प्रदर्शनी के उद्घाटन के बाद, भगवान राम और अयोध्या की महिमा पर इन सभी ने अपने विचार साझा किए। उद्घाटन सत्र के दौरान गणमान्य अतिथियों ने तीन पुस्तकों का विमोचन भी किया। इस अवसर पर केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत ने प्रदर्शनियों का अवलोकन किया।
उद्घाटन सत्र के बाद, सांस्कृतिक प्रस्तुतियों की शृंखला में राजकुमार झा और उनके साथी कलाकार विनोद व्यास तथा श्री पंकज ने मृदंग वादन से समां बांध दिया। इसके बाद प्रज्ञा पाठक, विनोद व्यास, साकेत शरण मिश्र एवं उनके साथी कलाकारों ने अपने भजन गायन से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।
जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने 22 जनवरी को पुनर्निर्मित श्रीरामजन्मभूमि मंदिर के उद्घाटन के बारे में बात करते हुए कहा, मैं 22 जनवरी को तिथि नहीं, एक ऐसी सेतु के रूप में देखता हूं, जिसमें अतीत से वर्तमान को जोड़ने का एक वृहत्तर काम किया है। उन्होंने यह भी कहा कि यह सिर्फ एक प्राचीन शहर और तीर्थस्थल का पुनरुत्थान नहीं है, बल्कि सदियों के भारत ने एक आध्यात्मिक जागृति का अनुभव किया है। मेरा मानना है कि अयोध्या का महत्त्व भूगोल से परे है। अयोध्या आनंद और जागृति की कुंजी है। अयोध्या हमारी सांस्कृतिक एकता का प्रतीक है। अयोध्या हमारी प्रेरक शक्ति है। अयोध्या राष्ट्र का सांस्कृतिक और आध्यात्मिक आधार भी है। हज़ारों वर्षों से अयोध्या ने हमारी राष्ट्रीय पहचान और पूरे समाज को जोड़े रखने में सबसे महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
युवाओं को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा, मैं नई पीढ़ी से जरूर कहना चाहूंगा कि एक तरफ अयोध्या में जहां आप अध्यात्म का स्वर्ण शिखर देख सकते हैं, वहीं दूसरी तरफ अयोध्या में आपको व्यक्तिगत मूल्यों और आकांक्षाओं का प्रतीक मूल्य भी स्पष्ट रूप से नज़र आएगा। रामराज्य के संदर्भ में उन्होंने कहा, भगवान राम को विकास, साहस, न्याय और जीवंत धर्म का प्रतीक पुरुष मानते हैं। वह अवतार थे, लेकिन सुशासन के भी प्रतीक हैं। वह त्रेता युग में जरूर पैदा हुए थे, लेकिन वह भविष्योन्मुखी भी हैं। सुशासन के संदर्भ में श्री मनोज सिन्हा ने कहा कि आज भारत दुनिया का सबसे बड़ा सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रम चला रहा है।
इससे पहले, आईजीएनसीए के अध्यक्ष श्री राम बहादुर राय ने अयोध्या पर्व की रूपरेखा प्रस्तुत की। उन्होंने कहा कि अयोध्या का संदेश अब अनेक पुस्तकों और पत्रिकाओं में संरक्षित होने लगा है। लोकार्पित पुस्तक ‘चौरासी कोस का अयोध्या’ के संदर्भ में बात करते हुए उन्होंने कहा, भौतिक अयोध्या 84 कोस की हो सकती है, लेकिन आध्यात्मिक अयोध्या अनंत है, आकाश की तरह अनंत। वहीं गीता मनीषी पूज्य ज्ञानानंद जी ने कहा कि भारत परम्पराओं का देश है। इसमें पर्व परम्परा का विशिष्ट स्थान है। उन्होंने कहा, भारत केवल भौगोलिक आकार नहीं है, एक विचार है। एक चिंतन है। पूज्य महंत श्री कमल नयन दास महाराज ने सवाल किया कि वेद की किस ऋचा में भेदभाव और अस्पृश्यता की बात कही गई है। उन्होंने कहा, जब तक समरसता नहीं होगी, तब तक ज्ञान की पूर्णता भी नहीं होगी। सत्र के अंत में, फैजाबाद के पूर्व सांसद श्री लल्लू सिंह ने अतिथियों और आगंतुकों के प्रति धन्यवाद ज्ञापन किया।
गौरतलब है कि भारतीय संस्कृति, कला और आस्था के केन्द्र अयोध्या की गौरवगाथा को समर्पित ‘अयोध्या पर्व में’ अगले दो दिन तक कई संवाद सत्रों का आयोजन होगा और मधुर सांस्कृतिक प्रस्तुतियां होंगी। यह तीन दिवसीय सांस्कृतिक महोत्सव श्रद्धा, शास्त्रीयता और संवाद का संगम होगा, जिसमें देशभर के साधु-संत, सांस्कृतिक मनीषी, राजनेता, विद्वान, और कलाकार एक साथ जुटेंगे।
पर्व के दूसरे दिन, 12 अप्रैल को पूर्वाह्न 11 बजे ‘भारतीय समाज में मंदिर प्रबंधन’ विषय पर एक संगोष्ठी होगी, जिसमें अयोध्या के प्रमुख संत-महंतों के साथ प्रशासनिक और सांस्कृतिक विशेषज्ञ भागीदारी करेंगे। इसी दिन ‘भारतीय संस्कृति के नवाचार में गोस्वामी तुलसीदास जी का योगदान’ विषय पर एक संगोष्ठी होगी। दोनों सत्रों में देशभर के विद्वान वक्ता अपने विचार प्रस्तुत करेंगे। सांस्कृतिक कार्यक्रमों में, एकल तबला वादन के साथ ऋचा त्रिपाठी व सहयोगी कलाकारों द्वारा कथक एवं भरतनाट्यम की प्रस्तुति दी जाएगी।
अंतिम दिन 13 अप्रैल को पूर्वाह्न 11 बजे ‘कुबेरनाथ राय के निबंधों में श्रीराम’ विषय पर संगोष्ठी में हिंदी साहित्य के विद्वान भाग लेंगे। वहीं समापन समारोह में श्रीरामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष पूज्य गोविंद देव गिरि जी महाराज, मध्य प्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष श्री नरेन्द्र सिंह तोमर, आईजीएनसीए के अध्यक्ष श्री राम बहादुर राय, आईजीएनसीए के डीन (प्रशासन) एवं कला निधि प्रभाग के प्रमुख प्रो. रमेश चंद्र गौड़ और सुप्रसिद्ध कलाकार श्री सुनील विश्वकर्मा की उपस्थिति रहेगी। इसके बाद फौजदार सिंह और साथी कलाकार आल्हा गायन तथा लोकगायिका विजया भारती लोकगीतों की प्रस्तुति देंगी।
‘अयोध्या पर्व 2025’ का आयोजन कला, अध्यात्म और भारतीय जीवनमूल्यों के नवसंचार का एक अनूठा प्रयास है।
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