नेपाल : प्रतिनिधि सभा की बैठक में पीएम बालेन शाह की अनुपस्थिति पर विपक्ष का हंगामा, ये है पूरा मामला

नेपाल में सरकार गठन के बाद प्रतिनिधिसभा और राष्ट्रीयसभा के दो अधिवेशन हुए, लेकिन अब तक प्रधानमंत्री बालेन शाह ने एक बार भी सदन को संबोधित नहीं किया। गत सोमवार को संघीय संसद की संयुक्त बैठक में राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल जब अगले साल के कार्यक्रम का ब्यौरा पेश कर रहे थे, तभी प्रधानमंत्री शाह बैठक छोड़कर बाहर निकल गए थे। इस कार्यक्रम के समय प्रधानमंत्री बालेन शाह के ड्रेसकोड और उठकर जाने की घटना ने संसद और सोशल मीडिया दोनों तरफ पक्ष-विपक्ष में व्यापक बहस छेड़ दी थी।

Written By : डॉ. रक्षा कुमारी झा | Updated on: May 23, 2026 11:55 pm

इसी तरह सरकार की नीति तथा कार्यक्रम की चर्चा के तीनों दिन बालेन शाह के अनुपस्थित रहने के कारण सरकार और विपक्ष के बीच तीखा  टकराव देखने को मिला। कार्यक्रम के बाद राष्ट्रपति को विदाई देने के समय भी वे उपस्थित नहीं थे।
विशेषज्ञों के अनुसार संसदीय व्यवस्था में सरकार संसद के माध्यम से जनता के प्रति जवाबदेह मानी जाती है, इसलिए महत्वपूर्ण अवसरों पर प्रधानमंत्री की उपस्थिति को विशेष महत्त्व दिया जाता है। प्रधानमंत्री का संसद के प्रति जवाबदेह न होना विपक्षी दलों ने दुखद बताया। प्रतिनीधि
सभा के सरकार की नीति तथा कार्यक्रम में प्रधानमंत्री बालेन शाह की उपस्थिति न होने पर श्रम
संस्कृति पार्टी के अध्यक्ष हर्क साम्पांग ने उनके इस्तीफे की मांग तक कर दी थी।

सत्तापक्ष के सांसदों का कहना है कि प्रतिनिधि सभा नियमावली में प्रधानमंत्री की अनिर्वाय उपस्थिति का कोई प्रावधान नहीं है, इसलिए इस मुद्दे पर विरोध करना उचित नहीं है।  नई निमावली पारित न होने के कारण संसद का संचालन पुरानी नियमावली के आधार पर हो रहा है।

विपक्षी दलों ने सरकार द्वारा लाए गए अध्यादेशों और सुकुमवासी बस्तियों पर की गई कार्रवाई
को लेकर संसद में जोरदार विरोध देखने को मिला। विपक्षी दलों का आरोप है कि सरकार संसद
को दरकिनार कर अध्यादेशों के जरिए शासन चलाना चाहती है और विकास के नाम पर ग़रीब
तथा भूमिहीन नागरिकों का दमन कर रही है। संसद में नेपाल कम्युनिष्ट पार्टी, कांग्रेस, एमाले,
श्रम संस्कृति पार्टी और राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी के सांसदों ने सरकार पर लोकतांत्रिक मूल्यों को
कमजोर करने का आरोप लगाया है।

नेपाल कम्युनिष्ट पार्टी के संयोजक और पूर्व प्रधानमंत्री पुष्पकमल दहल प्रचंड ने मंगलवार को प्रतिनिधि सभा की बैठक को संबोधित करते हुए राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी को चेतावनी दी है कि यदि वे प्राप्त जनादेश का सम्मान करते हुए अहंकार का त्याग नहीं करते हैं, तो इतिहास खुद को दोहराएगा। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि ‘हार कर जीतना कठिन होता है, जीत को पचाना उससे भी अधिक कठिन होता है। संख्या कभी स्थायी नहीं होती और न ही जनता का समर्थन बिना शर्त होता है। कल नेकपा के रूप में हम भी इसी आकार में थे, लेकिन हमारी अपनी कमजोरियों के कारण वह टिक नहीं पाया। हमारे अनुभव और इतिहास से सीखें, इस बहुमत को अहंकार का खाद न बनने दें।’

उन्होंने वर्तमान सरकार की कार्यशैली की आलोचना करते हुए कहा कि गरीब, भूमिहीन और असहाय जनता पर प्रहार किया जा रहा है। उनका तर्क था कि बिना किसी विकल्प के भूमिहीन बस्तियों को तोड़ना गरीब को परेशान करना लोकतांत्रिक पद्धति नहीं है।
राप्रपा की प्रमुख खुश्बु ओली ने सुकुमवासी परिवारों की मौत पर सरकार की चुप्पी को
अमानवीय बताया। उन्होंने कहा कि गरीब और नदी के तट पर रहने वाले लोगों के घरों पर बुलडोजर चलवा कर सरकार ने अपनी असंवेदनशीलता को साबित कर दिया है। उधर एमाले सचिव और सांसद पद्मा अर्याल ने सरकार पर लोकतांत्रिक नैतिकता छोड़ने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि जो दल पहले अध्यादेश को लोकतंत्र पर हमला बताते थे, वही आज सत्ता में पहुंचकर उसी रास्ते पर चल रहे हैं। साथ ही अर्याल ने सरकार पर कटाक्ष करते हुए यह सवाल उठाया कि क्या ‘नयी सोच’ का मतलब संसद को किनारे कर कार्यपालिका की मानमानी थोपना है ? लोकतंत्र केवल शासन व्यवस्था नहीं है, यह शासन व्यवस्था के प्रति आस्था है। परिवर्तन अर्थ
परंपरा, अभ्यास, संस्कार और संस्थागत मूल्यों का विनाश करना है, बल्कि उनका संरक्षण करते
हुए समय के साथ परिष्कृत और उन्नत बनाते जाना है।

लेखिका डॉ. रक्षा कुमारी झा नेपाल से हैं और जेएनयू से पीएचडी हैं।

ये भी पढ़ें :-नेपाल में प्रधान न्यायाधीश की सिफारिश पर कार्यपालिका और न्यायपालिका में ठनी

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *