संस्कृति से परंपरा का उद्भव होता है, जो सतत प्रवाह को बनाए रखती है : रामबहादुर राय

इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के कला निधि प्रभाग द्वारा, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय के सहयोग से आयोजित 10वां राष्ट्रीय जनजातीय एवं लोक संस्कृति साहित्य महोत्सव दो दिनों तक चले विचार-विमर्श, साहित्यिक संवाद और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के बाद समवेत सभागार में सम्पन्न हुआ। 25–26 मार्च 2026 को आयोजित इस महोत्सव का विषय ‘जनजातीय साहित्य, भाषाएँ, ज्ञान परंपराएँ और सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों का उत्सव’ था।

समापन सत्र को संबोधित करते मुख्य अतिथि रामबहादुर राय
Written By : डेस्क | Updated on: March 26, 2026 10:05 pm

समापन सत्र के साथ महोत्सव का औपचारिक समापन हुआ, जिसमें मुख्य अतिथि के रूप में  रामबहादुर राय उपस्थित रहे। अपने संबोधन में रामबहादुर राय ने कहा कि इस कार्यक्रम ने जनजातीय समुदायों की गरिमा, परंपराओं और भविष्य के प्रति एक नई आशा का संचार किया है। उन्होंने संग्रहालयों को अधिक गतिशील और संवादात्मक बनाने की आवश्यकता पर बल दिया और सुझाव दिया कि वे ऐसे जीवंत स्थल बनें जहाँ लोग अपने इतिहास और सांस्कृतिक स्मृतियों से पुनः जुड़ सकें। बिहार संग्रहालय का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि वहाँ इतिहास को अनुभवात्मक और जीवंत रूप में प्रस्तुत किया गया है, जहाँ लिखित और अलिखित दोनों परंपराओं को समान महत्व दिया गया है। उन्होंने भाषा, समाज और संस्कृति के गहरे अंतर्संबंध को रेखांकित करते हुए कहा कि भाषा समाज को आकार देती है, समाज से संस्कृति का निर्माण होता है और संस्कृति से परंपरा का सतत प्रवाह उत्पन्न होता है, जो एक जीवंत धारा की तरह आगे बढ़ता रहता है।

इस सत्र में डॉ.रमेश सी. गौर ने संक्षिप्त उद्बोधन दिया, प्रो. अमिताभ पांडे ने संगोष्ठी प्रतिवेदन प्रस्तुत किया तथा प्रो. के. अनिल कुमार ने धन्यवाद ज्ञापन किया। देशभर से आए विद्वानों, लेखकों और परंपरा-धारकों को एक मंच पर लाते हुए इस महोत्सव ने जनजातीय साहित्य, भाषाओं और ज्ञान प्रणालियों पर सार्थक संवाद को प्रोत्साहित किया तथा समकालीन शैक्षणिक एवं सांस्कृतिक विमर्श में ऐसे प्रयासों को आगे बढ़ाने की प्रतिबद्धता को पुनर्स्थापित किया।

प्रो. रमेश चंद्र गौर ने अपने वक्तव्य में कहा कि ऐसे निरंतर प्रयास भारतीय भाषाओं और सांस्कृतिक परंपराओं के संरक्षण और संवर्धन के प्रति नई चेतना उत्पन्न कर सकते हैं। प्रो. के. अनिल कुमार ने धन्यवाद ज्ञापन करते हुए  जनजातीय गौरव से संबंधित प्रकाशनों और बिरसा मुंडा पर किए गए कार्यों का उल्लेख करते हुए विद्वानों, प्रतिभागियों, सहयोगी संस्थाओं और कलाकारों के योगदान की सराहना की।

महोत्सव के अंतिम दिन विभिन्न विषयगत सत्र आयोजित किए गए, जिनमें भाषा, ज्ञान प्रणालियों और जीवन्त सांस्कृतिक परंपराओं के परस्पर संबंधों पर चर्चा हुई। ‘मातृभाषा-आधारित बहुभाषी शिक्षा, भाषा नीति और नई शिक्षा नीति 2020’ विषयक सत्र में भाषा के शैक्षणिक और सांस्कृतिक महत्व पर विचार किया गया।

एक अन्य सत्र में लिपि विकास, लिपि पारिस्थितिकी और बहुभाषी शिक्षा जैसे विषयों पर चर्चा हुई, जिसमें भाषाई संरक्षण और लिपियों के दस्तावेजीकरण एवं पुनर्जीवन की आवश्यकता पर विचार किया गया।

दो दिनों तक चले इस महोत्सव ने जनजातीय साहित्य और ज्ञान परंपराओं पर सार्थक विमर्श को प्रोत्साहित किया और उन्हें व्यापक शैक्षणिक एवं सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में स्थापित किया। इसने देशभर के विद्वानों, लेखकों, शोधकर्ताओं और कलाकारों को एक मंच पर लाकर संवाद और सहयोग का वातावरण निर्मित किया। महोत्सव के समापन के साथ ही आईजीएनसीए ने भारत की विविध भाषाई और सांस्कृतिक परंपराओं के दस्तावेजीकरण, संरक्षण और संवर्धन के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को पुनः व्यक्त किया।

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