कमर्शियल गैस की कीमतों में बढ़ोतरी को विपक्ष ने सीधे चुनावी रणनीति से जोड़ते हुए केंद्र सरकार पर निशाना साधा है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने महंगाई के मुद्दे पर सरकार को घेरते हुए कहा— “I had said it”, और एलपीजी की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी को जनता पर बोझ बताया। कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने भी कहा कि कीमतों में यह इजाफा चुनाव खत्म होने के बाद किया गया है, जिसका असर आम लोगों और छोटे कारोबारियों पर पड़ेगा।
तेल कंपनियों द्वारा जारी ताजा दरों के अनुसार देश के प्रमुख शहरों में कमर्शियल सिलेंडर की कीमतें ₹3000 के पार पहुंच चुकी हैं। दिल्ली में ₹3,071.50, मुंबई में करीब ₹3,046, चेन्नई में ₹3,250 से अधिक और कोलकाता में ₹3,350 के आसपास कीमत दर्ज की गई है। कई शहरों में यह बढ़ोतरी ₹1,000 से भी ज्यादा रही है, जिसे अब तक की सबसे बड़ी एकमुश्त वृद्धि माना जा रहा है।
इस बढ़ोतरी का सबसे तीखा असर उन लोगों पर पड़ रहा है जो घर पर खाना नहीं बना पाते और शहरों में सड़क किनारे सस्ते ढाबों या ठेलों पर भोजन करते हैं। कमर्शियल गैस ही इन छोटे कारोबारियों की रसोई का आधार है। कीमत बढ़ते ही ठेलों, ढाबों और छोटे रेस्टोरेंट्स में खाने की कीमतें बढ़ने लगी हैं। आकलन है कि सस्ती थाली 20 से 30 प्रतिशत तक महंगी हो सकती है। इसका सीधा असर दिहाड़ी मजदूरों और निम्न आय वर्ग पर पड़ेगा, जिनकी रोजमर्रा की जिंदगी पहले से ही महंगाई के दबाव में है।
ऊर्जा क्षेत्र के जानकारों का कहना है कि मिडिल ईस्ट में तनाव, कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें और आयात लागत में उछाल के कारण यह बढ़ोतरी अपरिहार्य थी। लेकिन विपक्ष का आरोप है कि इन कारणों के बावजूद चुनाव के दौरान कीमतें नहीं बढ़ाई गईं और मतदान समाप्त होते ही एक साथ बोझ डाल दिया गया।
कमर्शियल गैस की कीमतों में यह उछाल अब सिर्फ एक आर्थिक निर्णय नहीं रह गया है। यह मुद्दा राजनीति, महंगाई और आम आदमी की थाली—तीनों के केंद्र में आ गया है, जहां सबसे ज्यादा मार उस वर्ग पर पड़ रही है जो दिनभर की कमाई के बाद फुटपाथ पर सस्ती थाली से पेट भरता है।
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