जो जड़ों से जुड़े रहते हैं, वो अपनी भाषा में बात करते हैं: लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला

अंतरराष्ट्रीय सहयोग परिषद, वैश्विक हिन्दी परिवार, इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र (आईजीएनसीए) और भारतीय भाषा विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित तृतीय अंतरराष्ट्रीय भारतीय भाषा सम्मेलन का समापन 11 जनवरी को संपन्न हुआ। समापन सत्र में माननीय लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। विशिष्ट अतिथि थे दिल्ली विधानसभा के माननीय अध्यक्ष विजेंद्र गोयल। सत्र की अध्यक्षता आईजीएनसीए के अध्यक्ष एवं पद्म भूषण से सम्मानित प्रख्यात चिंतक राम बहादुर राय ने की। विशिष्ट वक्ता शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के राष्ट्रीय संयोजक ए. विनोद रहे। इस अवसर पर अंतरराष्ट्रीय सहयोग परिषद् के महासचिव श्याम परांडे का सान्निध्य भी प्राप्त हुआ। मंच पर सम्मेलन के निदेशक अनिल जोशी भी उपस्थित रहे। साथ ही, आईजीएनसीए के डीन (प्रशासन) रमेश चंद्र गौड़ और दिल्ली विश्वविद्यालय के भारतीय भाषा विभाग के अध्यक्ष रवि प्रकाश टेकचंदानी की भी गरिमामय उपस्थिति रही।

Written By : डेस्क | Updated on: January 11, 2026 9:20 pm

मुख्य अतिथि लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला ने कहा कि भारतीय भाषाएं हमारी आत्मा हैं। उन्होंने सम्मेलन के आयोजन पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि यह सम्मेलन अपने आप में विचारों को साझा करने का मंच है, जहां भारतीय भाषाओं के प्रचार-प्रसार के लिए संवाद संवाद हुआ और किस तरीके से हम आज नौजवानों को भारतीय भाषाओं से जोड़ सकते हैं, इस पर विचार हुआ। आज सबसे बड़ी चुनौती एक ही है कि जो दुनिया की सबसे समृद्ध भाषाएं हैं, जिन भाषाओं के एक-एक शब्द में भारत की आत्मा संस्कृति बसती है, उनसे हमारी वर्तमान पीढ़ी को कैसे जोड़ें। आप सब लोग यह प्रयास कर रहे हैं, इसके लिए मैं आप सबको साधुवाद देता हूं, बधाई देता हूं।

उन्होंने प्रवासियों की आने वाली पीढ़ियों को भारतीय भाषाओं से जोड़ने की आवश्यकता पर ज़ोर देते हुए कहा कि प्रवासी भारतीय, जो दुनिया के अलग अलग देशों में गए हैं, निश्चित रूप से उन्हें अपनी संस्कृति पर, अपने संस्कारों पर गर्व है। लेकिन प्रयास करना चाहिए कि उनकी जो आने वाली पीढ़ी है, उसे भारतीय भाषाएं सिखाएं।

उन्होंने भारतीय भाषाओं की उन्नति के लिए भारत सरकार द्वारा किए जा रहे कार्यों के बारे में बताते हुए कहा कि भारत की संसद में आठवीं अनुसूची में शामिल 22 भाषाओं का अनुवाद होता है। उन्होंने कहा, मुझे खुशी है कि कई माननीय सांसद अपनी भाषा में लोकतंत्र के मंदिर संसद में अपनी बात कहते हैं और मेरा प्रयास होगा कि इस बजट सत्र में भारत के अलग-अलग क्षेत्रों के सब माननीय सांसद अपनी भाषा में बात रखें, ताकि भारत की भाषाओं का विस्तार संसद से, लोकतंत्र के मंदिर से हो। यह प्रयास शुरू हो चुका है। माननीय प्रधानमंत्री जी ने भी इसकी सराहना की है।

उन्होंने यह भी कहा, जो जड़ों से जुड़े रहते हैं, जो भारत की मिट्टी से जुड़े होते हैं, अपनी भाषा में बात करते हैं। मैं दुनिया में अलग-अलग देशों में जाता हूं, तो देखता हूं कि कई देश के राष्ट्राध्यक्ष केवल अपनी भाषा में बात करते हैं। भारत के प्रधानमंत्री जी दुनिया के किसी भी मंच पर, वैश्विक मंच पर जाते हैं, तो अपनी भाषा में बात करते हैं। हम भी दुनिया की संसद के अंदर, किसी प्लेटफॉर्म पर जाते हैं, तो अपनी भाषा में बात करते हैं। हमें गर्व है हमारी भाषा पर। हमारी भाषा में अगर हम दुनिया के प्लेटफॉर्म पर बात नहीं कहेंगे, तो कौन कहेगा! और इसीलिए हमारा प्रयास है कि वैश्विक मंचों पर भी भारतीय भाषाओं में अपनी बात को रखा जाए।

उन्होंने भाषा के प्रसार में फिल्मों के योगदान को रेखांकित करते हुए कहा कि हिन्दी फिल्मों ने भी दुनिया भर में अपनी भाषा को पहुंचाने का कार्य किया है। मुझे खुशी है कि किसी देश में जाता हूं, तो वहां लोग कहते हैं कि हमें आपके हिन्दी गाने अच्छे लगते हैं। वह महसूस करते हैं कि भारतीय भाषाएं कितनी समृद्ध हैं। अलग-अलग प्रदेशों की अलग-अलग भाषा है और हर भाषा समृद्ध है, जिसमें भारत की मिट्टी, भारत की संस्कृति की झलक नज़र आती है।

संसद में भारतीय भाषाओं के प्रयोग पर बात करते हुए उन्होंने कहा, भारत की 22 भाषाओं में संवाद हो, चर्चा हो। जिसको जिस भाषा में सुनना है, सुने। हम किसी पर भाषा थोपने का काम नहीं करते। हमारा प्रयास यह ज़रूर है कि भारतीय भाषाओं का प्रसार हो। भारतीय भाषाओं की समृद्धि हो, खुशहाली हो, उसके माध्यम से भारत की संस्कृति दुनिया में पहुंचे, यह हमारा प्रयास है। इसके प्रयास हम कर रहे हैं और निश्चित रूप से परिणाम आएंगे। आने वाली पीढ़ी को भारतीय भाषाओं पर गर्व हो। मैं आयोजकों को बहुत-बहुत साधुवाद देता हूं, बधाई देता हूं।

अध्यक्षीय उद्बोधन में रामबहादुर राय ने कहा कि सम्मेलन में जो आशाएं प्रकट की गई हैं, उम्मीदें व्यक्त की गई हैं, वो पूरी हों। लेकिन हमें यथार्थ की धरती पर भी खड़े रहना चाहिए। हमें यह देखना चाहिए कि हम खड़े कहां हैं। यह आयोजन महत्त्वपूर्ण है। इसे दो बातों से हम साफ-साफ समझ सकते हैं कि ये कितना महत्त्वपूर्ण है। पहला, भारतीय भाषाओं की एक अंतरराष्ट्रीय अर्थात् वैश्विक परिधि है, आयोजन ने ये साबित किया। इसी से एक दूसरी बात निकलती है कि भारतीय भाषाओं की एक वैश्विक परिधि तो है, उस परिधि का केन्द्र कौन-सा है? तो इस आयोजन में जिस भाषा में बात हो रही है, वही इस परिधि का केन्द्र भी है, और उसको हिन्दी कहते हैं। हिन्दी ही भारतीय भाषाओं का केन्द्र है।

उन्होंने कहा, ऐसे आयोजन की आवश्यकता क्यों पड़ी, यह बात हमें सोचनी चाहिए, क्योंकि भाषाओं के केन्द्र में जहां हिन्दी होनी चाहिए, वहां हमने अंग्रेजी को महारानी के आसन पर बिठा दिया है। वह ऐसा आसन है, जहां से अंग्रेजी हटने को तैयार नहीं और हम हटाने के तैयार नहीं। 75 साल हो गए इस बोझ के ढोते। उन्होंने कहा कि आज एक ऐसा व्यक्ति लोकसभा का अध्यक्ष है, जो हिन्दी का पुजारी है, हिन्दी का प्रेमी है। अगर भारतीय भाषाओं को सम्मान देना है, उनको चलन में लाना है, तो प्रत्येक मंत्रालय में आठवी अनुसूची में शामिल सभी 22 भारतीय भाषाओं के अनुवादक सरकार को नियुक्त करने चाहिए।

लोकसभा अध्यक्ष की उपस्थिति में उन्होंने भारत सरकार से आग्रह किया कि भारत सरकार एक संस्थान बनाए, जो भाषा की समायोजना, भाषा की योजना और भाषा की समस्याओं को हल करने के लिए विशेषज्ञों को स्थान दे। उन्होंने कहा कि हमको संकल्प करना चाहिए कि अपनी भाषा को अनुवाद की भाषा नहीं बनाएंगे। हम अपनी भाषा की मौलिकता को बनाए रख सकते हैं। ज़रूरत है नए संकल्प की और इस संकल्प में समाज, व्यक्ति, संगठन जितना कारगर होते हैं, उससे ज़्यादा ज़िम्मेदारी है भारत सरकार की।

विजेंद्र गोयल ने कहा कि हमारी भाषाएं, जिनका विश्व में अपना एक स्थान है, सम्मान के साथ-साथ स्वाभिमान का विषय हैं। भारतीय भाषाओं की चर्चा करना वास्तव में एक निरंतरता की चर्चा करना है। हमारी भाषाएं न तो एकरसता में विकसित हुई हैं और न ही अलग-थलग। सदियों से विविध प्रदेशों, समुदायों, आस्थाओं और ज्ञान परम्पराओं के परस्पर संवाद ने इन्हें आकार दिया है। इस सम्मेलन में अंतरराष्ट्रीय भागीदारी ने इसकी महत्ता को बढ़ा दिया है। यह दिखाता है कि हमारी भाषाएं भौगोलिक सीमाओं से नहीं बंधी हैं। वहीं श्याम परांडे जी ने कहा कि किसी भी सभ्यता-संस्कृति का चिंतन वहां की भाषाओं में ही हो सकता है।

सम्मेलन के निदेशक अनिल जोशी ने तीन दिनों में हुई चर्चाओं का सार प्रस्तुत किया और आगे की कार्ययोजना प्रस्तुत की। कार्यक्रम के प्रारम्भ में, श्री विनय शील चतुर्वेदी ने स्वागत भाषण करते हुए अतिथियों के प्रति आभार व्यक्त किया। मंच संचालन डॉ. अनीता वर्मा ने किया। तीन दिनों के इस अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में 40 से अधिक सत्र आयोजित किए गए, जिनमें भारतीय भाषाओं से जुड़े विषयों पर चर्चा की गई। इस सम्मेलन में ब्रिटेन, कनाडा, न्यूज़ीलैंड, ऑस्ट्रेलिया, सिंगापुर, श्रीलंका, नेपाल, नीदरलैंड, फ्रांस, मॉरीशस, थाईलैंड, जापान सहित कई देशों के 100 से अधिक अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधियों ने भाग लिया।

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