मंगोलियाई चंद्र नववर्ष के पावन दिन प्रारम्भ हुए इस अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में मुख्य अतिथि थे केन्द्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत, विशिष्ट अतिथि थे केंद्रीय संस्कृति सचिव विवेक अग्रवाल, जबकि विशेष अतिथि थे भारत में मंगोलिया के महामहिम राजदूत गंबोल्ड दंबाजव। स्वागत वक्तव्य दिया आईजीएनसीए के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने। इस अवसर पर सम्मेलन की संयोजक एवं आईजीएनसी की ट्रस्टी प्रो. निर्मला शर्मा एवं बृहत्तर भारत एवं क्षेत्र अध्ययन विभाग के प्रमुख प्रो. धर्म चंद चौबे ने भी अपने विचार व्यक्त किए। उद्घाटन सत्र के उपरांत अतिथियों ने एक विशिष्ट प्रदर्शनी का उद्घाटन किया, जिसमें मंगोलियाई संस्कृति को दर्शाने वाले सुंदर चित्र शामिल हैं। यह प्रदर्शनी आईजीएनसीए की दर्शनम् गैलरी में 25 फरवरी तक दर्शकों के लिए खुली रहेगी। इस सम्मेलन में मंगोलिया, अमेरिका, फ्रांस सहित कई देशों के 31 विद्वान हिस्सा ले रहे हैं और दो दिनों में 75 शोधपत्र पढ़े जाएंगे।
केन्द्रीय मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत ने कहा, यह सम्मेलन केवल एक अकादमिक अभ्यास भर नहीं है, बल्कि साझा आध्यात्मिक और कलात्मक परम्पराओं तथा निरंतर सांस्कृतिक प्रवाह से प्रेरित है। उन्होंने कहा कि भारत और मंगोलिया के बीच ऐतिहासिक आदान–प्रदान केवल धर्म तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि इसमें खगोलशास्त्र, पंचांग एवं कालगणना विज्ञान, चिकित्सा तथा साहित्य जैसे अनेक ज्ञान–क्षेत्र शामिल रहे हैं। उन्होंने उल्लेख किया कि मंगोलियाई पंचांग परम्पराएं संस्कृत के वैज्ञानिक चिंतन से निकली अवधारणाओं को आज भी संरक्षित किए हुए हैं।
पारम्परिक मंगोलियाई चिकित्सा पद्धति में आयुर्वेद के सिद्धान्तों का समावेश हुआ है, जिसमें भारतीय प्रभाव स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है। इससे यह सिद्ध होता है कि आध्यात्मिक आदान–प्रदान के साथ–साथ वैज्ञानिक ज्ञान भी दोनों सभ्यताओं के बीच प्रवाहित हुआ। उन्होंने आगे कहा कि मंगोलियाई ऐतिहासिक साहित्य और भारतीय महाकाव्यों – महाभारत तथा रामायण के बीच भी समानताएं सामने आती हैं। मंगोलियाई कंजूर का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि इसके संरक्षण और डिजिटलीकरण से सभ्यतागत संवाद तथा भारत–मंगोलिया सांस्कृतिक कूटनीति को नई मज़बूती मिली है। मंगोलियाई कंजूर को उन्होंने दोनों देशों के लोगों के बीच एक पवित्र सेतु बताया।
मंत्री शेखावत ने यह भी कहा कि मंगोलिया में भारत को दीर्घकाल से एक पवित्र भूमि के रूप में देखा जाता रहा है। उन्होंने 2015 की मंगोलिया यात्रा के दौरान कहे गए भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के उन शब्दों का स्मरण किया, जिनमें उन्होंने भारत को मंगोलिया का आध्यात्मिक पड़ोसी बताया था। ‘बृहत्तर भारत’ पहल का संदर्भ देते हुए उन्होंने कहा कि मंगोलिया, भारत के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखता है।
वर्तमान प्राथमिकताओं की ओर संकेत करते हुए उन्होंने कहा कि आज पाण्डुलिपि संरक्षण के लिए कंजर्वेशन साइंस और डिजिटल प्रौद्योगिकी के समन्वय की आवश्यकता है, और यह सम्मेलन डिजिटल ह्यूमैनिटीज़ के क्षेत्र में सहयोग का एक महत्त्वपूर्ण मंच प्रदान करता है।
केन्द्रीय संस्कृति सचिव विवेक अग्रवाल ने कहा, “भारत और मंगोलिया साझा सभ्यतागत स्मृतियों और सांस्कृतिक आत्मीयता पर आधारित एक आदर्श साझेदारी का निर्माण कर रहे हैं। हमारा सहयोग तेल रिफाइनरी परियोजना, रक्षा और शिक्षा के क्षेत्र में सहभागिता जैसे रणनीतिक उपक्रमों तक फैला है। इसके साथ ही, आध्यात्मिक और पाण्डुलिपि परम्पराओं के पुनर्जीवन के लिए भी निरंतर प्रयास किए जा रहे हैं, जिनमें इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के माध्यम से मंगोलियाई कंजूर के संरक्षण और प्रसार का कार्य भी शामिल है। प्रोजेक्ट मौसम और प्रोजेक्ट बृहत्तर भारत के अंतर्गत हम नए सिरे से साझा अमूर्त सांस्कृतिक विरासत के दस्तावेज़ीकरण और संरक्षण तथा उसे यूनेस्को में मान्यता दिलाने के लिए आगे बढ़ाने का लक्ष्य रखते हैं।
उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि विद्वानों के बीच संवाद केवल विचार-विमर्श तक सीमित न रहकर ठोस परिणामों में परिवर्तित होना चाहिए, जिसमें रचनात्मक और सांस्कृतिक अर्थव्यवस्था के क्षेत्रों में सहयोग भी शामिल हो।”
भारत में मंगोलिया के राजदूत महामहिम श्री गंबोल्ड दंबाजव ने अपने संबोधन में कहा कि अनेक ऐतिहासिक दस्तावेज इस तथ्य की पुष्टि करते हैं कि भारत और मंगोलिया के सांस्कृतिक और आध्यात्मिक सम्बंध अत्यंत प्राचीन और गहरे रहे हैं। उन्होंने कहा कि जब वायुयान, रेल, सड़क जैसे परिवहन के साधन नहीं थे, तब हमारे पूर्वजों ने हिमालय पार कर इन सम्बंधों को आकार दिया। उन्होंने कहा कि भारत और मंगोलिया के रणनीतिक साझेदारी दिनोंदिन सुदृढ़ हो रही है।
सम्मेलन का परिचय देते हुए प्रो. निर्मला शर्मा ने भारत-मंगोलिया संबंधों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि तथा सांस्कृतिक अंतःप्रवाह की परम्परा पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा, भारत-मंगोलिया के सम्बंध 2,500 वर्ष से हैं। ईसा-पूर्व पांचवीं शताब्दी की मंगोलिया की गुफा-चित्रकला में दो भारतीयों के श्वेत घोड़ों के साथ एक हूण शासक के दरबार में आने का चित्र मिलता है। मथुरा से प्राप्त ईसा-पूर्व पहली शताब्दी के एक सिक्के पर ‘खगान हगामाश’ नाम अंकित है। छठी शताब्दी में जुआन-जुआन साम्राज्य ने एक भारतीय भिक्षु को राजगुरु नियुक्त किया। 590 से 604 ईस्वी के बीच भारतीय भिक्षु शाक्यवंश और नरेंद्रयश मंगोलिया गए। चंगेज खान के शिरस्त्राण पर त्रिशूल अंकित था और उसके साम्राज्य-ध्वज पर नौ त्रिशूल थे।
आईजीएनसीए के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने कहा कि भारत और मंगोलिया के राजनयिक सम्बंध भले 70 वर्षों का है, लेकिन सांस्कृतिक सम्बंध हज़ारों साल पुराने हैं। उन्होंने कहा कि लुप्त हो चुके पवित्र मंगोलियाई कंजूर, जो भगवान बुद्ध की वाणी हैं, की खोज करके, फिर उनका पुनर्प्रकाशन करके भारत ने इसके 108 खंड मंगोलिया के बौद्ध मठों और शैक्षणिक संस्थाओं को भेंट किए। उन्होंने कहा, मंगोलिया के राष्ट्रीय ध्वज का नाम “सोयाम्बो” है, जो संस्कृत शब्द ‘स्वयम्भू’ जैसा है। यह विश्व का एकमात्र राष्ट्रीय ध्वज है जिसका नाम संस्कृत से लिया गया है।
उद्घाटन सत्र के अंत में, बृहत्तर भारत एवं क्षेत्र अध्ययन विभाग के प्रमुख प्रो. (डॉ.) धर्म चंद चौबे ने अतिथियों, वक्ताओं और आगंतुकों के प्रति धन्यवाद करते हुए एक महत्त्वपूर्ण बात को रेखांकित किया कि मंगोल शासक चंगेज खान भारत को भगवान बुद्ध की पवित्र भूमि मानता था, इसलिए उसने कभी भी सिन्धु नदी को पार नहीं किया।
यह दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन भारत और मंगोलिया के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक अंतर्संबंधों पर गंभीर विमर्श का मंच प्रदान करेगा, जिसमें देश-विदेश के विद्वान, शोधार्थी और विशेषज्ञ भाग ले रहे हैं। यह सम्मेलन आध्यात्मिकता, संस्कृति, विद्वत्ता, कला और साझा सभ्यतागत ज्ञान पर आधारित भारत-मंगोलिया मैत्री की एक सशक्त अभिव्यक्ति है।
इस सम्मेलन में जिन विषयों पर चर्चा होगी, उनमें से कुछ प्रमुख विषय हैं- भारत और मंगोलिया को जोड़ने वाली नई पुरातात्विक खोजों; दोनों देशों से संबंधित मंदिर, स्तूप, मूर्तिकला और स्थापत्य; सांस्कृतिक कला की शैलीगत उत्पत्ति; मंगोलिया में प्राप्त संस्कृत नाम, ग्रंथ, स्तोत्र और पाण्डुलिपियां; भारतीय शास्त्रीय काव्य और साहित्य की मंगोल परम्परा; भारत और मंगोलिया के बीच यात्राएं करने वाले भिक्षु, यात्री और विद्वान; तथा सिक्के, मूर्तियां, थंका चित्र, मंडल, प्रतीक और शिल्प, जो दोनों देशों की साझा विरासत को दर्शाते हैं।
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