हमारे देश में बहुत सारे उच्च डिग्री धारियों की संख्या लाखों में होगी. उनमें से अधकांश बहुराष्ट्रीय उन कंपनियों के मोटी मासिक आय के लिये काम करते हैं. अव्वल आप देखेंगे तो इनमें से लाखों लोग देश की नदियों की धारा मोड़ने, उसमें बड़ी फैक्टरियों के उत्सर्जन बहाने, नदियों को प्रदूषित करने ,पहाड़ों को काटकर, तोड़कर सड़क बनाने का मूल काम करते हैं. इसी देश में सुंदरलाल बहुगुणा ,राजेन्द्र सिंह ,अनुपम मिश्र ,काका कालेलकर और डॉ. दिनेश कुमार मिश्र जैसे लोग भी हैं उन्होंने ‘समृद्धि’ के दौड़ में शामिल न होकर नदी, जंगल, पहाड़ ,पर्यावरण संरक्षण का मार्ग चुना. आई. आई. टी .खड़गपुर के पूर्व छात्र रहे डॉ. दिनेश मिश्र लगभग पिछले छह दशकों से हिमालय से निकली नदियों का अध्ययन कर रहे हैं.
इस दौरान उन्होंने जल- संकट,उत्तर बिहार की बाढ़, सुखाड़ जैसी समस्याओं को समूल में देखने की कोशिश की और अपने अध्ययन-मनन के आधार पर उन्होंने दर्जनों पुस्तकें लिखी हैं .इन पुस्तकों में समस्या के निदान पर भी विचार किये गए हैं .अब देखना ये है कि जो लोग अलग अलग सरकारों में बैठे हैं उनलोगों ने इन पुस्तकों को कितनी गंभीरता से लिया है. “बागमती की सद्गति” इसी शृंखला की एक पुस्तक है .188 पृष्ठ की इस पुस्तक में दिनेश कुमार मिश्र जी ने अपने सारे तथ्यों का संदर्भ भी संलग्न किया है .रोचक है नदियों के संबंध जो किस्से कहानियां प्रचलित हैं उसे भी नकारा नहीं गया है. हाल में अरावली की पहाड़ी श्रृंखला के अस्तित्व पर उठे सवाल और फिर उच्चतम न्यायालय के संज्ञान से इतना तो तय है कि पर्यावरण के प्रति चिंता और रुचि पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है और संवेदना अभी तक जिंदा है।
पुस्तक के प्रारंभ में ‘अपनी बात’ में दिनेश मिश्र जी लिखते हैं : “पंडित नेहरू ने नदियों की कहानी लिखने वाले से बहुत बड़ी अपेक्षाएं रखी थीं।महाभारत काल में द्रौपदी ने भी अपने पति की योग्यता निर्धारित करते1 समय ऐसा ही वरदान मांगा तो उसे पांच पुरुषों की सौगात मिली, तब जाकर कहीं उसके द्वारा स्थिर किये गए सारे गुण पूरे हो पाए।मैंने आज अकेले बिहार की एक नदी बागमती की कहानी लिखने की कोशिश की है और मैं बहुत विनम्रतापूर्वक यह कहना2 चाहूंगा कि मेरा कतई”बुद्धिमान और ज्ञानी” होने का दावा नहीं है और मैं अपने आप को अशान्त जिज्ञासा वाला ‘एक साधारण और छोटा इंजीनियर’ ही मानता हूँ।मुझे पं०नेहरू की बात अच्छी लगी और मैंने अपनी सामर्थ्य भर यह कहानीलिखने की गुस्ताखी की।पूरी कहानी कहने में शायद2 अन्य चार विद्वानों का साहचर्य ज़रूरी होगा।
दिनेश मिश्र जी ‘अपनी बात’में आगे लिखते हैं कि “….उधर प्रख्यात नदी चिंतक आचार्य काका साहेब कालेलकर का बागमती के बारे में विचार था कि इतनी छोटी नदी की ओर किसी का ध्यान नहीं जाएगा …. लेकिन बागमती ने एक ऐसा इतिहास प्रसिद्ध स्थान अपनाया है कि उसका नाम लाखों की जुबान पर चढ़ा हुआ है।पता नहीं क्यों काका साहेब को दो देशों से गुजरती हुई 600 किलोमीटर लंबी नदी छोटी लगी।इस नदी के के किनारे विष्णु और शंकर का वास था।इस नदी के पानी को गंगा से कई गुणा पवित्र मानकर धर्मग्रंथ उसे मोक्ष की धारा मानते हैं।
शांति का विस्तार ऐसा कि यह क्षेत्र सदियों से मनीषियों का साधना केंद्र बना रहा।सूखी लाठी तक में अंकुरण की क्षमता रखने वाली इस नदी के उर्वरक गुण के कारण यह इलाका कभी धन-धान्य से ज़रूर सम्पन्न रहा होगा ।इसमें से बहुत सी चीजों का लोप हो गया फिर भी बहुत कुछ बाकी है.’ इस शोधपरक पुस्तक में बहुत सारे ऐतिहासिक फ़ोटो का भी समावेश किया गया है. पुस्तक के कुछ अध्यायों की ओर ध्यान दें : बागमती नदी और काले पानी की कथा/ चानपुरा रिंग बांध/ करेह कथा/जेम्स रेनेल कर समय बागमती की धारा/विलियम हंटर द्वारा बतायी गई बागमती की धारा/ओ’मैली द्वारा तैयार किया गया बागमती का प्रवाह पथ/ नेपाल का रौतहट जिला/ बिहार की विभिन्न नदियों के तटबंधों में टूटन इत्यादि. पुस्तक सुंदर कागज़ पर छापी गयी है और आकर्षक है. श्रृंखला की अन्य पुस्तकों की तरह यह पुस्तक भी अति पठनीय और संग्रहणीय है.
पुस्तक: ‘बागमती की सद्गति’ लेखक:डॉ. दिनेश कुमार मिश्र ,. पृष्ठ:188
प्रकाशक: लोक विज्ञान संस्थान, देहरादून-248006 अपेक्षित सहयोग-रु 250/-

(प्रमोद कुमार झा तीन दशक से अधिक समय तक आकाशवाणी और दूरदर्शन के वरिष्ठ पदों पर कार्यरत रहे. एक चर्चित अनुवादक और हिन्दी, अंग्रेजी, मैथिली के लेखक, आलोचक और कला-संस्कृति-साहित्य पर स्तंभकार हैं।)
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