अति पठनीय और संग्रहणीय है नरेश अग्रवाल का काव्य संग्रह ‘हथियार की तरह’

हिंदी कविता के क्षेत्र में ऐसे शुरू से ही अलग अलग क्षेत्र के लोगों ने अद्भुत योगदान किया है. हिंदी साहित्य के शीर्ष कवि जयशंकर प्रसाद एक सफल व्यवसायी भी थे. उपेंद्रनाथ अश्क ने भी व्यवसाय अपनाया था. आज के कवि नरेश अग्रवाल भी पेशे से बहुत सफल व्यवसायी हैं. इन्हें दुनिया घूमने का फोटोग्राफी का भी बहुत शौक है.

पुस्तक के आवरण पृष्ठ का अंश
Written By : प्रमोद कुमार झा | Updated on: February 19, 2026 12:41 am

नरेश अग्रवाल की कविताओं के ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं. देश की लगभग सभी पत्रिकाओं में इनकी कविताएं और इनके पुस्तकों की समीक्षाएं प्रकाशित हो चुकी हैं नरेश जी एक दशक से भी अधिक समय से “मरुधर के स्वर ” पत्रिका का संपादन कर रहे हैं.

प्रतिष्ठित कवि अरुण कमल नरेश जी के बारे में लिखते हैं : ” नरेश जी ने कम – से – कम में अधिक – से – अधिक कहने की महारथ हासिल है। नुकीले वाक्य सीधे निशाने पर लगते हैं। कोई भी पाठक इन्हें एक नजर में ही हृदयंगम कर लेता है। भाषा इतनी सुगम ,पारदर्शी और सहज है कि दुविधा या अवरोध का एहसास भी नहीं होता ।आश्चर्य होता है कि नरेश अग्रवाल ने जीवन के प्रत्येकअंश को इतने करीब से देखा है दत्तचित्त होकर।”

। 1120पृष्ठ के संग्रह में नरेश जीकी 90 छोटी छोटी कविताएं शामिल हैं . ये कविताएं एक चित्र का एहसास देती हैं. कविताएं पाठकों के मानस पटल पर तुरंत एक दृश्य बना लेती हैं. संग्रह की पहली कविता “उसके सारे अंग हँस रहे थे” की पंक्तियों को देखिए : “कुछ भी कहो उससे अच्छा या बुरा/वह हँसता ही चला जाता था/ बार – बार हँसता था/ मुझे समझ में नहीं आया उसका हँसना .” कुछ कविताओं के शीर्षक देखिए : मन उड़ गया संसार से , नहीं पता, हथियार की तरह, भूख इत्यादि. हथियार की तरह कविता की कुछ पंक्तियाँ देखिए : “पत्थरों की रगड़ से/आग उत्पन्न हुई/लेकिन पत्थर नहीं जले। आश्चर्य हुआ उन्हें/ अपनी आग से लकड़ियाँ /जलती देखकर.”।

नरेश की भाषा बहुत परिष्कृत है , इनका शब्द भंडार भी विशाल है. इन्होंने जिन्दगी के बहुत सारे रंगों को देखा है और उसे अपनी कविताओं में स्थान दिया है. इस संग्रह की अंतिम कविता ” छुट्टी” की पंक्तियों को देखिए : ‘ उसने जैसे ही छुट्टी की दरखास्त/मुझ तक बढ़ाई /मैं एक बार सिहर उठा/ उसके रूखे हाथों को देखकर। नाखून के सिवा/हाथों की पूरी त्वचा पर अलग – अलग रंग थे/ कहीं भूरा, कहीं काला/कहीं चमड़ी उखड़ने जैसा। चट्टान जैसी स्थिरता भी थी उनमें/ किसी भी कठिन काम को/ थाम लेने की.। मैने नहीं देखा उसका चेहरा/ न ही शरीर/बस छुट्टी की मंजूरी रख दी /उसके हाथों में.’। संवेदनशीलता किसी एक की विरासत नहीं है . नरेश जी सुंदर कविताएं थोड़ी और बड़ी हो सकती थीं. आप एक बैठकी में इसे पढ़ जाते हैं. संग्रह अति पठनीय और संग्रहणीय है .

संग्रह: हथियार की तरह  कवि: नरेश अग्रवाल, पृष्ठ : 112, प्रकाशक :भारतीय ज्ञानपीठ मूल्य: रु.230.

(प्रमोद कुमार झा तीन दशक से अधिक समय तक आकाशवाणी और दूरदर्शन के वरिष्ठ पदों पर कार्यरत रहे. एक चर्चित अनुवादक और हिन्दी, अंग्रेजी, मैथिली के लेखक, आलोचक और कला-संस्कृति-साहित्य पर स्तंभकार हैं।)

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