विद्याभूषण जी ने पत्रकारिता की है, रिपोर्ताज लिखे हैं, संपादन किया ,कविताएं लिखी हैं. कई कविताओं और कहानियों का संग्रह प्रकाशित है. इनकी रचनाओं का अनुवाद गुजराती,तेलुगु और अंग्रेजी में हो चुकी हैं .झारखंड की भाषा कुड़ुक और नागपुरी में ‘ पठार को सुनो ‘(कविता संग्रह) का भाषांतर हो चुका है. कथा संकलन के प्रारंभ में”कहानी सिर्फ कहानी नहीं होती” में चंद पंक्तियों में अपनी बात रखते हुए विद्याभूषण ही कहते हैं : ‘….वर्गीय निष्ठाओं की दृष्टि से विभाजित किसी समाज में सर्वानुमति की तलाश एक दिवास्वप्न से कम हरगिज़ नहीं।कहानी अपने कहानीपनके बूते कभी -कभी उन बंद घरों के लिए रोशनदान बन सकती हैं। लिहाजा, कहानी सिर्फ कहानी नहीं होती..’ यूं भी कहते हैं कि कहानी कभी खतम नहीं होती . कहानी समाप्त होने के बाद पाठकों के मन में अलग -अलग कहानी शुरू हो जाती है.और यही कहानी की सफलता और सार्थकता भी है!
“इंटरवल के बाद”संग्रह के नाम से ही कथाकार का इशारा भी समझ में आता है. आम बोलचाल की भाषा में भी ये बहुत कुछ कह जाता है. ये कहानियां मध्यवर्ग(या यूं कहें कि निम्न मध्यवर्ग) के जीवन के उत्तरार्द्ध की कहानियाँ हैं. एक कवि के रूप में या कथाकार के रूप में विद्याभूषण जी बहुत सजग हैं और अपना मैदान कभी नहीं छोड़ते!
जिस निम्न मध्य वर्ग को पिछले सात आठ दशकों से देख रहे हैं, महसूस कर रहे हैं, अनुभव कर रहे हैं उसे छोड़कर काल्पनिक दुनिया में कभी गए ही नहीं.इनके सारे पात्र , इनकी सारी कहानियां इनके जीवन से जुड़ी लगती हैं. इनके लिखने का ढंग भी बिल्कुल रेखाचित्र की तरह लगता है.इनके अलग अलग कहानियों के अलग अलग पात्र और परिवेश किसी बैंक ही कहानी के अंश लगते हैं ! शायद कथाकार विद्याभूषण उपन्यास की तैयारी तो नहीं कर रहे ? 158पृष्ठ के इस कथा संग्रह में सोलह कहानियाँ हैं. सभी कहानी एक डोरी से बंधी हुई लगती है. संभव है ऐसा अनायास ही हुआ हो.
कुछ कहानियों के शीर्षक देखें : पिता का जन्म, रेत में आंसू, मां पापा होटल, बुद्धिनाथ का इम्तहान ,जमीर जमीन और जज़्बा और इंटरवल के बाद इत्यादि. यूँ तो इस संग्रह की सभी कहानियां निराली हैं पर कहानी “इंटरवल के बाद” थोड़ा अवाक कर जाती है. सामान्य से थोड़ा हटकर होते हुए भी कहानी कहीं भी अस्वाभाविक नहीं लगती! इसमें कथाकार की भाषा ,शब्द चयन भी कभी कभी अचंभित कर जाती हैं, उर्दूऔर स्थानीय भाषा का प्रयोग कर कथाकार ने और भी विश्वसनीयता प्रदान की है. संग्रह अति पठनीय, रोचक और संग्रहणीय है. पुस्तक की छपाई, मुखपृष्ठ और प्रस्तुति आकर्षक है।
कथा संग्रह : इंटरवल के बाद, लेखक: विद्याभूषण, पृष्ठ:158. प्रथम संस्करण: 2026,
प्रकाशक: राधाकृष्ण पेपरबैक्स , मूल्य: रु.250

(प्रमोद कुमार झा तीन दशक से अधिक समय तक आकाशवाणी और दूरदर्शन के वरिष्ठ पदों पर कार्यरत रहे. एक चर्चित अनुवादक और हिन्दी, अंग्रेजी, मैथिली के लेखक, आलोचक और कला-संस्कृति-साहित्य पर स्तंभकार हैं।)
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