वसंतोत्सव: वफ़ा का दीप जलाना है क्या किया जाय ? ख़िलाफ़ सारा जमाना है क्या किया जाए?

गीत ग़ज़ल मंच के तत्त्वावधान में बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन में भव्य वसंतोत्सव का आयोजन हुआ कवि-सम्मेलन में 'कवि-कुल-गौरव' और 'कवि-कुल-चूड़ामणि' अलंकरणों से अतिथि कवि एवं कवयित्रियाँ विभूषित हुईं।

Written By : डेस्क | Updated on: March 12, 2025 7:53 pm

अमेठी से पधारी अखिल भारतीय मंचों की सुचर्चित और सुकंठी शायरा संदल अफ़रोज़ ने जैसे ही यह शेर पढ़ा कि “वफ़ा का दीप जलाना है क्या किया जाय? ख़िलाफ़ सारा जमाना है क्या किया जाए?/ उन्हें ये ज़िद है कि इज़हार कीजिए ग़म का/ मुझे भी कौल निभाना है क्या किया जाए”,  वसंतोत्सव में बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन में सैकड़ों हाथ खुले और तालियों की अनुगूँज से खचाखच भरा सभागार गूँज उठा।

देश-विदेश के मंचों पर अपनी संजीदा शायरी से यश बटोर चुके कोटा, राजस्थान के शायर डा कुँवर जावेद, नवगीत के राष्ट्रीय हस्ताक्षर आज़मगढ़, उत्तरप्रदेश के कवि वैभव वर्मा, हास्य और व्यंग्य के शीर्षस्थ हस्ताक्षर वाराणसी के कवि डा चकाचौंध ज्ञानपुरी, बनारस के ही ख्यातिनाम हास्य-कवि विकास बौखल, धौलपुर, राजस्थान के गीति-हास्य-कवि रामबाबू सिकरवार, देवरिया के चर्चित कवि बादशाह प्रेमी और सतना, मध्य प्रदेश की चर्चित कवयित्री कृपा संगम की दिल में उतरने वाली रचनाओं से सम्मेलन की दीवारें संध्या तक गाती-गुनगुनाती रही। हास्य-पिचकारियों में होली के रंग भर-भर कर कवियों ने रंगीन फुहारों से श्रोताओं को जी भर कर नहलाया। आनन्द-विभोर श्रोता रस-फुहारों में नहाते और झूमते रहे।

अखिल भारतीय गीत ग़ज़ल मंच के तत्त्वावधान में, बुधवार को मंच और सम्मेलन के अध्यक्ष डा अनिल सुलभ की अध्यक्षता में यह राष्ट्रीय वसंतोत्सव कवि-सम्मेलन का आयोजन किया गया था, जिसका उद्घाटन पटना उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश और राज्य उपभोक्ता संरक्षण आयोग के अध्यक्ष न्यायमूर्ति संजय कुमार और रुबन मेमोरियल अस्पताल के निदेशक डा सत्यजीत कुमार सिंह ने संयुक्त रूप से दीप प्रज्वलित कर किया। डा सिंह ने सभी आमंत्रित कवियों को सम्मेलन द्वारा प्रदत्त उपाधि ‘कवि-कुल-गौरव’ और कवयित्रियों को ‘कवि-कुल-चूड़ामणि’ अलंकरणों से सम्मानित किया। उन्होंने सम्मानित सभी कवियों और कवयित्रियों को अंग-वस्त्रम, स्मृति-भेंट और सम्मान-पत्रों के साथ ग्यारह हज़ार रूपए की सम्मान-राशि प्रदान की। इस अवसर पर सुप्रसिद्ध मनोरोग-विशेषज्ञ डा विनय कुमार विशिष्ठ अतिथि के रूप में उपस्थित थे।

आयोजन के सूत्रधार और अनेक राष्ट्रीय कवि-सम्मेलनों के संयोजक-संचालक काव्यप्रेमी ईं आनंद किशोर मिश्र के संचालन में आयोजित इस कवि-सम्मेलन का आरंभ सतना, मध्यप्रदेश की कृपा संगम ने वाणी-वंदना से किया।

डा कुँवर जावेद ने आज के हालात पर चिंता ज़ाहिर करते हुए सद्भावना की ये पंक्तियाँ पढ़ी कि “वह लोग साहिबे क़ुरआन हो नही सकते/किसी भी धर्म की पहचान हो नहीं सकते/ जो उग्रवाद को यारों जिहाद कहते हैं/ वह और कुछ हैं, मुसलमान हो नहीं सकते।” उन्होंने कटाक्ष करते हुए कहा कि “दुरंगे लोग तिरंगे की बात करते हैं।”

वैभव वर्मा का कहना हुआ- ” इन आंसुओं को अपना मुक़्क़दर बना लिया। तन्हाइयों के शहर में एक घर बना लिया / सुनते हैं पत्थरों को यहाँ पूजते हैं लोग/ इस वास्ते इस दिल को ही पत्थर बना लिया।” ।
डा चकाचौंध ज्ञानपुरी, विकास बौखल और रामबाबू सिकरवार ने अपनी रचनाओं से श्रोताओं को हँसा -हँसा कर रुला दिया। चकाचौंध जी ने कहा – “स्वतंत्रता का अमृत महोत्सव हम इस तरह मनाएँ हैं/ कि सन सैंतालिस से ए के सैंतालिस तक आए हैं”। बौखल ने आह्वान किया कि “किसी ख़ंजर से ना तलवार से जोड़ा जाए/ सारी दुनिया को चलो प्यार से जोड़ा जाए”।

कवयित्री कृपा संगम के शब्द और स्वरों की साधना ने वसंतोत्सव में पधारे श्रोताओं का दिल जीत लिया। उनकी इन पंक्तियों को खूब दाद मिली कि “कोई ऐतवार में नहीं आया/ कोई इंतज़ार में नहीं आया/ मुझसे टूटे हैं दिल बहुत लेकिन कोई अख़बार में नहीं आया”।

वसंतोत्सव के अपने अध्यक्षीय काव्य-पाठ में सम्मेलन अध्यक्ष डा अनिल सुलभ ने अपनी ग़ज़ल, “तड़प है कि तलब है कि ज़िद है बाक़ी/ यह दिल भी धड़कता है कि उम्मीद है बाक़ी” के माध्यम से ज़िन्दगी में उम्मीद रखने की हिमायत की। उन्होंने इस कवि सम्मेलन को एक यादगार और शानदार कवि-सम्मेलन बताया।

सम्मेलन की उपाध्यक्ष डा मधु वर्मा, डा पूनम आनंद, आचार्य आनन्द किशोर शास्त्री, श्याम बिहारी प्रभाकर, डा शालिनी पाण्डेय, डा प्रतिभा रानी, प्रो सुनील कुमार उपाध्याय, कृष्ण रंजन सिंह, कुमार अनुपम, पं यज्ञ नारायण पाण्डेय, सूर्य प्रकाश उपाध्याय, ईं अशोक कुमार, सदानन्द प्रसाद, बच्चा ठाकुर, उत्तरा सिंह, सुनील कुमार, डा पुष्पा जमुआर समेत सैकड़ों की संख्या में सुधी दर्शकों की उपस्थिति रही।

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2 thoughts on “वसंतोत्सव: वफ़ा का दीप जलाना है क्या किया जाय ? ख़िलाफ़ सारा जमाना है क्या किया जाए?

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