रूस के तेल पर अमेरिकी शिकंजा, चीन से बढ़ता निर्यात क्या भारत को देगा आर्थिक सहारा?

रूस से कच्चा तेल खरीदने को लेकर अमेरिका का दबाव बढ़ने के बीच भारत के सामने आर्थिक मोर्चे पर एक नया समीकरण उभर रहा है। एक ओर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रूस और ईरान से जुड़े प्रतिबंधों को मजबूत करने वाले कानून पर हस्ताक्षर कर दिए हैं, जिसमें रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का प्रावधान है। दूसरी ओर चीन समेत प्रमुख ब्रिक्स देशों को भारत का निर्यात तेजी से बढ़ रहा है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या अमेरिकी बाजार में संभावित दबाव की भरपाई चीन और दूसरे उभरते बाजारों में बढ़ते निर्यात से की जा सकती है?

अमेरिकी दबाव की राजनीति के खिलाफ लामबंदी
Written By : Ramnath Rajesh | Updated on: September 20, 2026 11:44 pm

रूस से कच्चा तेल खरीदने को लेकर अमेरिकी शिकंजा कसने की कोशिश के बीच भारत के सामने आर्थिक मोर्चे पर एक नया समीकरण उभर रहा है। एक ओर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रूस और ईरान से जुड़े प्रतिबंधों को मजबूत करने वाले कानून पर हस्ताक्षर कर दिए हैं, जिसमें रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का प्रावधान है। दूसरी ओर चीन समेत प्रमुख BRICS देशों को भारत का निर्यात तेजी से बढ़ रहा है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या अमेरिकी बाजार में संभावित दबाव की भरपाई चीन और दूसरे उभरते बाजारों में बढ़ते निर्यात से की जा सकती है?

यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत ने चालू वित्त वर्ष में आर्थिक विकास की मजबूत रफ्तार बनाए रखने का लक्ष्य रखा है। अप्रैल-जून तिमाही में देश की वास्तविक GDP वृद्धि दर 7.8 प्रतिशत रही। इसके बाद अमेरिकी क्रेडिट रेटिंग एजेंसी मूडीज ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए भारत की आर्थिक वृद्धि का अनुमान बढ़ाकर 7 प्रतिशत कर दिया। हालांकि, मूडीज  ने महंगी ऊर्जा और खाद्य महंगाई को विकास के सामने प्रमुख जोखिमों में शामिल किया है। यानी भारत के सामने एक साथ दो मोर्चे हैं—ऊर्जा सुरक्षा और निर्यात बाजार।

रूस से तेल खरीद पर अमेरिका का बढ़ता दबाव

ट्रंप ने शुक्रवार को Lindsey O. Graham Sanctioning Russia and Iran Act of 2026 पर हस्ताक्षर किए। कानून अमेरिकी प्रशासन को रूस के प्रमुख तेल और गैस खरीदारों के साथ कारोबार करने वाले देशों पर कड़े आर्थिक कदम उठाने और कुछ परिस्थितियों में उनके उत्पादों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का अधिकार देता है। हालांकि, इसका यह मतलब नहीं है कि भारत पर 100 प्रतिशत टैरिफ तत्काल लागू हो गया है। वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि अमेरिकी प्रशासन इस कानून का इस्तेमाल किस तरह करता है और भारत जैसे देशों के लिए क्या शर्तें तय की जाती हैं।

भारत के लिए यह मामला महत्वपूर्ण है क्योंकि रूस पिछले कुछ वर्षों में भारतीय रिफाइनरियों के लिए कच्चे तेल का प्रमुख स्रोत बन गया है। रूस से मिलने वाले तेल ने भारत को अपेक्षाकृत प्रतिस्पर्धी कीमतों पर ऊर्जा हासिल करने में मदद की है। यदि अमेरिकी दबाव के कारण भारत को रूसी तेल की खरीद कम करनी पड़ती है और दूसरे स्रोतों से महंगा तेल खरीदना पड़ता है, तो देश का आयात बिल बढ़ सकता है। इसका असर केवल पेट्रोल और डीजल की कीमत तक सीमित नहीं रहेगा। महंगा कच्चा तेल परिवहन, उत्पादन और लॉजिस्टिक्स की लागत बढ़ा सकता है और इसका दबाव अर्थव्यवस्था तथा महंगाई दोनों पर पड़ सकता है।

दूसरी तरफ चीन को निर्यात में 39 प्रतिशत उछाल

इसी समय भारत-चीन व्यापार में एक महत्वपूर्ण बदलाव दिखाई दे रहा है। उपलब्ध वाणिज्यिक आंकड़ों के अनुसार अप्रैल-अगस्त 2026 के दौरान चीन को भारत का निर्यात 39 प्रतिशत बढ़कर 9.6 अरब डॉलर पहुंच गया। इसी अवधि में चीन, रूस, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका यानी चार प्रमुख BRICS देशों को भारत का कुल निर्यात करीब 34 प्रतिशत बढ़कर 19.9 अरब डॉलर हो गया। पिछले साल इसी अवधि में यह लगभग 14.9 अरब डॉलर था।

ये आंकड़े इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि अमेरिका के साथ व्यापारिक संबंधों में टैरिफ और रूसी तेल के मुद्दे को लेकर दबाव बढ़ रहा है। ऐसे समय में चीन और अन्य ब्रिक्स बाजारों में भारतीय निर्यात का बढ़ना भारत के लिए व्यापारिक विकल्पों के विस्तार का संकेत देता है। लेकिन इसे अमेरिकी बाजार की पूरी भरपाई मानना अभी जल्दबाजी होगी।

क्या चीन अमेरिका की भरपाई कर सकता है?

भारत और चीन के बीच व्यापार बढ़ रहा है, लेकिन दोनों देशों के व्यापार की तस्वीर अभी भी पूरी तरह भारत के पक्ष में नहीं है। चीन से भारत का आयात लंबे समय से भारतीय निर्यात से काफी अधिक रहा है। इसलिए चीन को निर्यात बढ़ने के बावजूद व्यापार घाटे की चुनौती बनी हुई है। फिर भी चीन को भारतीय निर्यात में 39 प्रतिशत की वृद्धि महत्वपूर्ण है। इसका अर्थ है कि भारतीय कंपनियां दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक में अपनी बाजार हिस्सेदारी बढ़ाने की कोशिश कर रही हैं।

यही वह बदलाव है जिसे अमेरिकी टैरिफ के संदर्भ में देखा जा सकता है। यदि अमेरिका में भारतीय उत्पादों के लिए व्यापारिक परिस्थितियां कठिन होती हैं, तो भारत के लिए चीन, रूस, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका और दूसरे उभरते बाजारों में निर्यात बढ़ाना उपयोगी हो सकता है। लेकिन इन बाजारों की क्षमता और अमेरिकी बाजार की भूमिका एक जैसी नहीं है। इसलिए ब्रिक्स देशों को अमेरिकी बाजार का सीधा विकल्प कहना अभी सही नहीं होगा। इसे निर्यात बाजारों के विविधीकरण के रूप में देखना ज्यादा उचित होगा।

7 प्रतिशत विकास दर के सामने असली चुनौती

भारत की अर्थव्यवस्था फिलहाल मजबूत वृद्धि दिखा रही है। पहली तिमाही में 7.8 प्रतिशत की GDP वृद्धि और पूरे वित्त वर्ष के लिए मूडीज का 7 प्रतिशत अनुमान सकारात्मक संकेत है। लेकिन आगे की राह में ऊर्जा कीमतें और वैश्विक व्यापार तनाव महत्वपूर्ण जोखिम बने हुए हैं। यदि रूस से तेल खरीद पर अमेरिकी दबाव बढ़ता है, तो भारत के सामने ऊर्जा लागत का सवाल खड़ा होगा। वहीं अगर अमेरिकी टैरिफ के कारण भारतीय उत्पादों की मांग प्रभावित होती है, तो निर्यात क्षेत्र पर दबाव आ सकता है।

ऐसे में चीन और अन्य BRICS बाजारों में निर्यात बढ़ाना भारत के लिए एक महत्वपूर्ण रणनीतिक विकल्प बन सकता है। इससे एक ही बाजार पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है। भारत की चुनौती हालांकि केवल निर्यात बढ़ाने की नहीं है। उसे यह भी सुनिश्चित करना होगा कि नए बाजारों में निर्यात बढ़ने के साथ चीन से होने वाला आयात और व्यापार घाटा नियंत्रण से बाहर न जाए।

भारत के सामने नया आर्थिक संतुलन

मौजूदा घटनाक्रम भारत की आर्थिक कूटनीति के सामने एक जटिल तस्वीर पेश करता है। अमेरिका बड़ा निर्यात बाजार है, लेकिन रूस से तेल खरीद के मुद्दे पर दबाव बढ़ा रहा है। रूस भारत का महत्वपूर्ण ऊर्जा आपूर्तिकर्ता है, लेकिन उसके साथ व्यापार अमेरिकी प्रतिबंध नीति की निगाह में है। चीन भारत का बड़ा व्यापारिक साझेदार है और दोनों देशों के बीच रणनीतिक मतभेदों के बावजूद भारतीय निर्यात तेजी से बढ़ रहा है। ब्रिक्स भारत को अमेरिका और यूरोपीय बाजारों के अलावा अन्य बड़े बाजारों में व्यापार बढ़ाने का अवसर देता है। इसलिए आने वाले महीनों में भारत के सामने असली चुनौती अमेरिका या चीन में से किसी एक को चुनने की नहीं, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा, निर्यात बाजार और आर्थिक विकास के बीच संतुलन बनाने की होगी।

7 प्रतिशत की अनुमानित विकास दर को बनाए रखने के लिए भारत को महंगे तेल के संभावित असर से निपटना होगा और साथ ही निर्यात के नए बाजार तलाशने होंगे। चीन और ब्रिक्स देशों में बढ़ता निर्यात इस दिशा में अवसर जरूर देता है, लेकिन अमेरिकी बाजार से होने वाले संभावित नुकसान की पूरी भरपाई कितनी हो पाएगी, यह आने वाले महीनों के व्यापार आंकड़े ही स्पष्ट करेंगे। फिलहाल इतना साफ है कि रूस के तेल पर अमेरिकी दबाव और चीन को बढ़ते भारतीय निर्यात ने भारत की आर्थिक कूटनीति के सामने एक नया समीकरण खड़ा कर दिया है—ऊर्जा के लिए रूस, निर्यात के लिए अमेरिका और बढ़ते विकल्प के रूप में चीन व BRICS।

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