नेपाल में प्रधान न्यायाधीश की सिफारिश पर कार्यपालिका और न्यायपालिका में ठनी

हाल ही में संवैधानिक परिषद की बैठक में वरिष्ठता को दरकिनार कर प्रधान न्यायाधीश की नियुक्ति की सिफारिश को लेकर कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच टकराव की स्थिति उत्पन्न हो गई है। गुरुवार शाम को हुई परिषद की बैठक में दो सदस्यों की लिखित असहमति के बावजूद चौथी वरीयता क्रम के डॉ. मनोज शर्मा को प्रधान न्यायाधीश नियुक्त करने की सिफारिश की गई थी। वर्तमान में कार्यवाहक प्रधान न्यायधीश के रूप में कार्यरत पहली वरीयता की सपना प्रधान मल्ल, दूसरी वरीयता के कुमार रेग्मी और तीसरी वरीयता के हरि फुयाल को छोड़कर चौथी वरीयता के डॉ. मनोज शर्मा की नियुक्ति की सिफारिश की गई। सरकार की ओर से नियुक्ति की सिफारिश पर विपक्षी दलों नेपाली कांग्रेस, नेकपा एमाले, नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी, श्रम संस्कृति पार्टी और राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी ने विरोध जताया। श्रम संस्कृति पार्टी की ओर से उपसभामुख बनीं रूबी ठाकुर ने निर्णय का समर्थन किया लेकिन उनकी पार्टी ने इसका कड़ा विरोध जताया है।

Written By : डॉ. रक्षा कुमारी झा | Updated on: May 11, 2026 3:54 pm

अभी परिषद ने जो नियुक्ति की सिफारिश की है, क्या यह प्रक्रिया संवैधानिक है? उसकी वैधता का प्रश्न नहीं है लेकिन प्रश्न उठता है कि वरिष्ठ को दरकिनार करते समय परिषद को स्पष्ट रूप से कारण बताना चाहिए था। क्योंकि किसी भी न्यायाधीश द्वारा दी गई राय या फैसला कितना गुणात्मक है ? उनके फैसलों ने नेपाल के कानून और व्यवस्था, संविधान की व्याख्या और स्वतंत्र न्यायपालिका को कितना बल दिया है ? वह महत्त्वपूर्ण होता है। एक अपवाद को छोड़ दें तो पिछले सात दशकों से हर नियुक्ति में वरिष्ठता को स्वीकार किया जाता रहा है। यह लंबी परंपरा न केवल नेपाल में बल्कि भारत, बांग्लादेश, पाकिस्तान, श्रीलंका सहित पूरे दक्षिण एशिया की देशों में रही है।

इस सिफारिश के साथ ही प्रधानमंत्री बालेन शाह और पूर्व प्रधानमंत्री सुशीला कार्की के संबंध में दरारें आई हैं। जबकि इससे पहले जेनजी आंदोलन के बाद शाह और कार्की के बीच बहुत अच्छे संबंध रहे थे। कार्की पूर्व प्रधान न्यायाधीश भी रही हैं। कार्की सरकार की निर्णय के प्रति खुलकर अपना आक्रोश व्यक्त कर रही हैं। उन्होंने चौथी वरीयता के मनोज शर्मा के सिफारिश को गलत बताया है। उनका मानना है कि ऐसी सिफारिश करके विधि और परंपरा को तोड़ा गया है। उन्होंने आगामी दिनों के लिए भी बालेन सरकार को चेतावनी दी हैं कि इस निर्णय का परिणाम बहुत बुरा होने वाला है।

कार्यवाहक प्रधान न्याधीश मल्ल ने भी शनिवार को कानून दिवस के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में कहा, ‘न्यायपालिका और कानूनी राज्य के असमान प्रयोग की नींव रखने का प्रयास हो सकता है।’ साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि ‘अज्ञाकारी न्यायपालिका बनाने की कोशिश की जा रही है!’ प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस की दल के नेता भीष्मराज आंगदेम्बे और राष्ट्रीय सभा अध्यक्ष नारायण प्रसाद दहाल ने प्रधान न्यायाधीश की सिफारिश पर लिखित असहमति जताई है। संवैधानिक परिषद के इस निर्णय और कार्यवाहक प्रधान न्यायाधिश के बीच दरार आने की चिंता जताई जा रही है। वहीं वरिष्ठ अधिवक्ता उपेन्द्र केशरी न्यौपाने ने कार्यवाहक प्रधान न्यायाधीश मल्ल की अभिव्यक्ति को प्रधान न्यायाधीश के रूप में सिफारिश न होने के कारण उनकी हताशा बताया है। उन्होंने यह भी कहा कि कार्यवाहक प्रधान न्यायाधीश के पद पर रहते हुए राजनीति करना ठीक नहीं है। उनको पद की मर्यादा बनाए रखनी चाहिए। न्यौपाने का कहना है कि दो-तिहाई के करीब मत प्राप्त करने वाली सरकार को संविधान और कानून के दायरे में रहकर हर क्षेत्र में परिवर्तन करने को अन्यथा नहीं लिया जाना चाहिए। बल्कि यह देखना चाहिए कि सरकार द्वारा किया गया काम संविधान और कानून के विपरीत है या नहीं। उनका कहना है कि ऐसे परिवर्तन वर्ष 2007, 2015, 2047, 2062, 2063 में भी हुए थे।

नेपाल बार एसोशियन के अध्यक्ष एवं वरिष्ठ अधिवक्ता प्रो. विजयनरायण मिश्र की राय में सरकार कार्यपालिका और न्यायपालिका को अपने नियंत्रण में रखना चाहती है। दो तिहाई वाली सरकार न्यापालिका को और कमजोर करने, सिद्धांतों को निलंबित करने, विधि-विधान की अनदेखी करने और अपनी सर्वोच्चता कायम करने का षड़यंत्र रच रही है। सरकार अभी एक अतिवाद के नियंत्रण के नाम पर दूसरे अतिवाद के बीजारोपण करने का प्रयास कर रही है।

सरकार पर यह भी आरोप लग रहा है कि सरकार का नेतृत्व कर रही पार्टी रास्वपा ने चुनाव से पहले अपने घोषणापत्र में ही राज्य की संस्थाओं को राजनीतिकरण से मुक्त करेंगे कहकर जनता से बहुमत प्राप्त किया था, जो उनके व्यवहार में नहीं दिखता। हाल ही में संवैधानिक परिषद द्वारा प्रधान न्यायाधीश की नियुक्ति के लिए की गई सिफारिश को लेकर संविधानविदों और कानून विशेषज्ञों ने सरकार की आलोचना की थी, जिसे रास्वपा पार्टी के अध्यक्ष रवि लामिछाने ने खारिज कर दिया है। उन्होंने यह दवा किया कि सिफारिस संविधान द्वारा निर्धारित व्यवस्था और विधि के दायरे में रहकर की गई है। उनका जोर इस बात पर था कि न्यायालय को सड़क की बहस और विवाद का विषय नहीं बनाना चाहिए। अभी इस मुद्दे को लेकर राजनीतिक गलियारों में बहुत गहमागहमी है। अब ये देखना दिलचस्प होगा कि आगे की राह कैसी रहेगी!

लेखिका डॉ. रक्षा कुमारी झा नेपाल से हैं और जेएनयू से पीएचडी हैं।

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5 thoughts on “नेपाल में प्रधान न्यायाधीश की सिफारिश पर कार्यपालिका और न्यायपालिका में ठनी

  1. बहुत संयमित और सूचनाप्रद आलेख.इस लेख की लेखिका को नेपाल के बारे में और भी लेख सिलसिलेवार ढंग से लिखना चाहिए!

  2. बहुत संयमित और सूचनाप्रद आलेख.इस लेख की लेखिका को नेपाल के बारे में और भी लेख सिलसिलेवार ढंग से लिखना चाहिए! आम लोगों में इस निर्णय की प्रतिक्रिया भी अपेक्षित है .

  3. आपका लेख आइना दिखाने का काम कर रहा है , आप ऐसे ही लिखते रहिए , बहुत बढ़िया ।

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