हिंदी में और हिंदी साहित्य में महिलाओं द्वारा ,महिलाओं के दृष्टिकोण से बहुत कुछ लिखा गया है पिछले एक शताब्दी में .पर फिर भी सुषमा की कविताओं में नारी मन के उस क्षणिक मनोभाव को अपनी कविताओं में व्यक्त किया है. इस कविता संग्रह के बारे में प्रसिद्ध कवि लीलाधर मंडलोई कहते हैं: “सुषमा सिन्हा का यह तीसरा संग्रह भी पढ़कर लगा,इसमें मनुष्य से लेकर ईश्वर से अनेक सवाल हैं उत्तर की प्रतीक्षा में।एक बड़ा कैनवास है अवचेतन से चेतन तक फैला।ये स्त्री का मनोजगत है दुविधाओं और विडंबनाओं से घिरा जिसमें वह इस दुनिया से मुखातिब है।इस संवाद के लिए उत्सुक है”.
सुषमा की कविताओं में झलकता है कि उनकी रचनाओं की प्रेरणाश्रोत उनकी मां रही हैं.उन्होंने इस कविता संग्रह को समर्पित भी किया है “प्यारी मम्मा के लिए “. इस संग्रह में छोटी छोटी 87 कविताएं है.अधिकांश कविताएं स्वयं से एक वार्तालाप लगती हैं, कुछ कविताएं इस सृष्टि, मनुष्यता, समाज,परिवेश और परिवार से कुछ प्रश्न करती सी लगती हैं. सुषमा ने क्षण के छोटे टुकड़े में आए भाव को भी सुंदर शब्दों में पिरोया है . कभी कभी ऐसा भी लगता है जैसे सुषमा पूरी स्त्री समुदाय की ओर से प्रश्न पूछ रही हों, चिंता व्यक्त कर रही हों और दुखी भी हो रही हों.
सामान्य मध्यवर्गीय परिवार में पली बढ़ी प्रशासनिक अधिकारी रही सुषमा ने लड़कियों की, महिलाओं की, स्त्रियों की, प्रौढ़ाओं की और वृद्धाओं की विभिन्न चिंताओं, मनोभावों और आशंकाओं को अपनी कविता का विषय बनाया है. सुषमा को समकालीन सामाजिक परिस्थितियां और घटनाएं भी परेशान करती हैं और ऐसा इनकी कविताओं में साफ झलकता है.
इनकी एक कविता है “निर्भया नहीं हूं”.देखिए इस कविता को: ‘ शामिल है भय/ इस तरह मेरी सांसों में/ कि माँ के गर्भ में भी तलाशती हूं ईश्वर . शामिल है भय/ मेरी आंखों में ऐसे/ कि मिलाती नहीं हूँ किसी से नजर. भय शामिल है/ मेरी आवाज में इतना/ कि अटक अटक जाते हैं शब्द गले में. शामिल है भय/ मेरे मन में इतना/ कि भागती फिरती हूँ बेचैन/घर से बाहर और बाहर से भीतर. भय शामिल है/ जीवन में दुःखों की तरह/कि थामे ही रहना चाहती हूँ/किसी न किसी का हाथ. भय से बनी मैं,भय में पली हूँ/सिर से पाँव तक हूँ भयातुर/अंतर्मन तक हूँ आकुल व्याकुल. अब तो शामिल हो चुका है भय/ मेरे सपनों में भी इस कदर/ कि नींद में अक्सर निकल जाती है चीख -/ “नहीं… नहीं…. मैं नहीं हूँ निर्भया।’
कवि युग का प्रतिनिधि होता है और कविताओं में अपने समय के सत्य को उजागर करता है . इनकी कविताओं को पढ़ते हुए कभी नागार्जुन, भवानी प्रसाद मिश्र और सर्वेश्वरदयाल सक्सेना भी याद आते हैं. इस संग्रह की कुछ कविताओं के शीर्षक देखिए तो आपको उसमें व्यक्त मनोभाव का अंदाजा लगेगा.जैसे: सुकून की नींद, दाँव ,छूटते हुए हाथ,पिता के बाद,आसरा, मेरी वसीयत, अनकहा, सोते हुए बुद्ध ,मंत्रमुग्ध इत्यादि. “सोते हुए बुद्ध” कविता के कुछ पंक्तियों को देखिये: ‘………….सोचती हूं / अगर तुमने महसूस की होती/ अपनों के प्रति भी अपनी जिम्मेदारी/ नहीं भाग पाते तब छोड़ कर उन्हें /और न ही सो पाते इस तरह/कभी भी /इतनी गहरी नींद।’ सुषमा की कविताएं कहीं से भी नकारात्मक कविताएं नहीं हैं ,न ही निराशावादी कविताएं हैं.ये कविताएं स्त्री मन की चिंताओं,व्यथाओं, आशंकाओं की अभिव्यक्ति हैं जो आम पाठक को आगाह करती हैं और एक चेतावनी देती हैं.संग्रह “समय से भारी सपने”अति पठनीय और संग्रहणीय हैं. मुखपृष्ठ बहुत ही आकर्षक है.
कविता संग्रह: समय से भारी सपने कवियित्री: सुषमा सिन्हा,पृष्ठ:144.
प्रकाशक: प्रकाशन संस्थान, नई दिल्ली. मूल्य: रु 300.

(प्रमोद कुमार झा तीन दशक से अधिक समय तक आकाशवाणी और दूरदर्शन के वरिष्ठ पदों पर कार्यरत रहे. एक चर्चित अनुवादक और हिन्दी, अंग्रेजी, मैथिली के लेखक, आलोचक और कला-संस्कृति-साहित्य पर स्तंभकार हैं।)
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हार्दिक आभार सर, हालांकि कुछ भावनाओं के उदगार व्यक्त करने हेतु शब्द नाकाफी होते हैं. फिर भी 🙏अभिनन्दन आपका कि आपने मेरी कविताओं को पढ़ा और उस पर बड़े मनोयोग से लिखा भी 🙏😊
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