फणीश्वरनाथ रेणु के साहित्य में अंचल की व्यथा ही नही क्रांति के स्वर भी

फणीश्वरनाथ रेणु की जयंती पर बिहार राज्य साहित्य सम्मेलन में उनको श्रद्धापूर्वक स्मरण किया गया। इस अवसर पर लघुकथा-गोष्ठी भी आयोजित की गयी।

Written By : डेस्क | Updated on: March 4, 2025 6:15 pm

महान कथा-शिल्पी फणीश्वरनाथ रेणु के साहित्य में ग्राम्य-अंचल की व्यथा ही नहीं, विद्रोह और क्रांति के भी तप्ततीखे स्वर हैं। वे सीने में अग्नि को पोषित करने वाले, क्रांति-धर्मी कथाकार थे। जीवन भर संघर्ष-शील रहे। उनके हृदय की अग्नि लेखनी के माध्यम से कथाओं में प्रकट हुई। उन्होंने जो कुछ भी लिखा वह भोगे हुए यथार्थ पर आधारित था और जो लिखा उसे जिया भी। यह सच है कि उनके साहित्य में ग्राम्य और आंचलिकता की प्रधानता है।

यह बातें मंगलवार को बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन में रेणु जी की जयंती के अवसर आयोजित समारोह और लघुकथा-गोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए, सम्मेलन अध्यक्ष डा अनिल सुलभ ने कही। उन्होंने कहा कि महान और अद्भुत प्रतिभा के साहित्यालोचक आचार्य नलिन विलोचन शर्मा ने रेणु के बहुचर्चित उपन्यास ‘मैला आँचल’ को, हिन्दी का ‘श्रेष्ठतम आँचलिक उपन्यास’ माना था। नलिन जी की यही टिप्पणी रेणु जी की साहित्यिक यश-धारा की उन्नयन-बिंदु सिद्ध हुई और रेणु जी हिन्दी-संसार में छा गए। देश की स्वतंत्रता की लड़ाई में ही नहीं, स्वतंत्र भारत में भी वे पीड़ित-मानवता के लिए लड़ते-लिखते रहे।

डा सुलभ ने कहा कि, रेणु जी पर नेपाल में हो रही लोकतंत्र की लड़ाई का भी बड़ा असर था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा नेपाल में ही कोइराला परिवार के संरक्षण में हुई थी। भारत में वे स्वतंत्रता आंदोलन तथा बाद में समाजवादी आंदोलन से जुड़े रहे। उन्हें अनेक बार जेल की यातना भी सहनी पड़ी।

सम्मेलन के वरीय उपाध्यक्ष और वरिष्ठ साहित्यकार जियालाल आर्य ने कहा कि रेणु जी संपूर्णक्रांति के पक्षधर थे। अपने साहित्य में उन्होंने इस दर्शन को रखने की चेष्टा की। भारतीय ग्राम्य-जीवन का उन्होंने जीवंत चित्रण किया। उनके पात्र सजीव थे। उनके साहित्य को ठीक से पढ़ा जाना चाहिए। अधिकांश लोग उनके साहित्य पर सुनी-सुनायी बातें करते हैं।

अतिथियों का स्वागत करती हुईं सम्मेलन की उपाध्यक्ष डा मधु वर्मा ने कहा कि रेणु जी को नारी-मन की गहरी पकड़ थी। उन्होंने अपने साहित्य में स्त्रियों की मनोदशा का अत्यंत सुंदर और मार्मिक चित्रण किया है। वे आंदोलनकारी थे। जय प्रकाश आंदोलन में भी उनकी बड़ी भूमिका थी।

चंदा मिश्र की वाणी-वंदना से आरंभ हुए इस समारोह में डा मेहता नगेंद्र सिंह, कुमार अनुपम, ईं अशोक कुमार, सुधा पाण्डेय, डा पुष्पा जमुआर, डा अलका वर्मा, डा मीना कुमारी परिहार, सूर्य प्रकाश उपाध्याय आदि ने भी अपने विचारों में रेणु जी के व्यक्तित्व और कृतित्त्व को श्रद्धापूर्वक स्मरण किया।

इस अवसर पर आयोजित लघुकथा गोष्ठी में, डा पूनम आनंद ने ‘तृप्ति’, डा पुष्पा जमुआर ने ‘अनाथ’, डा नीलू अग्रवाल ने ‘काले घर’, उत्तरा सिंह ने ‘यादें’, सुधा पाण्डेय ने ‘जज़्बात’, डा अलका वर्मा ने ‘मैं ऋणी हूँ’, डा पूनम देवा ने ‘क़ीमत’, डा मेहता नगेंद्र ने ‘होलिका-दहन’, कुमार अनुपम ने ‘कुफ़्र टूटा’ , डा मीना कुमारी परिहार ने ‘बल’ तथा अशोक कुमार ने ‘पाश्विकता’ शीर्षक से लघुकथा का पाठ किया। मंच का संचालन ब्रह्मानन्द पाण्डेय ने तथा धन्यवाद-ज्ञापन प्रबंध मंत्री कृष्ण रंजन सिंह ने किया।

प्रो राम ईश्वर पंडित, डा प्रेम प्रकाश, प्रमोद आर्य, अरुण कुमार वर्णवाल, अनुभा गुप्ता, नन्दन कुमार मीत, कुमारी मेनका, कुमारी डौली, पत्रकार विजय कुमार सिंह समेत अनेक साहित्य सेवी एवं प्रबुद्धजन उपस्थित थे।

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