Book review
इस वर्ष प्रकाशित कविता संग्रह ‘दक्खिन टोला'( कवि अंशु मालवीय ) विशेष चर्चा में है. समाज के सर्वहारा वर्गों से निकट सम्पर्क रखने वाले अंशु जी के पास विचारों का विशाल भंडार है पर बहुत छोटी कविताओं में उन विचारों को पाठक के सामने रखते हैं. उनकी ये कविताएं किसी बड़े लेख से भी अधिक प्रभावी होती हैं.एक अन्य कविता देखिये….
‘आपके खेत में पैदा करेले में क्या नया है? यह ज़रा हट के है, क्या यह हरा नहीं है? हरा तो होगा ही, क्या उसकी त्वचा चिकनी है
नहीं खुरदुरी तो होगी ही करेला जो ठहरा।’ (‘करेला ‘ ,पृष्ठ68) ‘
‘दक्खिन टोला’ एक 184 पृष्ठ की कविता संग्रह है जिसमें 92 कविताएं संकलित हैं. कवि अंशु मालवीय प्रयागराज की धरती के निवासी हैं और वहाँ की सांस्कृतिक विरासत की झलक इनकी कविताओं में दिखाई देती है. प्रयागराज का भारत के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विशेष महत्व रहा है. अंशु की कविता पढ़कर एक बार फिर भरोसा हो जाता है कि जबतक देश में जीवंत और मुखर कवि रहेंगे ,कविताएं लिखते रहेंगे तब तक सांस्कृतिक विरासत अक्षुण्ण रहेगी! एक और कविता की पंक्तियों को। देखिए : ‘सब कुछ ठीक था अम्मा! तेरे खाए अचार की खटास तेरी चखी हुई मिट्टी अक्सर पहुंचते थे मेरे पास…। सूरज तेरी कोख से छनकर मुझ तक आता था। मैं तेरी कोख के गुनगुने मुलायम अंधेरे से निकलकर चटक धूप फिर. चटक आग में पहुंच गई। वो बहुत बड़ा आपरेशन था अम्मा!’।
( ‘कौसर बानो की अजन्मी बिटिया की ओर से’ ,पृष्ठ 132)
संग्रह की एक और कविता ‘कॉम्पशनेट ग्राउंड’ की पंक्तियों को देखिए:
चौथ के करवा को ठोकर मारते हुए। टूटी चूड़ियों से खुरचती हुई चौखट पर ऎपन विधवाएँ काम पर जा रही हैं।’
संग्रह को लोक भारती पेपरबैक प्रकाशन, प्रयागराज ने प्रकाशित किया है.मूल्य:रु.299 है।
Book review : कविता संग्रह को जितनी बार पढ़ा जाय उतनी गहराई दिखती है.पठनीय और संग्रहणीय दोनों है !

(पुस्तक के समीक्षक प्रमोद कुमार झा रांची दूरदर्शन केंद्र के पूर्व निदेशक हैं और कला व साहित्य के राष्ट्रीय स्तर के मर्मज्ञ हैं।)
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