Humor-Satire : अधिकांश घरों में लटका ताला
हर गली में एक ऐसा घर होता था जहां महिलाओं की बैठकी लगती थी। चोथा, लट्टा, भक्का, चिउरी, दरिया, सत्तू, पीसान, भूंजा, हल- बैल, बुआई , कटनी, जांत, ढेंका ओखली से लेकर बहुओं की बड़ाई- शिकायत तक की बातें होतीं थीं। इनके पास विषयों की कोई कमी न थी। दीयाबरान का वक्त होने पर ही अंधेरे की वजह से गोष्ठी का समापन होता था। इन अधिकांश गोष्ठी केंद्रों पर भी ताला लटका था। जो घर खुले थे उनका बरामदा भी सूना था। धप, धप की आवाज सुन पीछे मुड़ा तो बैजू पास खड़ा था। अब उसकी सूरत डरावनी लगने लगी थी। कहां से बार- बार आ जाता है। क्या हुआ बाबू। चलिये। कुछ सोच रहे हैं क्या ? हां। गलियों में भी उदासी है। बैजू मुझे हास्यास्पद नजरों से देखते हुए बोला- धत्त तेरी की। आपको हो का गया है?
हर जगह उदासी दिखाई दे रही है। कहने को रौनक ही रौनक है। गांव में बिजली आ गई है। आटा मिल में पीसा जाता है। जांत का काम रहा नहीं। मसाला मिक्सी में पीस लेतीं हैं। सिलबट्टा का काम रहा नहीं। दुकानों में भूंजा बिकने लगा है। चिउरा – चिउरी के लिए अब ढेंका भी नहीं है। कपड़ा धोने के लिए वाशिंग मशीन है। बेनिया भी नहीं डोलानी है। पंखा, कूलर, और कुछ घरों में एसी है। अब महिलाएं ठंडी हवा में दिन भर टीवी देखती हैं। सास – बहू को किस्से वाले धारावाहिक…। हाहाहा…।
Humor-Satire: दुकानों से आता है नाश्ता
शाम को नाश्ता भी नहीं बनाना है। समोसे, चंद्रकला, मैगी, मंचुरियन, जलेबी , ब्रेड पकौड़ा दुकानों से आता है। जन्मदिन पर अब केक भी काटा जाता है। सत्यनारायण भगवान की कथा नहीं होती। दूब, रोली, गोबर, धनिया की पंजीरी … न जाने क्या- क्या। बहुत झंझट है। गांव तरक्की पर है। रौनक ही रौनक।
इस बार मेरा डर बैजू ने खत्म कर दिया। मुझे उसकी बातें तर्कसंगत लगीं। बदलाव तो स्वभाविक प्रक्रिया है। सदा एक जैसी संस्कृति नहीं रह सकती। कुछ मिटेगा तभी नयी आकृति पनपेगी।
Humor-Satire: कबूतरों ने किया स्वागत
घर लौटा। ताला खोल अंदर प्रवेश किया। निहारने लगा। इसी घर में बचपन बीता। विवाह हुआ। बच्चे हुए। घर में घुसते ही बाबूजी चहक उठते। बबुआ आ गया। कुछ खाने को दो। मां रसोई की ओर भागती। मेरे बच्चे बाबूजी की पीठ पर लदे रहते। दीदी और छोटी बहन बच्चों के साथ आ जाती तब तो घर स्वर्ग हो जाता। नजरों के सामने कई चित्र आए और गये। अब घर में सन्नाटे का राज था। छत के मुंडेर पर मस्त, गुलथूल दो कबूतर गूटर गूं… कर रहे थे। शायद वे कह रहे हों- गांव बदल गया है। लोग- बाग यहां की रौनक लेकर शहर में जा बसे। स्वागत के लिए अब हम ही हैं। सुखी हैं यहां। प्रदूषण नहीं है। शोर नहीं है। हर ओर शांति।
यहां भी है एकाकी जीवन
अपसंस्कृति नहीं है। कोई हमें मार कर खाता नहीं। मानवता- नैतिकता अब भी बची है। अब भी लोग चावल के दाने छीट देते हैं। पेट भर जाता है। कबूतरों पर से नजर हटा मैं धूल भरे कमरे में चला गया। लेटकर सोचने लगा। क्या दिल्ली से आकर यहां रह सकूंगा। जिस सामूहिकता की तलाश में गांव आना चाहता था, वह तो यहां भी नहीं रही। जैसे दिल्ली में एकांकी जीवन था, यहां भी कुछ उसी तरह का माहौल बनने लगा है, या बन चुका है। फिर भी बैजू जैसे अशिक्षित के पास भी हास- परिहास, हाजिर जवाबी, परिस्थिति अनुकूल अपने को ढालने का कौशल, हर लम्हें का सुख भोगने की कला तो बची है। नौकरी के दौरान यही सोचता था कि रिटायरमेंट के बाद गांव पर ही रहूंगा। उदासी मिटाने के लिये गाने लगा-
दिखे नाहीं जतवां, दिखे नाहीं ढेंकवा, झोंडियो के नामो निशान, ए भइया कहवां भुला गया गांव।
गली से बैजू की आवाज आई-
दिखत बाटे बाइक, दिखत बाटे कार , गउंवा के होता विकास, ए भइया दिल्ली में बनल मकान, ए भइया पटना में बनल मकान, ऐसे ही बदलता है गउंआ जहान। बैजू के जवाबी गीत से मैं भी मुस्कुराने लगा।
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