Poets and Poems
आसान है क्या
सोचो, ऐसा कर पाना आसान है क्या।
दर्द छुपाकर मुस्काना आसान है क्या।
ख़ुदगर्ज़ी से बाहर आना पड़ता है
काम किसी के भी आना आसान है क्या।
कड़वी बातें भी मुँह पर कह देता है
रखना उससे याराना आसान है क्या।
थोड़ा भी कमज़ोर पड़े तो हारेंगे
इच्छाओं से टकराना आसान है क्या।
सब कुछ जान के भी अंजान बने हैं जो
उन लोगों को समझाना आसान है क्या।
बाधाएँ पग-पग पर स्वागत करती हैं
कोई मंज़िल पा जाना आसान है क्या।
कहते हो अब केवल सच ही बोलोगे
काम जो तुमने है ठाना आसान है क्या।
मुजरिम है वो, मुंसिफ़ को मालूम है पर
दोषी उसको ठहराना आसान है क्या।
आलोचक दुश्मन सा लगने लगता है
कमियाँ अपनी सुन पाना आसान है क्या।
-ओमप्रकाश यती
– आठ ग़ज़ल संग्रह प्रकाशित।
-उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान के अदम गोंडवी सम्मान – 2020 से सम्मानित
-ग़ज़लें उत्तर महाराष्ट्र विश्वविद्यालय जलगाँव के एम. ए. द्वितीय वर्ष के पाठ्यक्रम में सम्मिलित। उत्तर प्रदेश के सिंचाई विभाग से अधीक्षण अभियन्ता पद से सेवानिवृत्त।
Poets and Poems
आत्मा
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उछलती कूदती उछल कर रह गयी
मृत्यु के द्वार पर भटक कर रह गयी !!
तन की रंगरेलिया मन की अठखेलियां
और अंत में तृष्णा प्यासी रह गयी !!
ये चली देख अब उड़ कर किस ओर
मेरे ही बदन को यूँ नंगा कर गयी !!
बादलों में मस्त नीले अम्बर के संग
स्वर्ग के द्वार ठिठक कर रह गयी !!
न ये तन मेरा था न ये मन मेरा था
राख़ में जाने क्या खोजती रह गयी !!
धूल से चिपक गयी,गर्द में मिल गयी
लहरो पर उश्रृंखलता, हवा में उड़ गयी !!
ना जाने इसका अब कहाँ हो ठिकाना?
पराये तन में जाने कहाँ घर कर गयी !!
–विश्वनाथ शिरढोणकर, इंदौर
हिंदी/मराठी में 25 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित. विश्वविद्यालय के पाठयक्रम में एक कविता और एक कहानी का समावेश. सोशल मीडिया पर 10 लाख से अधिक पाठक. ऑडिओ बुक में उपन्यास एवं 18 कहानियां.
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Poets and Poems
मेरे भीतर भी एक रावण
अक्सर मुझको
धमकाता है
मेरे भीतर का
एक रावण
जैसे ही आगे बढ़ता हूँ
सद्मार्ग की ओर
डाल देता है पाँवों में
प्रपंचों की लौह बेड़ियाँ
भींच बाहुओं में ले जाता है
गहन तिमिर के
झूठे और लुभावने घर में
भर देता है मेरे मन में
अहंकार और दुर्विचार
मेरी अर्जित पावनताओं को
कर देता है क्षार-क्षार
क्षण भर में
एक पल में ही जाग्रत करता है
द्वेष, दंभ, छल, पाखण्ड की
अगणित वंचनाएँ-क्षुद्रताएँ
करने लगती हैं जो मुझे क्षत-विक्षत
होने लगता हूँ जीवन से परास्त
अंततः निस्सहाय हो
पुकारता हूँ राम को
हे राम !
बचाओ मुझे रावण से
तब कहीं दूर से
आवाज आती है
अपने भीतर के रावण से
करना तुमको ही है महायुद्ध
करो शक्ति संचयन सद्गुणों की
भीतर के रावण की
मृत्यु सुनिश्चित है…
-डॉ. राम शंकर भारती, जालौन, उ.प्र
दो कविता संग्रह, दो ललित निबंध संग्रह व एक आलोचना की पुस्तक प्रकाशित।हिंदुस्तान एकेडेमी प्रयागराज उ०प्र० का वर्ष 2024 का एकेडेमी सम्मान।
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कलियुग
राम का चरित्र अनमोल है
इसलिए हर कोई लगा रहा इसका मोल है,
जलते हैं लोग चरित्र से उनके,
खुद हींन-चरित्र हैं जिनके
नकार दिया जिसने ईश्वर के अस्तित्व को
वो क्या बता पाएंगे किसी भी तत्व को,
इतिहास गवाह है वेदों का,
हंसता कलयुग अपने छलछन्दों पर
द्वापर, त्रेता, सतयुग नही मानता जो
हंसता ऐसे युग के राक्षसों पर,
जीत है उसकी कहता ये युग है
हँसता है कहता ये कलयुग है।
– ऋचा धर, अमृतसर
– गृहिणी हैं। कविताएं ( साझा संग्रह-जीवन ज्योति और मुहब्बतें) लुधियाना में प्रकाशित हैं। काव्य कला विरासत में पिता से मिली है।
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