ध कवि श्रीकांत वर्मा की बहुचर्चित कविता ‘मगध’ याद होगी. पिछली शताब्दी के उत्तरार्द्ध में हिंदी के बहुत प्रातिष्ठित कवियों ने भारतीय इतिहास के प्राचीन स्थानों, पात्रों और ग्रंथों से प्रेरणा लेकर कविताएं लिखी थीं जो खूब चर्चित भी रहीं और लोकप्रिय भी हुईं. भारतीय सूचना सेवा में लंबे समय तक वरिष्ठ अधिकारी के रूप में कार्य करते हुए राकेश रेणु लगातार बहुत सारे विषयों पर लिखते रहे पर कविता से उनका लगाव हमेशा रहा !.
136 पृष्ठ की इस पुस्तक में राकेश जी ने 70 छोटी कविताओं को शामिल किया है. कवि एक निरपेक्ष मन्तव्य रखता है. एक सच्चा कवि आम जन का पक्षधर होता है. राकेश भी अपने सच्चे कवि रूप में उपस्थित हैं इस संग्रह में. कुर्सी का पुजारी, सत्ता का प्रशंसक कवि नहीं भाट होता है. राकेश मगध को नए रूप में निहारते हैं. मगध का इतिहास और यहां के लोगों की कहानी अन्य कई स्थानों से बिल्कुल भिन्न है. राकेश रेणु बर्तमान मगध को पुनः एक बार देखते हैं. राकेश ने पुस्तक के प्रारंभ में ही कहा है कि यह पुस्तक “नये मगध के बाशिन्दों के लिए” है.
राकेश पुराने मगध के आलोक में नए मगध और यहां के बाशिंदों को कुछ याद दिलाने का प्रयास करते हैं अपनी कविता में. इन पंक्तियों को देखिए: ‘जनता साँस रोके खड़ी थी/अध्यापक-विद्यार्थी-अभिभावक सब सावधान थे/ सबको घटोत्कच का इंतज़ार था/ नई घोषणाओं का इंतज़ार था.” (नये मगध में-एक) एक अन्य कविता देखिए: *ख़तरा* संविधान/किसान/ आदमी की जान/ भाषा-बोली-मुस्कान/देसी लोग देसी खान -पान/जुलूस-नारे -बयान /नाटक-सिनेमा-कविता-गान/पत्रकार-अखबार/साहित्य और विचार/संवेदना और प्यार/यानी खतरा किसे नहीं है ”
राकेश रेणु कविता में जैसे शब्द चित्र बनाते चले जाते हैं. दृश्यों, चरित्रों और परिस्थितियों का एक ‘कोलाज’ बनाते चले जाते हैं. भाषा के धनी राकेश जी कहीं भी विचारक बनने का प्रयास नहीं करते सिर्फ परिस्थिति और दृश्य सामने रखते हैं सोचने का काम उन्होंने पाठकों पर छोड़ रखा है. इनकी कविताओं को पढ़ते हुए कभी भवानी प्रसाद मिश्र, कभी नागार्जुन और कभी उर्दू कवि इब्ने इंशा की याद आती है.
संग्रह में कुछ लंबी कविताएं भी होतीं तो और अधिक आनंद आता. पुस्तक की छपाई उत्कृष्ट है. मुखपृष्ठ पर लिया गया चित्र भी प्रतीकात्मक है . पुस्तक पठनीय और संग्रहणीय है. एक बार पढ़ने के बाद बार बार पढ़ने की इच्छा होगी.
संग्रह:नये मगध में, कवि :राकेश रेणु
पृष्ठ :136, प्रकाशक: अनुज्ञा बुक्स , मूल्य: रू.199

(प्रमोद कुमार झा तीन दशक से अधिक समय तक आकाशवाणी और दूरदर्शन के वरिष्ठ पदों पर कार्यरत रहे. एक चर्चित अनुवादक और हिन्दी, अंग्रेजी, मैथिली के लेखक, आलोचक और कला-संस्कृति-साहित्य पर स्तंभकार हैं।)
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बढ़िया समीक्षा।
बहुत शानदार समीक्षात्मक विवरण ….
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