ऋषि मार्कण्डेय : शिव और शक्ति दोनों के परमभक्त

महान ऋषि मार्कण्डेय भारत के संत, तपस्वी और विद्वान कहे जाते हैं। वे शिव और शक्ति—दोनों के परम भक्त थे। ऋषि मार्कण्डेय का जीवन केवल चमत्कार नहीं, बल्कि अटूट भक्ति, धर्मनिष्ठा और आत्मबल का सशक्त उदाहरण है।

Written By : मृदुला दुबे | Updated on: February 3, 2026 11:06 pm

शिवजी ने ऋषि मार्कण्डेय के माता पिता के तप से प्रसन्न होकर पूछा कि दीर्घ आयु किंतु अल्पबुद्धि या अल्पायु किंतु गुणवान पुत्र चाहिय ? तब ऋषि मृकण्डु ने गुणवान पुत्र मांगा। पुत्र की बढ़ती आयु के साथ माता-पिता उदास होते गए ।16वें वर्ष के अंत में अत्यंत उदास देखकर मार्कण्डे ने माता- पिता से उनकी अत्यधिक उदासी का कारण पूछा। तब माता-पिता ने उन्हें वरदान का पूरा विवरण बताया। मार्कण्डेय बिल्कुल भी विचलित नहीं हुए। मार्कण्डेय समझ गए कि भगवान शिव ही उनकी इस समस्या को दूर कर सकते हैं।

गंगा और गोमती के संगम पर बैठकर मार्कण्डेय ने भगवान शिव की आराधना में महामृत्युंजय मंत्र का जाप किया। यमराज उन्हें लेने आए। यमराज को देखकर मार्कण्डेय घबरा गए और भगवान शिव का आह्वान करते हुए शिवलिंग को पकड़कर उसपर अपना सिर पीटना आरम्भ कर दिया।

शिवजी के मिलन की प्रतीक्षा में शिव भक्ति में लीन हो गए। मार्कण्डेय प्रतिक्षण भगवान शिव की आराधना करते थे। यमराज ने मार्कण्डेय को बार- बार पुकारा लेकिन उनका ध्यान नहीं टूटा और उन्होंने शिवलिंग को भी नहीं छोड़ा। मार्कण्डेय पर यमराज का पाश पड़ते ही वह शिवलिंग से भी जा टकराया। शीघ्र ही शिवलिंग से प्रचंड के साथ स्वयं भगवान शिव रुद्र रूप में प्रकट होकर यमराज को पराजित किया और अपने छोटे से भक्त को दर्शन दिए। भगवान शिव ने मार्कंडेय के प्राणों की रक्षा की और उन्हें चिरंजीवी होने का अमर वरदान भी दिया।

शिव ने यमराज को ललकारते हुए बोला कि शिव भक्ति में लीन मार्कण्डेय को शिवलिंग सहित उठाने का तुमने अपराध किया है। सभी देवता भय से कांपने लगे। देवताओं ने प्रार्थना कि हे शिव! मृत्यु न होने से संसार का संतुलन बिगड़ जायेगा। उस मन्दिर के शिवलिंग पर आज भी शिवलिंग के एक तरफ चोट के निशान है।

अमर रचनाएँ और योगदान :
ऋषि मार्कण्डेय द्वारा रचित मार्कण्डेय पुराण है, जो अठारह महापुराणों में से एक है। इस अदभुत पुराण में देवी महात्म्य (दुर्गा सप्तशती) का समावेश है. महिषासुर वध की कथा देवी भागवत में लिखी गई है। महिषासुर की कथा यह सिखाती है कि लोभ और अहंकार चाहे कितने भी शक्तिशाली हो, फ़िर भी सत्य और धर्म के सामने टिक नहीं सकते।

ऋषि मार्कण्डेय की शिक्षा :

संसार में भक्ति से बड़ा कोई बल नहीं है।
इस अनित्य संसार में मृत्यु भी ईश्वर-कृपा के आगे पराजित हो जाती है।
आदि शिव (चेतना) और शक्ति (ऊर्जा) का संतुलन ही जीवन का आधार है।
व्यक्ति जब भी भय, रोग या असफलता से घिर जाता है, तब मार्कण्डेयजी की तरह से श्रद्धा और धैर्य धारण करने से उसे मानसिक शक्ति मिलती है।

आदि गुरु शिव भक्ति मंत्र:
“ओम नमः शिवाय”
अर्थात मैं भगवान शिव को नमन करता हूँ।
इस मंत्र से मन में शांति, निर्भयता और आत्मबल मिलता है।

महामृत्युंजय मंत्र:

“ओम त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्॥”
अर्थात हम त्रिनेत्रधारी भगवान शिव की उपासना करते हैं।
वे हमें मृत्यु के बंधन से मुक्त करें और अमरत्व प्रदान करें। महा मृत्युंजय मंत्र मार्कण्डेय के जीवन से जुड़ा हुआ है। ये मंत्र रोग व भय से रक्षा करता है।

“देवी मंत्र”
“सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके।”
यह मंत्र सुख सौभाग्य,शक्ति, साहस और कल्याण का प्रतीक है।
मार्कण्डेय के जीवन से हम ये सीखते हैं कि सच्ची भक्ति से मृत्यु भी हार जाती है।

(मृदुला दुबे योग शिक्षक एवं अध्यात्म की जानकर हैं।)

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3 thoughts on “ऋषि मार्कण्डेय : शिव और शक्ति दोनों के परमभक्त

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